21/02/2026
Pradyumn Thakur
प्रॉपर्टी टैक्स जिसे हाउस टैक्स भी कहते हैं यह एक टैक्स है जो नगर निगम या नगरपालिका घर जमीन या बिल्डिंग पर लगाती है. यह टैक्स आमतौर पर हर साल देना होता है और यह उस इलाके की सरकार के लिए सबसे बड़ा कमाई का साधन होता है.
यह टैक्स सरकार लोगों से इसलिए लेती है ताकि शहर की सुविधाएं बेहतर बनाई जा सकें जैसे सड़कें पार्क सीवर सफाई पानी व्यवस्था और स्ट्रीट लाइट जैसी जरूरी सेवाएं. यानी जो टैक्स आप देते हैं उसी पैसे से शहर का विकास और रखरखाव किया जाता है.
हर शहर में प्रॉपर्टी टैक्स निकालने का तरीका थोड़ा अलग हो सकता है लेकिन एक सामान्य फॉर्मूला होता है जिसमें प्रॉपर्टी की बेस वैल्यू बिल्ट अप एरिया बिल्डिंग की उम्र उसका प्रकार और उपयोग को ध्यान में रखकर टैक्स तय किया जाता है और फिर उसमें से डिप्रिसिएशन घटाया जाता है.
बेस वैल्यू का मतलब होता है किसी इलाके में प्रति स्क्वायर फीट जमीन या मकान की कीमत. यह कीमत जितनी ज्यादा होगी उतना ही ज्यादा टैक्स देना होगा क्योंकि टैक्स उसी वैल्यू के आधार पर निकाला जाता है और अलग अलग इलाकों में यह अलग हो सकती है.
बिल्डिंग का साइज और उसका उपयोग भी टैक्स तय करने में अहम भूमिका निभाते हैं. अगर मकान बड़ा है या कमर्शियल काम के लिए इस्तेमाल हो रहा है तो टैक्स ज्यादा होगा. वहीं अगर मकान खुद के रहने के लिए है या खाली है तो टैक्स अलग तरीके से तय किया जाता है.
बिल्डिंग की उम्र भी टैक्स पर असर डालती है. नई बिल्डिंग पर टैक्स ज्यादा लगता है क्योंकि उसकी वैल्यू ज्यादा होती है लेकिन पुरानी बिल्डिंग पर डिप्रिसिएशन मिलता है जिससे टैक्स कम हो सकता है. यानी जैसे जैसे बिल्डिंग पुरानी होती है टैक्स में कुछ राहत मिलती है.
रेजिडेंशियल प्रॉपर्टी यानी घर के टैक्स में लोकेशन बहुत अहम होती है. शहर के पॉश या सेंट्रल इलाके में टैक्स ज्यादा होता है. इसके अलावा मकान का साइज टाइप जैसे फ्लैट या स्वतंत्र घर और किराए पर है या खुद इस्तेमाल हो रहा है यह सब चीजें टैक्स तय करती हैं.
अगर प्रॉपर्टी टैक्स समय पर नहीं भरा जाए तो पेनल्टी लगती है. कई जगह 5 से 20 प्रतिशत तक ब्याज या जुर्माना लिया जाता है. कुछ शहरों में बकाया रकम के बराबर जुर्माना भी लग सकता है इसलिए समय पर टैक्स भरना जरूरी है ताकि अतिरिक्त बोझ से बचा जा सके.