22 Jan 2026
VIVEK SINGH
म्यूचुअल फंड निवेशकों को इक्विटी, डेट और अन्य एसेट क्लास में निवेश का मौका देता है. निवेशकों के लिए भी जोखिम को संतुलित करने का अच्छा जरिया बनता है.
देश में 30 से ज्यादा AMC और 1000 से अधिक म्यूचुअल फंड स्कीमें मौजूद हैं. इतने विकल्पों के बीच बिना समझे निवेश करना जोखिम भरा हो सकता है. निवेश से पहले स्कीम की लागत और परफॉर्मेंस मेट्रिक्स समझना जरूरी है.
म्यूचुअल फंड सिर्फ रिटर्न नहीं देते, बल्कि कुछ खर्च भी वसूलते हैं. ये खर्च सीधे आपके निवेश से कटते हैं. अगर निवेशक इन चार्जेज को नजरअंदाज करता है, तो उसका असली रिटर्न उम्मीद से काफी कम हो सकता है.
एक्सपेंस रेश्यो फंड मैनेजमेंट का सालाना चार्ज होता है, जो AUM के प्रतिशत के रूप में लिया जाता है. इसमें फंड मैनेजर की फीस, मार्केटिंग खर्च और एडमिनिस्ट्रेटिव कॉस्ट शामिल होती है.
जितना ज्यादा एक्सपेंस रेश्यो, उतना कम निवेशक का नेट रिटर्न. ये चार्ज सीधे NAV से कटता है. खासकर लॉन्ग टर्म निवेश में यही छोटा सा प्रतिशत बड़ा नुकसान बन सकता है.
अगर आपने ₹10,000 निवेश किए और फंड ने 10% रिटर्न दिया, तो ₹1,000 कमाए. लेकिन 1% एक्सपेंस रेश्यो में ₹100 कट जाएंगे, जिससे नेट मुनाफा सिर्फ ₹900 रह जाएगा.
अल्फा यह दिखाता है कि फंड ने अपने बेंचमार्क के मुकाबले कितना बेहतर प्रदर्शन किया. पॉजिटिव अल्फा का मतलब है कि फंड ने अपने रिस्क के अनुसार अपेक्षा से ज्यादा रिटर्न दिया है.
सिर्फ रिटर्न देखकर स्कीम चुनना गलत है. एक्सपेंस रेश्यो, अल्फा, फंड का ट्रैक रिकॉर्ड और निवेश अवधि—इन सभी फैक्टर्स को समझकर निवेश करने से ही म्यूचुअल फंड का पूरा फायदा मिलता है.