11 एयरपोर्ट होंगे प्राइवेट, 50 साल की डील में अडानी या GMR किसकी दावेदारी मजबूत?

सरकार 11 एयरपोर्ट को 50 साल के लिए निजी कंपनियों को देने की तैयारी कर रही है. इन्हें पांच बंडल में बांटा गया है. अडानी और GMR जैसे बड़े ऑपरेटर बोली में शामिल हो सकते हैं. अडानी के पास बड़ा एयरपोर्ट नेटवर्क है, जबकि GMR को रिटर्न और वैल्यूएशन के कुछ आंकड़ों में बढ़त हासिल है.

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भारत सरकार देश के 11 एयरपोर्ट को निजी कंपनियों को सौंपने की तैयारी कर रही है. इन एयरपोर्ट को पांच बंडल में बांटकर 50 साल के लिए पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप (PPP) मॉडल पर दिया जाएगा. सरकार की योजना के तहत छोटे और बड़े एयरपोर्ट को एक साथ रखा गया है, ताकि बड़े एयरपोर्ट की कमाई से छोटे और कम मुनाफे वाले एयरपोर्ट को चलाने में मदद मिल सके.

इस प्रक्रिया में Adani Enterprises और GMR Airports Infrastructure जैसे बड़े एयरपोर्ट ऑपरेटरों की नजर इन परिसंपत्तियों पर है. हालांकि, सरकार इस बार एक ही कंपनी को बहुत ज्यादा एयरपोर्ट मिलने से रोकने के लिए बंडल की संख्या पर सीमा लगाने की तैयारी में है.

11 एयरपोर्ट को 5 बंडल में बांटा

सरकार ने 11 एयरपोर्ट को पांच समूहों में रखने की योजना बनाई है. इनमें अमृतसर-कांगड़ा, रायपुर-औरंगाबाद, भुवनेश्वर-हुबली, तिरुचिरापल्ली-तिरुपति और वाराणसी-गया-कुशीनगर शामिल हैं.

इनमें कुछ बड़े और ज्यादा यात्री वाले एयरपोर्ट को छोटे एयरपोर्ट के साथ जोड़ा गया है. इसका उद्देश्य छोटे एयरपोर्ट की वित्तीय स्थिति को मजबूत करना और पूरे बंडल को लंबे समय तक व्यावहारिक बनाए रखना है.

50 साल के लिए मिलेगी जिम्मेदारी

निजी ऑपरेटर को एयरपोर्ट के संचालन, प्रबंधन और विकास की जिम्मेदारी दी जाएगी. प्रस्तावित रियायत अवधि 50 साल है. निजी कंपनी को एयरपोर्ट के टर्मिनल और सिटी-साइड इंफ्रास्ट्रक्चर के विकास के साथ तय पूंजीगत खर्च भी करना होगा. सरकार को उम्मीद है कि निजी क्षेत्र की पूंजी और विशेषज्ञता से एयरपोर्ट की सुविधाओं और संचालन में सुधार होगा.

अडानी की स्थिति क्यों मजबूत?

अडानी समूह पहले से देश के सबसे बड़े निजी एयरपोर्ट ऑपरेटरों में शामिल है. समूह आठ एयरपोर्ट संचालित करता है और देश के यात्री ट्रैफिक में इसकी हिस्सेदारी करीब 23% बताई गई है. एयरपोर्ट कारोबार की आय में भी FY26 में मजबूत वृद्धि हुई.

नवी मुंबई एयरपोर्ट के विस्तार और एयरपोर्ट सिटी से जुड़े बड़े निवेश कार्यक्रम के कारण अडानी के पास इस क्षेत्र में लंबा अनुभव और बड़ा ऑपरेशनल नेटवर्क है.

GMR के पक्ष में क्या है?

GMR की सबसे बड़ी ताकत बड़े पैमाने पर यात्री ट्रैफिक संभालने का अनुभव है. कंपनी दिल्ली और हैदराबाद समेत कई एयरपोर्ट का संचालन करती है. FY26 में कंपनी के राजस्व और EBITDA में भी मजबूत वृद्धि दर्ज की गई और वह मुनाफे में लौटी.

वैल्यूएशन और पूंजी के इस्तेमाल के नजरिए से भी GMR की स्थिति कुछ मामलों में अडानी से बेहतर दिखाई देती है. उपलब्ध आंकड़ों में GMR का ROCE करीब 11.6% रहा, जबकि अडानी के लिए यह करीब 5.8% था. वहीं GMR का EV/EBITDA करीब 20 गुना और अडानी का करीब 24 गुना बताया गया है.

निवेशकों के लिए कौन बेहतर?

अगर केवल एयरपोर्ट कारोबार की क्षमता और मौजूदा वित्तीय आंकड़ों को देखें तो GMR को कुछ मापदंडों पर बढ़त मिलती है. वहीं अडानी के पास ज्यादा एयरपोर्ट, बड़ा नेटवर्क और व्यापक इंफ्रास्ट्रक्चर कारोबार है.

लेकिन नए एयरपोर्ट हासिल करना अपने आप में शेयर के लिए सकारात्मक संकेत नहीं माना जा सकता. कंपनियों को इन एयरपोर्ट में भारी निवेश करना होगा. यात्रियों की संख्या, कर्ज, वित्तीय लागत और नए एयरपोर्ट को मुनाफे में लाने की क्षमता महत्वपूर्ण होगी.

एयरपोर्ट की बोली में क्या है सबसे बड़ा जोखिम?

इस बार सरकार ने बाजार में किसी एक कंपनी का दबदबा बढ़ने से रोकने के लिए एक बोलीदाता को मिलने वाले एयरपोर्ट बंडल की संख्या सीमित करने की योजना बनाई है. इससे अडानी और GMR दोनों को सभी बंडल हासिल करने का मौका नहीं मिलेगा.

इसके अलावा बोली में प्रति यात्री शुल्क भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है. बहुत ऊंची बोली लगाने पर एयरपोर्ट मिल तो सकता है, लेकिन भविष्य में निवेश पर रिटर्न दबाव में आ सकता है.

यानी असली मुकाबला सिर्फ इस बात का नहीं है कि अडानी या GMR कितने एयरपोर्ट हासिल करते हैं, बल्कि यह भी है कि वे कितनी कीमत पर उन्हें हासिल करते हैं और अगले 50 साल में इन एयरपोर्ट से कितना मुनाफा कमा पाते हैं.

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