2 अक्टूबर को क्या UPI से दुकानों पर नहीं कर पाएंगे पेमेंट, क्यों QR कोड को काले कपड़े से ढक देंगे रिटेलर्स?
यह विरोध तब हो रहा है जब सरकार उस जीरो-MDR फ्रेमवर्क को बदलने की तैयारी कर रही है, जो लगभग छह साल से UPI पेमेंट पर लागू था. नए नियम के तहत, 15 अक्टूबर से मर्चेंट्स को 2,000 रुपये से ज्यादा के ट्रांसफर पर अतिरिक्त शुल्क लगेगा.

रिटेल स्टोर पर मोबाइल फोन, एक्सेसरीज और उनसे जुड़ी सेवाओं की खरीदारी करने वाले ग्राहकों को 2 अक्टूबर को UPI पेमेंट करने में परेशानी हो सकती है. मोबाइल रिटेलर्स ने UPI ट्रांजैक्शन पर प्रस्तावित 0.4% मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) के विरोध में ‘नो UPI डे’ मनाने का फैसला किया है. यह विरोध तब हो रहा है जब सरकार उस जीरो-MDR फ्रेमवर्क को बदलने की तैयारी कर रही है, जो लगभग छह साल से UPI पेमेंट पर लागू था.
अतिरिक्त शुल्क
नए नियम के तहत, 15 अक्टूबर से मर्चेंट्स को 2,000 रुपये से ज्यादा के ट्रांसफर पर अतिरिक्त शुल्क लगेगा. हालांकि, एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति के बीच UPI ट्रांसफर और छोटे मर्चेंट्स को किए जाने वाले पेमेंट पहले की तरह मुफ्त रहेंगे.
मोबाइल रिटेलर्स विरोध क्यों कर रहे हैं?
PTI की रिपोर्ट के मुताबिक, यह विरोध ‘ऑल इंडिया मोबाइल रिटेलर्स एसोसिएशन’ (AIMRA) ने बुलाया है. एसोसिएशन ने चिंता जताई है कि खास UPI पेमेंट पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) लगने से मोबाइल रिटेलर्स पर अतिरिक्त बोझ पड़ सकता है.
इस मुद्दे पर बात करते हुए, AIMRA के वाइस प्रेसिडेंट और दिल्ली-NCR प्रेसिडेंट तरविंदर सिंह ने कहा कि रिटेलर्स गांधी जयंती पर अपने UPI QR कोड को काले कपड़े से ढक देंगे और UPI पेमेंट स्वीकार नहीं करेंगे.
MDR जीरो रखने की मांग
न्यूज रिपोर्ट के अनुसार, इंडस्ट्री बॉडी के टॉप एग्जीक्यूटिव ने कहा, ‘अगर हम डिजिटल इंडिया चाहते हैं, तो UPI पर MDR जीरो ही रहना चाहिए. यह UPI या डिजिटल इंडिया के खिलाफ विरोध नहीं है. हमारी चिंता उन मर्चेंट्स पर पड़ने वाले अतिरिक्त वित्तीय बोझ को लेकर है जो डिजिटल पेमेंट स्वीकार करते हैं. अगर हम चाहते हैं कि डिजिटल इंडिया और आगे बढ़े, तो पूरे रिटेल इकोसिस्टम के लिए डिजिटल पेमेंट किफायती बने रहने चाहिए.’
इंडस्ट्री बॉडी की मांग
सिंह ने कहा कि AIMRA की साफ मांग है कि UPI मर्चेंट पेमेंट जीरो-MDR स्ट्रक्चर के तहत ही जारी रहने चाहिए.
25 सितंबर को वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने और स्पष्ट किया कि 2,000 रुपये से ज्यादा के खास UPI मर्चेंट पेमेंट पर लगने वाला नया 0.4% MDR मर्चेंट्स को देना होगा, न कि कस्टमर्स को.
न्यूज एजेंसी के अनुसार, उन्होंने पहले कहा था, ‘मुझे नहीं लगता कि कस्टमर्स को चिंता है, क्योंकि हम साफ कह रहे हैं कि इसका बोझ कंज्यूमर पर नहीं पड़ेगा. बेशक, मुझे यह कहते हुए खेद है कि कुछ लोग इसे ठीक से नहीं समझ पाए हैं. यह कंज्यूमर पर नहीं है.’
रिटेलर्स की कमाई पर क्या पड़ेगा असर?
AIMRA की ओर से वित्त मंत्री सीतारमण को सौंपी गई एक रिपोर्ट के मुताबिक, UPI पेमेंट पर MDR लगाने से उन छोटे रिटेलर्स को हर महीने 2,000 रुपये से 12,000 रुपये का नुकसान हो सकता है, जो हर महीने 5 लाख रुपये से 30 लाख रुपये तक के UPI ट्रांजैक्शन करते हैं.
एसोसिएशन ने कहा कि इससे रिटेलर्स की नेट इनकम का एक बड़ा हिस्सा खत्म हो सकता है. मोबाइल रिटेलर्स की संस्था का अनुमान है कि 0.4% MDR से पूरे भारत में छोटे मोबाइल रिटेलर्स पर हर महीने लगभग 40 करोड़ रुपये और सालाना लगभग 500 करोड़ रुपये का ऐसा बोझ पड़ेगा जिसे उठाना मुश्किल होगा.
किसके लिए राहत?
छोटे व्यापारियों को अनिवार्य जीरो-MDR नियमों से फायदा होगा, लेकिन यह राहत सिर्फ उन लोगों के लिए है जो UPI QR कोड के जरिए हर महीने 1 लाख रुपये तक का पेमेंट लेते हैं. यह वर्गीकरण अनौपचारिक स्ट्रीट वेंडर सेटअप और औपचारिक कमर्शियल मर्चेंट एक्वायरिंग अकाउंट्स के बीच की खाई को पाटता है, जिससे माइक्रो-बिजनेस के लिए जीरो कॉस्ट सुनिश्चित होती है.
क्या मर्चेंट MDR का बोझ ग्राहकों पर डाल सकते हैं?
नहीं, सरकार ने भरोसा दिलाया है कि अगर व्यापारी MDR का पेमेंट करना शुरू करते हैं तो भी ग्राहकों के लिए कीमतें नहीं बढ़ेंगी. ऐसा इसलिए है क्योंकि ज्यादा बिजनेस वॉल्यूम पाने के लिए व्यापारी आम तौर पर मामूली डिजिटल प्रोसेसिंग कॉस्ट खुद उठा लेते हैं.
ऑपरेशनल खर्च
नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (NPCI) ने नए UPI MDR फ्रेमवर्क से जुड़े FAQ सेक्शन में कहा है कि पेमेंट स्वीकार करने की लागत को सामान्य ऑपरेशनल खर्च माना जाता है, जिसकी भरपाई ज्यादा ग्राहकों के आने, ज्यादा औसत टिकट वैल्यू और कैश-हैंडलिंग के जोखिम कम होने से हो जाती है.
FAQ में कहा गया है, ‘क्योंकि प्रस्तावित UPI MDR क्रेडिट कार्ड फीस की तुलना में काफी कम है और सिर्फ कुछ खास ट्रांजैक्शन लिमिट से ऊपर ही लागू होता है, इसलिए दुकानदारों के पास रिटेल शेल्फ की कीमतें बढ़ाने का कोई आर्थिक कारण नहीं है. ग्राहक सामान और सेवाओं के लिए वही लिस्टेड कीमत चुकाते रहेंगे.
NPCI ने अपने FAQ में यह भी कहा है कि बैंकिंग संस्थान व्यापारियों और इंडस्ट्री बॉडीज के साथ मिलकर काम करेंगे ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि व्यापारी इस लेवी (शुल्क) का बोझ ग्राहकों पर न डालें.