रिटायरमेंट की उम्र तक ₹2 करोड़ का फंड तैयार, हर महीने कितने रुपये करें खर्च; इस फॉर्मूले से दूर करें कन्फ्यूजन
55 साल की उम्र में 2 करोड़ रुपये के फंड के साथ रिटायर होने पर अगले 30 साल तक खर्च चलाने के लिए सही निकासी योजना जरूरी है. हर महीने 50,000 रुपये निकालने पर सालाना निकासी 6 लाख रुपये होगी, जबकि 60,000 रुपये निकालने पर यह 7.2 लाख रुपये होगी. जानें महंगाई, बाजार के उतार-चढ़ाव और मेडिकल खर्चों के बीच रिटायरमेंट फंड कैसे संभालें.

Retirement Planning: 55 साल की उम्र में 2 करोड़ रुपये का रिटायरमेंट फंड होना आर्थिक सुरक्षा का भरोसा दे सकता है. लेकिन इस रकम से बाकि उम्र तक खर्च चलाना आसान नहीं होता है. महंगाई, इलाज का बढ़ता खर्च धीरे-धीरे रिटायरमेंट की बचत को कम कर सकते हैं. ऐसे में सिर्फ बड़ा फंड होना ही काफी नहीं है, बल्कि यह तय करना भी जरूरी है कि हर महीने कितनी रकम निकाली जाए, ताकि बचत लंबे समय तक चल सके.
फाइनेंशियल प्लानिंग में सबसे जरूरी बात यह है कि हर महीने के खर्च और निवेश से मिलने वाले लंबे समय के रिटर्न के बीच संतुलन बना रहे. रिटायरमेंट के शुरुआती सालों में जरूरत से ज्यादा पैसा निकालने से बचना चाहिए. इसके लिए पहले अपनी जरूरी जरूरतों और खर्चों का आकलन करना जरूरी है.
हर महीने कितने रुपये निकालना सही रहेगा?
2 करोड़ रुपये के रिटायरमेंट फंड से हर महीने 50,000 रुपये निकाले जाएं, तो साल भर में यह रकम 6 लाख रुपये होगी. जरूरत और आर्थिक स्थिति के हिसाब से इस रकम में समय-समय पर बदलाव किया जा सकता है. महंगाई, निवेश से मिलने वाला रिटर्न और रोजमर्रा के खर्च भी इस फैसले को प्रभावित करेंगे.
वहीं, अगर हर महीने 60,000 रुपये निकाले जाते हैं, तो तुरंत खर्च चलाने में ज्यादा सहूलियत मिल सकती है. लेकिन इससे भविष्य में अचानक आने वाले खर्चों के लिए बचत का अंतर कम हो सकता है. अगर निवेश से उम्मीद के मुताबिक रिटर्न नहीं मिलता, तो ज्यादा रकम निकालने से रिटायरमेंट फंड पर दबाव बढ़ सकता है.
₹50,000 निकालने पर 3% होगी सालाना निकासी दर
2 करोड़ रुपये के फंड से हर महीने 50,000 रुपये निकालने का मतलब पहले साल में 6 लाख रुपये निकालना. यह कुल फंड का 3 फीसदी है. वहीं, हर महीने 60,000 रुपये निकालने पर साल भर में 7.2 लाख रुपये की निकासी होगी. यह शुरुआती फंड का 3.6 फीसदी है.
हालांकि, ये आंकड़े उदाहरण के तौर पर हैं. इन्हें निश्चित नतीजा नहीं माना जाना चाहिए. असल नतीजे निवेश से मिलने वाले रिटर्न, महंगाई, टैक्स, निकासी की दर और बाजार में गिरावट किस समय आती है, इन सभी बातों पर निर्भर करेंगे.
रिटायरमेंट फंड को एक ही जगह निवेश न करें
रिटायरमेंट के पूरे फंड को किसी एक निवेश विकल्प, जैसे ज्यादा ब्याज देने वाली बैंक FD या डेट इंस्ट्रूमेंट में लगाना सही रणनीति नहीं हो सकती. निवेश का चुनाव व्यक्ति की जोखिम लेने की क्षमता, कर्ज, परिवार की जिम्मेदारियों और नियमित आमदनी की जरूरत के हिसाब से करना चाहिए.
इसके लिए सर्टिफाइड फाइनेंशियल एडवाइजर की मदद ली जा सकती है. जरूरत के हिसाब से इक्विटी, डेट और आसानी से निकाले जा सकने वाले निवेश विकल्पों का मिला-जुला पोर्टफोलियो बनाया जा सकता है. डेट और लिक्विड निवेश से नजदीकी समय के खर्च पूरे करने में मदद मिल सकती है, जबकि इक्विटी में निवेश लंबे समय में फंड को बढ़ाने और महंगाई के असर से निपटने में मदद कर सकता है. हालांकि, इक्विटी निवेश में बाजार का जोखिम बना रहता है.
मेडिकल खर्चों के लिए अलग इमरजेंसी फंड रखें
रिटायरमेंट के बाद अचानक आने वाले मेडिकल खर्च, बीमा प्रीमियम और दूसरे जरूरी खर्चों के लिए अलग इमरजेंसी फंड रखना महत्वपूर्ण है. इससे जरूरत पड़ने पर लंबी अवधि के निवेश को नुकसान में बेचने की मजबूरी कम हो सकती है. इसके अलावा, हर साल अपने खर्च और निवेश की समीक्षा करनी चाहिए. अगर बाजार में कमजोर प्रदर्शन के कारण पोर्टफोलियो की वैल्यू घटती है, तो गैर-जरूरी खर्चों में कटौती करने पर विचार किया जा सकता है. इससे निवेश को संभलने के लिए समय मिल सकता है.
रिटायरमेंट के 30 साल के लिए क्या है जरूरी?
55 साल की उम्र में 2 करोड़ रुपये का फंड लेकर रिटायर होने के बाद सिर्फ यह तय करना काफी नहीं है कि हर महीने कितने रुपये निकालने हैं. जरूरी है कि खर्चों को इस तरह संभाला जाए कि बचत लंबे समय तक चल सके. इसके लिए निकासी की दर पर नजर रखना, निवेश में विविधता बनाए रखना, मेडिकल खर्चों के लिए अलग रकम रखना और जरूरत के मुताबिक योजना में बदलाव करना जरूरी है.
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