पहले 500% टैरिफ की धमकी, फिर 100% का डर और अब राहत! भारत के लिए कैसे बदला ट्रंप का फैसला?
रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर अमेरिका में 500 फीसदी तक टैरिफ लगाने का प्रस्ताव बाद में घटाकर 100 फीसदी किया. ट्रंप ने 18 सितंबर 2026 को संबंधित कानून पर हस्ताक्षर किए थे. 17 अक्टूबर को उन्होंने कुछ प्रतिबंधों और शुल्कों पर अस्थायी छूट दी. इससे भारत, चीन और तुर्की को फिलहाल राहत मिली है, लेकिन टैरिफ का कानूनी प्रावधान अब भी मौजूद है.

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर भारी टैरिफ लगाने की धमकी दी थी. इस प्रस्ताव में शुरुआत में 500% तक टैरिफ लगाने की बात थी. बाद में इसे घटाकर 100% किया और अब 17 अक्टूबर को ट्रंप ने इससे जुड़े कुछ प्रतिबंधों और शुल्कों पर अस्थायी छूट दे दी है. इससे भारत, चीन और तुर्की जैसे देशों को फिलहाल राहत मिली है, जो रूस से ऊर्जा खरीदते हैं. हालांकि, यह छूट स्थायी नहीं है और कानून में टैरिफ लगाने का प्रावधान अब भी मौजूद है.
इस पूरे मामले के पीछे अमेरिका की कोशिश रूस पर आर्थिक दबाव बढ़ाने की थी. लेकिन इसके साथ ही उसे अपनी ऊर्जा जरूरतों, घरेलू ईंधन की कीमतों और दूसरे देशों के साथ व्यापारिक रिश्तों का भी ध्यान रखना पड़ रहा है. भारत के लिए यह मामला इसलिए अहम है, क्योंकि रूस से सस्ता कच्चा तेल खरीदने और अमेरिका को सामान निर्यात करने, दोनों पर इसका असर पड़ सकता था.
पहले 500% टैरिफ लगाने की थी तैयारी
इस प्रस्ताव के शुरुआती मसौदों में रूस से तेल और गैस खरीदना जारी रखने वाले देशों पर 500 फीसदी तक टैरिफ लगाने की बात थी. इसका मकसद ऐसे देशों के लिए अमेरिकी बाजार में सामान बेचना बेहद महंगा करना था, जिनकी ऊर्जा खरीद से रूस को यूक्रेन के खिलाफ युद्ध के लिए आर्थिक मदद मिलने की बात कही जा रही थी. जनवरी 2026 में ट्रंप ने रिपब्लिकन सीनेटर लिंडसे ग्राहम के समर्थन वाले इस द्विदलीय विधेयक का समर्थन किया था. ग्राहम का तर्क था कि इस तरह की धमकी से अमेरिका के राष्ट्रपति को भारत, चीन और ब्राजील पर दबाव बनाने में मदद मिलेगी. इससे ये देश रूस से मिलने वाला रियायती कच्चा तेल खरीदना कम कर सकते हैं.
इस प्रस्ताव में अमेरिका में आने वाले रूसी सामान पर कम से कम 500% शुल्क लगाने की बात भी शामिल थी. इसका व्यापक उद्देश्य रूस के साथ कारोबार करने की आर्थिक कीमत बढ़ाना और दूसरे देशों को मॉस्को के साथ अपने ऊर्जा संबंधों पर दोबारा विचार करने के लिए मजबूर करना था.
भारत के लिए यह खतरा खास तौर पर अहम था. फरवरी 2022 में रूस के यूक्रेन पर हमले के बाद पश्चिमी देशों ने रूस पर अपनी निर्भरता घटाई, तो भारत ने रूसी कच्चे तेल की खरीद बढ़ा दी थी. रियायती दरों पर मिलने वाला तेल भारतीय रिफाइनरियों के लिए अंतरराष्ट्रीय बाजार से किफायती आपूर्ति हासिल करने का अहम जरिया बन गया था. भारत का रुख रहा है कि 1.4 अरब लोगों की ऊर्जा जरूरतों को देखते हुए तेल खरीदने के फैसले बदलते वैश्विक बाजार और किफायती आपूर्ति की जरूरत के हिसाब से लिए जाने चाहिए. ऐसे में प्रस्तावित टैरिफ से भारत की ऊर्जा नीति और अमेरिका के साथ व्यापारिक रिश्तों के बीच तनाव बढ़ने का खतरा था.
500% से घटकर 100% कैसे हुआ टैरिफ?
बाद में विधेयक के संशोधित संस्करण में रूस से ऊर्जा खरीदने वाले बड़े देशों पर टैरिफ लगाने की अधिकतम सीमा 500% से घटाकर 100% कर दी गई. हालांकि, इसका मूल मकसद वही रहा. अमेरिकी राष्ट्रपति को रूस से तेल और गैस खरीदने वाले देशों के सामान पर टैरिफ लगाकर उनकी खरीदारी की नीति बदलने के लिए दबाव बनाने का अधिकार मिलना था.
18 सितंबर 2026 को ट्रंप ने लिंडसे ओ. ग्राहम सैंक्शनिंग रशिया एंड ईरान एक्ट, 2026 पर हस्ताक्षर किए. इस कानून के तहत रूस से ऊर्जा आयात करने वाले दुनिया के पांच सबसे बड़े देशों पर 100% तक टैरिफ लगाने का अधिकार दिया गया. कानून में रूस के खिलाफ प्रतिबंध बढ़ाने और पहले से लागू प्रतिबंधों से बचने में मदद करने वाली संस्थाओं के खिलाफ कार्रवाई का प्रावधान भी किया गया. भारत के लिए यह बदलाव महत्वपूर्ण था, क्योंकि इतना ऊंचा टैरिफ सिर्फ कच्चे तेल की खरीद तक सीमित नहीं रहता. अमेरिका में भारतीय सामान पर भारी शुल्क लगने से भारतीय निर्यातकों पर दबाव पड़ सकता था और दोनों देशों के बीच व्यापार वार्ता भी प्रभावित हो सकती थी.
इससे भारत के सामने मुश्किल स्थिति बनती. रूस से तेल की खरीद घटाने पर ऊर्जा आपूर्ति और उसकी लागत पर असर पड़ सकता था, जबकि खरीद जारी रखने पर अमेरिका में भारतीय सामान पर भारी टैरिफ लगने का खतरा था. चीन और तुर्की को भी रूस से ऊर्जा खरीदने के कारण इसी तरह के दबाव का सामना करना पड़ सकता था.
100% टैरिफ से अब अस्थायी छूट कैसे मिली?
इस मामले में अगला बड़ा बदलाव 17 अक्टूबर को आया. ट्रंप ने ग्राहम कानून में मौजूद छूट के प्रावधान का इस्तेमाल करते हुए एक कार्यकारी आदेश जारी किया. इसके तहत अमेरिका के राष्ट्रीय हितों का हवाला देकर कानून के तहत आने वाले कुछ तय प्रतिबंधों, पाबंदियों और शुल्कों के लागू होने पर रोक लगा दी गई.
इस फैसले का मतलब यह नहीं है कि कानून खत्म हो गया है या राष्ट्रपति ने फ्यूचर में टैरिफ लगाने का अधिकार हमेशा के लिए छोड़ दिया है. इसके बजाय, तय उपायों को फिलहाल लागू नहीं किया जाएगा यानी 100% तक टैरिफ लगाने का प्रावधान कानून में मौजूद है, लेकिन छूट के कारण उससे जुड़ी तय कार्रवाइयों पर अभी रोक है.
इस फैसले के पीछे अमेरिका की तत्काल आर्थिक जरूरतें भी अहम बताई जा रही हैं. ट्रंप रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ मिलकर रूसी डीजल की आपूर्ति को वैश्विक बाजार में लाने की कोशिश कर रहे हैं. इसका मकसद अमेरिका में डीजल की कीमतों को कम करना है, जो 3 नवंबर को होने वाले मध्यावधि चुनाव से पहले रिकॉर्ड ऊंचाई के आसपास बनी हुई हैं.
ऐसे में एक तरफ रूस से डीजल की अतिरिक्त आपूर्ति हासिल करने की कोशिश करना और दूसरी तरफ रूस से ऊर्जा खरीदने वाले देशों पर भारी टैरिफ लगाना अमेरिका के इस प्रयास को मुश्किल बना सकता था. प्रतिबंधों और शुल्कों पर अस्थायी रोक से अमेरिकी प्रशासन को घरेलू ईंधन कीमतों से निपटने के लिए कुछ गुंजाइश मिलती है.
भारत को फिलहाल राहत, लेकिन खतरा पूरी तरह खत्म नहीं
ट्रंप के इस फैसले से भारत को रूस से तेल खरीदने के कारण तुरंत नए टैरिफ लगाए जाने का खतरा कम हुआ है. इससे भारत-अमेरिका व्यापार वार्ता में एक और अड़चन आने की आशंका भी फिलहाल घटी है. चीन और तुर्की को भी तत्काल दंडात्मक कार्रवाई का जोखिम कम होने से राहत मिली है.
हालांकि, अमेरिका में इस फैसले की आलोचना भी हुई है. कुछ सांसदों ने रूस पर दबाव बढ़ाने के लिए बनाए गए प्रावधानों को रोकने पर आपत्ति जताई है. द्विदलीय समूह के कुछ सीनेटरों ने ट्रंप से कानून लागू करने की अपील की थी, न कि रूसी डीजल की आपूर्ति को लेकर पुतिन के साथ किसी व्यवस्था को प्राथमिकता देने की.
कुल मिलाकर, 500% टैरिफ के शुरुआती प्रस्ताव से लेकर 100% की कानूनी सीमा और फिर अस्थायी छूट तक का घटनाक्रम दिखाता है कि अमेरिका रूस पर दबाव बढ़ाने के साथ अपनी घरेलू आर्थिक जरूरतों और दूसरे देशों के साथ व्यापारिक रिश्तों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रहा है. भारत को फिलहाल राहत जरूर मिली है, लेकिन छूट अस्थायी होने के कारण आगे की स्थिति पर नजर रखना जरूरी होगा.
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