नेचुरल, 100% शुद्ध और प्रीमियम के दावे पर FSSAI की बढ़ती सख्ती! आखिर कौन चुकाएगा कीमत; कंपनियां या ग्राहक?

FSSAI की बढ़ती सख्ती से शराब, FMCG, रेस्टोरेंट और क्विक कॉमर्स कंपनियां चर्चा में हैं. United Spirits और Pernod Ricard के प्रोडक्ट की जांच हुई, जबकि कुछ FMCG कंपनियों को दावों में बदलाव करना पड़ा. Domino’s, Pizza Hut और KFC के आउटलेट पर भी कार्रवाई हुई. ऐसे में इसका असर आखिर किसे चुकाना होगा.

fssai की कंपनियों पर बढ़ती कार्रवाई Image Credit:

FSSAI Action: देश में खाने-पीने के कारोबार पर फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया (FSSAI) की सख्ती बढ़ रही है. FMCG, शराब, क्विक सर्विस रेस्टोरेंट (QSR) और ऑनलाइन फूड प्लेटफॉर्म तक रेगुलेटरी की कार्रवाई का दायरा बढ़ा है. देश की करीब 200 लाख करोड़ रुपये की खपत वाली अर्थव्यवस्था में इस कार्रवाई से कंपनियों की लागत, ब्रांड की छवि और कारोबार पर असर पड़ सकता है. हालांकि, हर कंपनी पर इसका असर एक जैसा नहीं होगा.

इकोनॉमिक टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, FSSAI की सख्ती का असर अलग-अलग कारोबार पर अलग तरह से पड़ेगा. छोटे और सीधे ग्राहकों को सामान बेचने वाले D2C ब्रांड नियमों के मुताबिक खुद को बड़ी FMCG कंपनियों की तुलना में तेजी से ढाल सकते हैं. वहीं, क्विक सर्विस रेस्टोरेंट यानी QSR कंपनियों को साफ-सफाई और नियमों के पालन पर ज्यादा खर्च करना पड़ सकता है. क्विक कॉमर्स पर इसका सीधा असर सीमित रहने की उम्मीद है, जबकि नकली या मिलावटी पनीर जैसे प्रोडक्ट पर कार्रवाई से संगठित डेयरी कंपनियों को फायदा मिल सकता है.

शराब कंपनियों पर सबसे ज्यादा दिखा असर

शराब बनाने वाली कंपनी United Spirits पर FSSAI की कार्रवाई ने ध्यान खींचा है. अगस्त में बेंगलुरु स्थित कंपनी की एक इकाई में करीब 18,000 पेटियों में रखी शराब की बोतलें जब्त की गईं. यह कार्रवाई रिसाइकल्ड PET बोतलों पर जरूरी निशान नहीं होने के आरोपों से जुड़ी थी. प्रभावित ब्रांडों में Smirnoff, DSP Black Deluxe और VAT 69 शामिल थे.

FSSAI ने कुछ व्हिस्की और रम ब्रांडों में अतिरिक्त फ्लेवरिंग को लेकर भी सवाल उठाए. इसके बाद कंपनी से Royal Challenge, Antiquity Blue और McDowell’s No. 1 Celebration Rum के फॉर्मूले में बदलाव कर तीन महीने के भीतर देशभर में लागू करने को कहा गया. हालांकि, बाद में FSSAI ने United Spirits की बारामती इकाई में बनी एक फ्लेवर्ड स्पिरिट की बिक्री पर लगी रोक से जुड़ा आदेश वापस ले लिया.

दूसरी ओर, Pernod Ricard की बेंगलुरु इकाई का भी निरीक्षण किया गया और Blenders Pride तथा Royal Stag के नमूने लिए गए. रिपोर्ट के मुताबिक, इन कार्रवाइयों से आने वाले समय में United Spirits और Pernod Ricard को लेकर बाजार की धारणा प्रभावित हो सकती है. हालांकि, सीधा वित्तीय असर सीमित रहने की उम्मीद है. फिलहाल बड़ा जोखिम नियमों के पालन पर बढ़ने वाला खर्च और कंपनियों की छवि से जुड़ा है. अगर ऐसी समस्याएं बार-बार सामने आती हैं, तो असर ज्यादा गंभीर हो सकता है.

FMCG कंपनियों के विज्ञापनों और दावों पर नजर

FMCG कंपनियों के सामने अलग तरह की चुनौती है. FSSAI ने प्रोडक्ट के दावों, लेबल, कैटेगरी, सामग्री की जानकारी और पोषण से संबंधी डिस्क्रिप्शन की जांच तेज की है. Amway India, Emami, Bonn Biscuits और Apis India ने रेगुलेटरी कार्रवाई के बाद अपने “100%” वाले दावों को वापस लिया या उनमें बदलाव किया. वहीं, Dabur, Ferns N Petals और Lotte India ने प्रोडक्ट की कैटेगरी, सामग्री की जानकारी और तुलनात्मक या वीगन दावों से जुड़े नोटिस मिलने के बाद सुधारात्मक कदम उठाए.

रिपोर्ट के मुताबिक इन घटनाओं का असर मुख्य रूप से निवेशकों की धारणा और कंपनियों की ओर से दी जाने वाली जानकारी पर पड़ सकता है. कई मामलों में दावों को वापस लेना या बदलना मौजूदा नियमों की सख्त व्याख्या का नतीजा हो सकता है. इसे बड़े स्तर पर प्रोडक्ट की सुरक्षा में खामी का सबूत नहीं माना जा सकता. इससे प्रोडक्ट वापस लेने या प्रोडक्ट बंद होने का जोखिम सीमित रह सकता है.

हालांकि, लंबे समय में इसका असर ब्रांड की स्ट्रेटजी पर पड़ सकता है. कंपनियों को “नेचुरल”, “100%” और “प्रीमियम” जैसे शब्दों के इस्तेमाल में ज्यादा सावधानी बरतनी पड़ सकती है. इसके अलावा, कानूनी जांच, प्रोडक्ट टेस्टिंग, पैकेजिंग में बदलाव और नियमों के पालन से जुड़े सिस्टम पर खर्च बढ़ सकता है. बड़ी कंपनियों के लिए इन खर्चों को संभालना अपेक्षाकृत आसान हो सकता है, लेकिन छोटी कंपनियों को अपने प्रोडक्ट, पैकेजिंग और डिस्ट्रीब्यूशन में बदलाव करने पड़ सकते हैं. ऐसे में नियमों का पालन करना बाजार में कंपटीशन का जरूरी हिस्सा बन सकता है.

Domino’s, Pizza Hut और KFC पर कार्रवाई

रेस्टोरेंट कारोबार में भी खाद्य सुरक्षा और साफ-सफाई से जुड़े मामले सामने आए हैं. मंगलुरु में शिकायत के बाद KFC के एक आउटलेट को सील किया गया. वहां खराब चिकन की शिकायत के साथ इस्तेमाल किए गए खाना पकाने के तेल की एक्सपायरी से जुड़ी समस्या भी सामने आई. नमूने जांच के लिए भेजे गए. महाराष्ट्र के राज्य खाद्य एवं औषधि प्रशासन ने Jubilant FoodWorks द्वारा संचालित Domino’s के चार आउटलेट और Sapphire Foods India द्वारा संचालित Pizza Hut के एक आउटलेट का लाइसेंस कैंसिल किया. इन मामलों में साफ-सफाई, खाद्य पदार्थों को अलग रखने, कीट कंट्रोल, तापमान की निगरानी और बुनियादी सुविधाओं से जुड़ी समस्याएं सामने आईं.

हालांकि पांच आउटलेट पर कार्रवाई से कंपनियों के कुल कारोबार पर सीधा असर सीमित हो सकता है. लेकिन अगर ऐसी घटनाएं बार-बार होती हैं, तो ग्राहकों का भरोसा कमजोर पड़ सकता है. इससे बिक्री और मुनाफे पर भी दबाव आ सकता है.

क्विक कॉमर्स कंपनियों पर भी कार्रवाई

FSSAI ने अमेजन, स्विगी इंस्टामार्ट, बिगबास्केट, फ्लिपकार्ट इंडिया और Zepto के खिलाफ कथित गलत लेबलिंग, भ्रामक दावों और प्रतिबंधित या जहरीले खाद्य पदार्थों की बिक्री अथवा उन्हें प्लेटफॉर्म पर दिखाने से जुड़े मामलों में कार्रवाई शुरू की है.

ऐसे मामलों में कंपनियों को विक्रेताओं की जांच, प्रोडक्ट की डिटेल, ऑनलाइन लिस्टिंग और सप्लाई चेन की निगरानी मजबूत करनी पड़ सकती है. इससे नियमों के पालन पर खर्च बढ़ सकता है. हालांकि, अभी यह मानना सही नहीं होगा कि इन सभी कंपनियों के कारोबार या मुनाफे पर बड़ा असर पड़ना तय है. दूसरी तरफ, अगर एनालॉग प्रोडक्ट को पनीर के रूप में बेचे जाने पर सख्ती बढ़ती है, तो इससे नियमों का पालन करने वाली संगठित डेयरी कंपनियों को फायदा मिल सकता है.

किस कंपनी पर कितना जोखिम?

United Spirits और Pernod Ricard के लिए मुख्य जोखिम शराब के नियमों, उत्पादों के फॉर्मूले और ब्रांड की छवि से जुड़ा है. FMCG कंपनियों के लिए प्रोडक्ट पर किए गए दावों, पैकेजिंग और कानूनी समीक्षा का खर्च बढ़ सकता है. वहीं, QSR कंपनियों को साफ-सफाई और खाद्य सुरक्षा के नियमों पर ज्यादा ध्यान देना होगा. क्विक कॉमर्स कंपनियों के लिए विक्रेताओं और ऑनलाइन उत्पादों की निगरानी अहम होगी.

इसलिए सभी कंपनियों को एक ही नजर से देखना सही नहीं होगा. किसी एक मामले में नोटिस या कार्रवाई होना अपने आप में यह साबित नहीं करता कि कंपनी के पूरे कारोबार में समस्या है. असली जोखिम इस बात पर निर्भर करेगा कि मामला कितना गंभीर है, कंपनी कितनी जल्दी सुधार करती है और क्या ऐसी घटनाएं बार-बार सामने आती हैं.

आखिर इस सख्ती की कीमत कौन चुकाएगा?

फिलहाल इसका खर्च पूरी सप्लाई चेन में बंट सकता है. कंपनियों को प्रोडक्ट टेस्टिंग, कानूनी जांच, पैकेजिंग और नियमों के पालन पर ज्यादा खर्च करना पड़ सकता है. कुछ कंपनियों को अस्थायी रूप से बिक्री में कमी, प्रोडक्ट के फॉर्मूलेशन में बदलाव या ब्रांड से जुड़ी दिक्कतों का सामना करना पड़ सकता है. अगर कंपनियां इस अतिरिक्त खर्च को ग्राहकों तक पहुंचाती हैं, तो सामान की कीमतें बढ़ सकती हैं. वहीं, छोटे और असंगठित कारोबार के लिए सख्त नियमों का पालन करना मुश्किल हो सकता है, जिससे बाजार में उनकी हिस्सेदारी घटने का जोखिम है.

निवेशकों के लिए भी इसका मतलब है कि अब कंज्यूमर कंपनियों का आकलन सिर्फ उनके ब्रांड और डिस्ट्रीब्यूशन के आधार पर नहीं होगा. नियमों का पालन करने की क्षमता भी अहम हो जाएगी.

फिलहाल FSSAI की कार्रवाई को पूरे कंज्यूमर सेक्टर की कमाई पर बड़े संकट के तौर पर नहीं देखा जा रहा है. लेकिन यह साफ है कि कंपनियों के लिए नियमों का पालन करना अब सिर्फ कानूनी जरूरत नहीं, बल्कि लागत, कंपटीशन और निवेशकों के भरोसे से जुड़ा अहम मुद्दा बनता जा रहा है.

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