₹21 का शेयर 16 महीने में ₹488 पर पहुंचा, महिला ने कमाए 92 लाख लेकिन टैक्स देना पड़ा 95 लाख! आखिर क्यों

मुंबई की एक निवेशक ने करीब 4.41 लाख रुपये से शेयर खरीदे और करीब 16 महीने बाद, निवेशक ने अपनी होल्डिंग का एक बड़ा हिस्सा 92 लाख रुपये से ज्यादा में बेच दिया. निवेशक ने इस कमाई को लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन बताते हुए टैक्स छूट का दावा किया, लेकिन इनकम टैक्स विभाग ने इसे स्वीकार नहीं किया.

इनकम टैक्स डिपार्टमेंट Image Credit: CANVA

शेयर बाजार में कभी-कभी छोटी रकम का निवेश भी बड़ा मुनाफा दे सकता है. लेकिन अगर किसी शेयर की कीमत बहुत तेजी से बढ़ती है, तो इनकम टैक्स विभाग उसकी जांच भी कर सकता है. ऐसा ही एक मामला मुंबई की निवेशक संध्या राकेश शर्मा से जुड़ा है. उन्होंने करीब 4.41 लाख रुपये में शेयर खरीदे थे. करीब 16 महीने बाद, उन्होंने अपनी होल्डिंग का एक बड़ा हिस्सा 92 लाख रुपये से ज्यादा में बेच दिया. निवेशक ने इस कमाई को लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन बताते हुए टैक्स छूट का दावा किया, लेकिन इनकम टैक्स विभाग ने इसे स्वीकार नहीं किया. अब मुंबई की इनकम टैक्स अपीलेट ट्रिब्यूनल (ITAT) ने भी उनकी अपील खारिज कर दी है.

फाइनेंशियल एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, यह मामला वित्त वर्ष 2013-14 से जुड़ा है. इनकम टैक्स विभाग को शक था कि निवेशक ने जिस कंपनी के शेयरों से बड़ा मुनाफा कमाया, उनकी कीमत में तेजी कारोबार की असली स्थिति के कारण नहीं, बल्कि कथित शेयर बाजार हेरफेर के कारण आई थी. विभाग ने शेयर बेचने से मिली पूरी रकम को अस्पष्ट नकदी क्रेडिट माना और कथित कमीशन के लिए भी अतिरिक्त रकम जोड़ी. ट्रिब्यूनल ने विभाग की कार्रवाई को बरकरार रखा.

₹4.41 लाख के शेयर से कैसे मिले ₹92 लाख?

ट्रिब्यूनल के आदेश के मुताबिक, संध्या शर्मा ने 19 नवंबर 2012 को Santoshimaa Tradelinks Ltd के 21,000 शेयर खरीदे थे. उन्होंने ये शेयर Silverice Multi Trading Pvt Ltd से ऑफ-मार्केट सौदे में 21 रुपये प्रति शेयर के भाव पर खरीदे. इस तरह कुल निवेश 4,41,000 रुपये था.

बाद में कॉरपोरेट बदलावों के बाद कंपनी का नाम Sunrise Asian Ltd यानी SAL हो गया. निवेशक ने 25 नवंबर 2013 से 12 मार्च 2014 के बीच बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (BSE) पर 14 सौदों में 18,850 शेयर बेचे. बिक्री का औसत भाव करीब 488.50 रुपये प्रति शेयर रहा. इन शेयरों को बेचने से कुल 92,03,421 रुपये मिले.

निवेशक ने 88,07,571 रुपये के लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन का दावा किया था. उस समय लागू इनकम टैक्स कानून के सेक्शन 10(38) के तहत लिस्टेड इक्विटी शेयरों से होने वाले लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन पर टैक्स छूट का प्रावधान था.

इनकम टैक्स विभाग को क्यों हुआ शक?

इनकम टैक्स विभाग ने कोलकाता की इन्वेस्टिगेशन विंग से मिली जानकारी के आधार पर मामले की दोबारा जांच शुरू की. जांच में Sunrise Asian Ltd का नाम उन कंपनियों में आया, जिनके शेयरों का कथित तौर पर इस्तेमाल फर्जी लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन और शॉर्ट टर्म कैपिटल लॉस दिखाने के लिए किया गया था.

विभाग ने कंपनी के शेयर भाव, ट्रेडिंग वॉल्यूम और वित्तीय स्थिति की जांच की. ट्रिब्यूनल के आदेश में दर्ज जानकारी के मुताबिक, जांच की अवधि में शेयर का भाव करीब 50 रुपये से बढ़कर 615 रुपये से ज्यादा हो गया था.

विभाग का कहना था कि शेयर की कीमत में इतनी बड़ी तेजी के पीछे कंपनी के कारोबार, संपत्ति या वित्तीय प्रदर्शन में वैसा सुधार नहीं दिख रहा था. इसके अलावा, शेयर में कारोबार भी काफी कम था. ज्यादातर कारोबारी दिनों में केवल 50 से 100 शेयरों का लेनदेन होता था. कई दिनों में सिर्फ एक या दो सौदे हुए. शेयर की कीमत में बदलाव भी अक्सर करीब 4.9% से 4.99% की सर्किट लिमिट के आसपास रहता था. इन परिस्थितियों के आधार पर विभाग को शक हुआ कि शेयर की कीमत आर्टिफिशियल तरीके से बढ़ाई गई थी, ताकि निवेशकों को कागजों पर बड़ा मुनाफा दिखाकर टैक्स छूट का दावा करने में मदद मिल सके.

SEBI की जांच में क्या सामने आया?

इस मामले में मार्केट रेगुलेटर SEBI की जांच भी अहम रही. ट्रिब्यूनल के आदेश के मुताबिक, SEBI ने Sunrise Asian Ltd और उससे जुड़ी संस्थाओं के खिलाफ कथित शेयर कीमत हेरफेर और ट्रेडिंग नियमों के उल्लंघन की जांच की थी. साल 2022 में SEBI ने कंपनी, पांच पूर्व निदेशकों और 80 संबंधित संस्थाओं पर संयुक्त रूप से और अलग-अलग जिम्मेदारी के आधार पर 1 करोड़ रुपये का जुर्माना लगाया था. कंपनी और कुछ निदेशकों को एक साल के लिए सिक्योरिटीज मार्केट से प्रतिबंधित भी किया गया था.

जांच अक्टूबर 2012 से सितंबर 2015 के बीच की ट्रेडिंग गतिविधियों से जुड़ी थी. संध्या शर्मा के शेयरों की खरीद-बिक्री भी इसी अवधि के दौरान हुई थी. SEBI की जांच में संबंधित संस्थाओं के बीच कथित तौर पर आपस में कारोबार करके शेयर की कीमत बढ़ाने का पैटर्न सामने आया था.

निवेशक ने क्या दलील दी?

संध्या शर्मा ने कहा कि उनका निवेश असली था और उन्होंने शेयर खरीदने तथा बेचने के लिए बैंकिंग चैनल का इस्तेमाल किया था. उन्होंने अपने दावे के समर्थन में बैंक स्टेटमेंट, डीमैट अकाउंट के रिकॉर्ड और ब्रोकर के कॉन्ट्रैक्ट नोट पेश किए. उनका कहना था कि शेयर रजिस्टर्ड ब्रोकर के जरिए स्टॉक एक्सचेंज पर बेचे गए और बिक्री की रकम उनके बैंक खाते में आई. उन्होंने यह भी कहा कि SEBI की जांच में उनका नाम नहीं था और उनके सौदों में शामिल ब्रोकर कथित हेरफेर का हिस्सा नहीं थे.

निवेशक ने यह भी आपत्ति जताई कि विभाग ने तीसरे पक्ष के बयानों का इस्तेमाल किया, लेकिन उन्हें इन लोगों से सवाल पूछने यानी क्रॉस-एग्जामिनेशन का मौका नहीं दिया गया.

फिर ITAT ने अपील क्यों खारिज की?

मुंबई की ITAT ने माना कि बैंक स्टेटमेंट, डीमैट रिकॉर्ड और कॉन्ट्रैक्ट नोट से यह पता चलता है कि शेयरों और पैसे का लेनदेन कैसे हुआ. लेकिन केवल इन दस्तावेजों से यह साबित नहीं होता कि पूरा सौदा वास्तविक था. ट्रिब्यूनल ने शेयर की कीमत में असामान्य तेजी, कंपनी की कमजोर वित्तीय स्थिति, कम ट्रेडिंग वॉल्यूम और SEBI की जांच के निष्कर्षों को एक साथ देखा. आदेश के मुताबिक, निवेशक को व्यक्तिगत रूप से पेश होने के लिए समन भी जारी किया गया था, लेकिन वह पेश नहीं हुईं. उनके अधिकृत प्रतिनिधि ने लिखित जवाब दिए, लेकिन विभाग के मुताबिक, जरूरी स्पष्टीकरण उपलब्ध नहीं कराई गई.

ट्रिब्यूनल ने माना कि निवेशक विभाग के निष्कर्षों का पर्याप्त जवाब नहीं दे सकीं. इसलिए उसने मुनाफे को वास्तविक लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन मानने से इनकार कर दिया और विभाग की कार्रवाई बरकरार रखी.

निवेशक पर कितनी रकम की टैक्स कार्रवाई हुई?

इनकम टैक्स विभाग ने तीन तरह की अतिरिक्त रकम जोड़ी थी.

  • ₹92,03,421: शेयर बेचने से मिली पूरी रकम को इनकम टैक्स कानून के सेक्शन 68 के तहत अस्पष्ट नकदी क्रेडिट माना गया.
  • ₹2,76,103: कथित एंट्री की व्यवस्था कराने के लिए 3% कमीशन का अनुमान लगाकर सेक्शन 69C के तहत अस्पष्ट खर्च माना गया. निवेशक ने कमीशन देने से इनकार किया था.
  • ₹56: Essar India Ltd के दो शेयरों में निवेश को अस्पष्ट निवेश माना गया.

इन तीनों को मिलाकर कुल अतिरिक्त रकम 94,79,580 रुपये हुई. ITAT ने विभाग की इन बढ़ोतरी को बरकरार रखा.

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