ट्रंप के टैरिफ को धता बता देगी ये ट्रेड डील, नई इबारत लिखेंगे भारत और यूरोपीय संघ; जानें- इंडिया को क्या मिलेगा

भारत और यूरोपियन यूनियन के बीच 'फ्री ट्रेड एग्रीमेंट' अब पूरा होने की कगार पर आ पहुंचा है. प्रस्तावित फ्री ट्रेड एग्रीमेंट का पैमाना कॉमर्स मिनिस्टर पीयूष गोयल के FTA के बारे में दिए गए बयान से साफ है. उन्होंने इसे 'मदर ऑफ ऑल डील्स' कहा है.

भारत और यूरोपीय संघ के बीच ट्रेड एग्रीमेंट. Image Credit: Getty image

दुनिया के व्यापार के सागर में लहरे उफान पर हैं. अमेरिका से आए टैरिफ के तूफान ने ग्लोबल ट्रेड की नाव को मंझधार में फंसा दिया है. फिलहाल यह तूफान थमने की बजाय और तेज होता हुआ नजर आ रहा है और ग्लोब पर मौजूद देशों के विदेशी कारोबार की जड़ें हिला रहा है. कुछ समय तक इंतजार करने के बाद, अब अलग-अलग देश मंझधार में फंसी अपनी निर्यात की नाव को उससे निकालने की कोशिश में जुट गए हैं. इसी कोशिश में भारत करीब दो दशक से लंबित पड़े के एक समझौते की फाइल पर जमी धूल को झाड़कर, मजबूत कदम उठाने को तैयार है. दरअसल, भारत और यूरोपियन यूनियन के बीच ‘फ्री ट्रेड एग्रीमेंट’ अब पूरा होने की कगार पर आ पहुंचा है. भारत-और यूरोपियन यूनियन, अमेरिकी राष्ट्रपति के टैरिफ के बीच व्यापार की एक नई राह तैयार करने की तरफ बढ़ चले हैं. यह डील भारत के लिए कितनी अहम है और इससे यूरोपियन यूनियन को क्या हासिल होगा, आइए इसकी परत दर परत को आसान भाषा में समझने की कोशिश करते हैं.

मदर ऑफ ऑल डील्स

भारत और यूरोपियन यूनियन एक ट्रेड डील को फाइनल करने के लिए पूरी तरह तैयार हैं, जिसे फाइनल होने में लगभग दो दशक लग गए हैं. प्रस्तावित फ्री ट्रेड एग्रीमेंट का पैमाना कॉमर्स मिनिस्टर पीयूष गोयल के FTA के बारे में दिए गए बयान से साफ है. उन्होंने इसे ‘मदर ऑफ ऑल डील्स’ कहा है. ट्रेड डील पर औपचारिक साइनिंग 26-27 जनवरी के आसपास होने की उम्मीद है, जब EU के सीनियर नेता भारत आएंगे. इस ट्रेड डील की घोषणा नई दिल्ली में 16वें भारत-EU शिखर सम्मेलन में होने की संभावना है.

इस समझौते को अब आधिकारिक तौर पर इंडिया-ईयू फ्री ट्रेड एग्रीमेंट कहा जाता है, जिसने पहले इस्तेमाल किए जा रहे ब्रॉड-बेस्ड ट्रेड एंड इन्वेस्टमेंट एग्रीमेंट लेबल की जगह ले ली है, जो 2007 में बातचीत शुरू होने के बाद से इस्तेमाल हो रहा था. भारत-ईयू व्यापार की गतिशीलता अगर यह समझौता हो जाता है, तो इंडिया-ईयू FTA पिछले चार सालों में भारत का नौवां व्यापार समझौता होगा, जो मॉरीशस, यूएई, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, ओमान, EFTA ब्लॉक, यूके और इंडो-पैसिफिक इकोनॉमिक फ्रेमवर्क के तहत साझेदारों के साथ हुए समझौतों की बढ़ती सूची में शामिल हो जाएगा.

भारत-EU फ्री ट्रेड एग्रीमेंट – भारत के लिए इसमें क्या है?

एक बार फाइनल होने के बाद, यह समझौता आर्थिक पैमाने और रेगुलेटरी कवरेज दोनों के मामले में भारत का सबसे बड़ा फ्री ट्रेड एग्रीमेंट बन जाएगा. यह एक सिंगल फ्रेमवर्क के जरिए सभी 27 EU सदस्य देशों को प्रेफरेंशियल एक्सेस देगा, क्योंकि EU एक कस्टम यूनियन के तौर पर काम करता है. ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (GTRI) के एक एनालिसिस के अनुसार, भारत के लिए, प्रस्तावित समझौता दुनिया के सबसे अमीर और भरोसेमंद आर्थिक ब्लॉकों में से एक, यूरोपियन यूनियन के लिए दरवाजे खोलता है, जिसकी GDP 18–22 ट्रिलियन यूरो होने का अनुमान है और जिसका बाजार लगभग 450 मिलियन से ज्यादा इनकम वाले कंज्यूमर्स तक फैला हुआ है.

क्या खत्म हो गए पुराने मतभेद?

GTRI एक जरूरी बात बताता है. दरअसल ऐसा नहीं कि भारत-EU फ्री ट्रेड एग्रीमेंट इसलिए पूरा होने वाला नहीं है कि पुराने मतभेद खत्म हो गए हैं, बल्कि बदलते जियो-पॉलिटिकल हालात ने दोनों पक्षों को अधिक प्रैक्टिकल तरीका अपनाने पर मजबूर किया है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा शुरू किए गए ट्रेड वॉर को देखते हुए, यह एग्रीमेंट अपने समय के हिसाब से खास अहमियत रखता है. जबकि EU को अब अमेरिका से 10 फीसदी नए टैरिफ का सामना करना पड़ रहा है, जो बढ़कर 25 फीसदी तक हो सकते हैं. भारत पहले ही अमेरिका को होने वाले अपने एक्सपोर्ट पर 50 फीसदी टैरिफ की मार झेल रहा है.

भारत को क्या मिलेगा?

EU को क्या फायदा होगा?

एक्सपोर्ट में फायदा

GTRI के फाउंडर अजय श्रीवास्तव कहते हैं, ‘इन टैरिफ को हटाने से एक्सपोर्ट में साफ तौर पर फायदा होगा. एक FTA खोए हुए मार्केट एक्सेस को वापस दिलाएगा, गारमेंट्स, फार्मास्यूटिकल्स, स्टील, पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स और मशीनरी जैसे मुख्य एक्सपोर्ट पर टैरिफ कम करेगा और भारतीय कंपनियों को अधिक अमेरिकी टैरिफ से होने वाले झटकों को बेहतर ढंग से झेलने में मदद करेगा. उतना ही जरूरी सर्विसेज में मार्केट खोलने से खासकर IT और दूसरे स्किल-बेस्ड सेक्टर्स में, भारत अपने बड़े टैलेंट बेस का फायदा उठा पाएगा और यूरोप में सेवाओं का एक्सपोर्ट बढ़ा पाएगा. इससे अमेरिकी मार्केट पर निर्भरता कम हो पाएगी.

कृषि और डेयरी बाहर

भारत-EU फ्री ट्रेड एग्रीमेंट पर बातचीत में एक बड़ा और जटिल एजेंडा शामिल है, जिसमें गुड्स और सर्विसेज अनसुलझे मतभेदों के केंद्र में हैं. EU भारत पर 95% से अधिक इंपोर्ट पर टैरिफ खत्म करने का दबाव डाल रहा है, जबकि नई दिल्ली 90 फीसदी के करीब जाने को तैयार है, लेकिन कृषि और डेयरी को इसके दायरे से बाहर रखा है.

दरअसल, भारत-यूरोपीय संघ FTA बातचीत में सामान, सेवाओं, निवेश और व्यापार नियमों सहित एक व्यापक और जटिल एजेंडा शामिल है. हालांकि दोनों पक्ष इस डील में काफी फायदा देखते हैं, लेकिन मार्केट एक्सेस, रेगुलेटरी ऑटोनॉमी और संवेदनशील घरेलू सेक्टरों पर अभी भी गहरे मतभेद बने हुए हैं. अंतिम नतीजा इस बात पर निर्भर करेगा कि दोनों पक्ष बिना रेड लाइन पार किए कितनी हद तक समझौता करने को तैयार हैं.

दोनों पक्ष एग्रीकल्चर और डेयरी को बाहर रखने पर सहमत हुए हैं. यह एक तरह से यह मानना ​​है कि चीज और स्किम्ड मिल्क पाउडर पर टैरिफ कम करने के लिए EU का दबाव भारत के कृषि क्षेत्र के लिए एक लाल रेखा पार करना है. यह अमेरिका के साथ बातचीत के लिए भी एक आधार बन सकता है.

वाइन और व्हिस्की

EU की वाइन और व्हिस्की पर टैरिफ में कटौती एक और सेंसिटिव एरिया है. भारत में इम्पोर्टेड वाइन पर 150 फीसदी टैरिफ लगता है, जिसे यूरोपियन प्रोड्यूसर 10–20 फीसदी तक कम करना चाहते हैं. भारत के ऑस्ट्रेलिया ट्रेड डील में इस्तेमाल किए गए मॉडल को फॉलो करने की अधिक संभावना है, जिसके तहत वाइन टैरिफ 10 साल में धीरे-धीरे घटकर 50 फीसदी हो जाएगा.

भारत-ईयू व्यापार-क्षेत्रीय व्यापार मूल्य और भारतीय और ईयू सामानों पर लगने वाले भारित औसत टैरिफ-वित्त वर्ष 2025 डेटा

क्रम संख्यासेक्टर्सभारत का EU को निर्यात (मूल्य – US$ अरब)भारतीय वस्तुओं पर EU का भारित औसत शुल्क (%)EU का भारत को निर्यात (मूल्य – US$ अरब)EU वस्तुओं पर भारत का भारित औसत शुल्क (%)
1कृषि, मांस और प्रोसेस्ड फूड5.215.21.742.7
2अयस्क, खनिज और पेट्रोलियम15.221.24.8
3केमिकल और औषधि (फार्मास्यूटिकल्स)10.337.69.9
4लोहा, इस्पात और आधार धातुओं के उत्पाद6.61.55.47.6
5विद्युत और दूरसंचार11.30.89.44.7
6वस्त्र और परिधान7.31019.5
7मशीनरी और कंप्यूटर52.5138.4
8हीरे, सोना और उनके उत्पाद2.50.52.31.7
9ऑटोमोबाइल2.23.72.135.5
10प्लास्टिक और अन्य वस्तुएं1.15.82.310.4
11शेष उत्पाद9.23.314.57.4
12कुल75.93.860.79.3
13कृषि को छोड़कर कुल70.73598.4
सोर्स-GTRI

ऑटोमोबाइल

ऑटोमोबाइल में यूरोपियन कार बनाने वाली कंपनियां चाहती हैं कि भारत पूरी तरह से बनी गाड़ियों पर इम्पोर्ट ड्यूटी 100–125 फीसदी से घटाकर 10–20 फीसदी कर दे, जिससे यूरोपियन लग्जरी कारों की कीमतें तेजी से कम हो जाएंगी. यूरोपियन यूनियन पहले से ही भारत को हर साल 2 अरब डॉलर से ज्यादा की कारें और ऑटो पार्ट्स एक्सपोर्ट करता है.

लेबर-इंटेंसिव एक्सपोर्ट

भारत के लेबर-इंटेंसिव एक्सपोर्ट जैसे टेक्सटाइल, गारमेंट्स, लेदर, फुटवियर और ऑटो पार्ट्स पर EU का 6–20 फीसदी टैरिफ लगता है, जिससे भारतीय एक्सपोर्टर्स नुकसान में रहते हैं. इसके उलट, बांग्लादेश को EU की प्रेफरेंस स्कीम के तहत जीरो-ड्यूटी एक्सेस मिलता है, जबकि वियतनाम को यूरोप के साथ अपने FTA के तहत टैरिफ-फ्री एंट्री का फायदा मिलता है. भारत-EU FTA से ये ड्यूटी कम होंगी या खत्म हो जाएंगी, जिससे भारत की कॉम्पिटिटिवनेस बेहतर होगी और उसके एक्सपोर्टर्स- खासकर टेक्सटाइल और गारमेंट्स सेक्टर में, EU मार्केट में अधिक बराबरी से मुकाबला कर पाएंगे.

सर्विसेज सेक्टर

सर्विसेज के क्षेत्र में भारत लोकल प्रेजेंस, ज्यादा सैलरी थ्रेशहोल्ड और रिमोट डिलीवरी पर प्रतिबंधों के लिए EU की जरूरतों का विरोध कर रहा है, जबकि डेटा एडिक्वेसी स्टेटस, आसान वीजा, सोशल सिक्योरिटी कोऑर्डिनेशन और क्वालिफिकेशन्स की मान्यता चाहता है. EU, बदले में डेटा प्रोटेक्शन पर कमिटमेंट्स के साथ-साथ भारत के फाइनेंशियल, लीगल और बैंकिंग सेक्टर्स तक अधिक एक्सेस की मांग कर रहा है.

कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म

कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म (CBAM) मुद्दे को सुलझाना भारत के लिए एक प्राथमिकता है क्योंकि यह किसी भी टैरिफ कटौती से होने वाले फायदों को कमजोर करने का खतरा पैदा करता है. EU का कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म, जो पहले से ही स्टील और एल्यूमीनियम जैसे प्रोडक्ट्स पर लागू है, FTA के तहत कस्टम ड्यूटी खत्म होने पर भी भारतीय एक्सपोर्ट्स पर प्रभावी रूप से एक अतिरिक्त चार्ज लगाता है. यह असर MSMEs के लिए खास तौर पर गंभीर है, क्योंकि उन्हें अधिक कंप्लायंस लागत, जटिल डिस्क्लोजर ऑब्लिगेशन्स और डिफॉल्ट एमिशन वैल्यू के आधार पर पेनल्टी का जोखिम उठाना पड़ता है, जो वास्तविक कार्बन इंटेंसिटी को बढ़ा-चढ़ाकर बता सकते हैं.

नॉन-टैरिफ बाधाएं

टैरिफ के अलावा, भारतीय एक्सपोर्टर्स को EU में कई तरह की नॉन-टैरिफ बाधाओं का सामना करना पड़ता है जो अक्सर मार्केट खोलने के फायदों को कम कर देती हैं. इनमें फार्मास्युटिकल अप्रूवल में देरी, सख्त सैनिटरी और फाइटोसैनिटरी जरूरतें जो भैंस के मांस जैसे खाद्य और कृषि एक्सपोर्ट्स को प्रभावित करती हैं और जटिल टेस्टिंग, सर्टिफिकेशन और कन्फर्मिटी-असेसमेंट प्रक्रियाएं शामिल हैं. बासमती चावल, मसाले और चाय जैसे कृषि प्रोडक्ट्स को अक्सर अस्वीकार कर दिया जाता है या अनुमेय कीटनाशक अवशेष सीमाओं में भारी कमी के बाद गहन निरीक्षण के अधीन किया जाता है, जबकि समुद्री भोजन एक्सपोर्ट्स को एंटीबायोटिक उपयोग पर चिंताओं के कारण हाई सैंपलिंग दरों का सामना करना पड़ता है.

सरकारी खरीद और अन्य मुद्दे

EU भारत के 600 अरब डॉलर के सरकारी खरीद बाजार में एक्सेस चाहता है, जिसमें केंद्र सरकार और पब्लिक सेक्टर की कंपनियों द्वारा दिए गए कॉन्ट्रैक्ट शामिल हैं. भारत शायद सीमित एक्सेस देगा, यह बताते हुए कि EU का अपना खरीद बाजार भी विदेशी फर्मों के लिए काफी हद तक बंद है. ज्यादा से ज्यादा, नई दिल्ली, यूनाइटेड किंग्डम के साथ हुए समझौतों जैसे ही सीमित वादे कर सकती है.

बातचीत में इतना समय क्यों लगा?

आगे का रास्ता: रियायतों और घरेलू हितों के बीच संतुलन

भारत-ईयू FTA में यूरोप के साथ भारत के व्यापार संबंधों को नया आकार देने और लंबे समय तक एक्सपोर्ट ग्रोथ, इन्वेस्टमेंट फ्लो और सप्लाई-चेन इंटीग्रेशन को मजबूत करने की क्षमता है. यह सामान के व्यापार में साफ फायदे देता है, खासकर बढ़ते प्रोटेक्शनिज़्म की दुनिया में लेबर-इंटेंसिव सेक्टर के लिए. साथ ही, अनसुलझे मुद्दे—खासकर CBAM, सेवाओं की आवाजाही और नॉन-टैरिफ बाधाएं, असंतुलन का बड़ा जोखिम पैदा करते हैं. यह समझौता आखिरकार ग्रोथ को बढ़ावा देने वाली पार्टनरशिप बनेगा या रणनीतिक रूप से असंतुलित डील, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि इन आखिरी मुद्दों को कैसे सुलझाया जाता है.

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