07/01/2026
VIVEK SINGH
आज क्रेडिट कार्ड शॉपिंग, ट्रैवल और ऑनलाइन पेमेंट का अहम हिस्सा बन चुका है. यह न सिर्फ सुविधा देता है बल्कि आपकी फाइनेंशियल डिसिप्लिन भी दिखाता है. सही इस्तेमाल से क्रेडिट प्रोफाइल मजबूत होती है और भविष्य में लोन लेना आसान हो जाता है.
कई बार अच्छी इनकम होने के बावजूद लिमिट कम रहती है. इससे बड़ी खरीद या इमरजेंसी में दिक्कत आती है. बैंक लिमिट तय करते समय सिर्फ आपकी जरूरत नहीं, बल्कि अपने रिस्क को भी देखते हैं.
बैंक आपकी मासिक सैलरी या सालाना आय देखते हैं. स्थिर और ज्यादा आय का मतलब बैंक को बेहतर रीपेमेंट की उम्मीद. यही वजह है कि ज्यादा इनकम वालों को आमतौर पर ज्यादा क्रेडिट लिमिट मिलती है.
क्रेडिट स्कोर आपकी वित्तीय साख का आईना है. अगर स्कोर 750 या उससे ऊपर है, तो बैंक आपको भरोसेमंद ग्राहक मानते हैं. समय पर लोन और कार्ड बिल चुकाने से लिमिट बढ़ने की संभावना मजबूत होती है.
अगर आपकी आय का बड़ा हिस्सा पहले से चल रही EMI में जा रहा है, तो बैंक सतर्क हो जाते हैं. ज्यादा कर्ज का बोझ दिखने पर नई या ऊंची क्रेडिट लिमिट मिलने में मुश्किल आ सकती है.
क्रेडिट लिमिट तय करना बैंक के लिए एक रिस्क असेसमेंट है. बैंक यह आंकते हैं कि अगर आप ज्यादा खर्च करेंगे, तो क्या समय पर भुगतान कर पाएंगे. इसी आधार पर लिमिट तय या बदली जाती है.
नौकरी बदलने या प्रमोशन के बाद अगर सैलरी बढ़ी है, तो बैंक को अपडेट जरूर करें. नई सैलरी स्लिप या आईटीआर देने से बैंक आपकी रीपेमेंट क्षमता दोबारा आंकते हैं और लिमिट बढ़ा सकते हैं.
लगातार 6 से 12 महीने तक बिल समय से पहले चुकाने पर बैंक का भरोसा बढ़ता है. ऐसे ग्राहकों को अक्सर प्री अप्रूव्ड लिमिट बढ़ाने का ऑफर खुद बैंक की तरफ से मिलने लगता है.