रिकॉर्ड हाई से 11% फिसला Nifty Midcap 100, Smallcap शेयर भी धड़ाम; क्या बड़े शेयरों में है बेहतर मौका?
Nifty Midcap 100 रिकॉर्ड हाई से करीब 11% नीचे आ गया है. जानें स्मॉलकैप और मिडकैप शेयरों में बिकवाली, विदेशी निवेशकों की निकासी और कच्चे तेल की कीमतों का बाजार पर क्या असर पड़ रहा है.

शेयर बाजार में स्मॉलकैप और मिडकैप शेयरों पर बिकवाली का दबाव बढ़ गया है. कारोबार के दौरान BSE Smallcap Index में 2 फीसदी से ज्यादा और BSE Midcap Index में करीब 2 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई. वहीं, Nifty Midcap 100 और Nifty Smallcap 100 जैसे प्रमुख इंडेक्स भी करीब 3 फीसदी तक टूट गए. पिछले तीन महीनों के रुझान पर नजर डालें तो छोटे और मझोले शेयरों में गिरावट निफ्टी के मुकाबले ज्यादा रही है. अगस्त की शुरुआत से Nifty करीब 7 फीसदी नीचे आ चुका है. वहीं, Nifty Midcap 100 ने 26 अगस्त को 64,451 का रिकॉर्ड स्तर छुआ था. बुधवार को यह 57,566 पर बंद हुआ. इस तरह यह अपने रिकॉर्ड हाई से करीब 11 फीसदी नीचे आ गया है.
सितंबर के आखिर तक मिडकैप शेयरों में गिरावट बड़े शेयरों के मुकाबले मोटे तौर पर समान गति से हो रही थी. लेकिन 25 सितंबर के बाद तस्वीर बदल गई. इस अवधि में Nifty Midcap 100 में 5.5 फीसदी की गिरावट आई, जबकि Nifty सिर्फ 1.4% फिसला.
मिडकैप और स्मॉलकैप शेयरों में क्यों बढ़ी बिकवाली?
मिडकैप और स्मॉलकैप शेयरों में बढ़ती बिकवाली के पीछे कई वजहें हैं. इनमें कंपनियों की कमाई में अंतर, विदेशी निवेशकों की निकासी, शेयरों का वैल्यूएशन और कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें शामिल हैं. Financial Express की रिपोर्ट के मुताबिक, मिडकैप शेयरों का वैल्यूएशन कुछ कम हुआ है, लेकिन छोटे और मझोले शेयरों के वैल्यूएशन में अभी भी अंतर बना हुआ है. Nifty Midcap 100 करीब 27 गुना कमाई के अनुपात पर कारोबार कर रहा है. यह इसका पिछले पांच साल का औसत 29.7 गुना से करीब 9% नीचे है. वहीं, पिछले एक साल का औसत 31.6 गुना रहा है.
जून तिमाही में मिडकैप कंपनियों की कमाई में 23% की बढ़ोतरी हुई, जो 11 तिमाहियों में सबसे ज्यादा थी. इसी दौरान लार्जकैप कंपनियों की कमाई 21% बढ़ी. हालांकि, कंपनियों के प्रदर्शन में अंतर होने के कारण सभी शेयरों पर गिरावट का असर एक जैसा नहीं है. जिन कंपनियों की कमाई की संभावनाएं बेहतर हैं, बैलेंस शीट मजबूत है और कारोबार में लगातार बढ़ोतरी की उम्मीद है, उनके शेयर ऊंचे वैल्यूएशन पर बने रह सकते हैं. इसके उलट, जिन शेयरों की कीमतों को कंपनियों की कमाई का समर्थन नहीं मिल रहा है, उन पर आगे भी दबाव रह सकता है.
1. कंपनियों की कमाई में अंतर से बढ़ी चिंता
मिडकैप और स्मॉलकैप शेयरों में गिरावट की एक बड़ी वजह कंपनियों की कमाई से जुड़ी उम्मीदें हैं. बाजार में बड़े और छोटे शेयरों के प्रदर्शन में अंतर निवेशकों की धारणा को प्रभावित कर रहा है. अगले 12 महीनों की अनुमानित कमाई के आधार पर Nifty अपने लंबी अवधि के औसत से करीब 18% नीचे कारोबार कर रहा है. जून तिमाही में Nifty की कंपनियों का मुनाफा 18% बढ़ा, जो 10 तिमाहियों में सबसे ज्यादा था. यह बढ़ोतरी तेल मार्केट कंपनियों के कमजोर प्रदर्शन के बावजूद दर्ज की गई.
हालांकि, इस बढ़ोतरी का बड़ा हिस्सा कुछ ही कंपनियों से आया. रिपोर्ट के अनुसार, पांच शेयरों ने मुनाफे में हुई कुल अतिरिक्त बढ़ोतरी में 60% योगदान दिया. ऐसे में बाजार के अलग-अलग हिस्सों में कंपनियों की कमाई का प्रदर्शन एक जैसा नहीं है.
2. विदेशी निवेशकों की बिकवाली से बढ़ा दबाव
भारतीय शेयर बाजार में विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) की भारी बिकवाली भी बाजार के सेंटीमेंट पर असर डाल रही है. रिपोर्ट के मुताबिक, विदेशी निवेशकों ने 2026 में भारतीय शेयरों से 3.1 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा की निकासी की है. यह पिछले साल पूरे साल के दौरान हुई निकासी का करीब दोगुना है. भारतीय शेयर बाजार में विदेशी निवेशकों की हिस्सेदारी भी 17 साल के निचले स्तर पर पहुंच गई है.
विदेशी निवेशकों का निवेश बड़े शेयरों में ज्यादा रहता है, इसलिए लार्जकैप शेयरों पर बिकवाली का असर भी पड़ा है. इसके अलावा, बाजार में नए शेयरों की सप्लाई बढ़ने से मौजूदा शेयरों में निवेश के लिए उपलब्ध पैसा भी प्रभावित हुआ है. रिपोर्ट के अनुसार, वित्त वर्ष 2026-27 की पहली छमाही में सार्वजनिक इक्विटी फंड जुटाने का आंकड़ा रिकॉर्ड 2.43 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया. इससे बाजार में मौजूद शेयरों में निवेश के लिए उपलब्ध पूंजी पर दबाव पड़ा.
3. 110 डॉलर के पार कच्चा तेल बना चिंता
अमेरिका और ईरान के बीच तनाव के कारण ब्रेंट क्रूड की कीमत 110 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर पहुंच गई है. कच्चे तेल की महंगी कीमतें कंपनियों के मुनाफे पर दबाव डाल सकती हैं. खासतौर पर उन कंपनियों के लिए मुश्किल बढ़ सकती है जिनके पास लागत बढ़ने पर अपने उत्पादों की कीमत बढ़ाने की सीमित क्षमता है. छोटी कंपनियों के लिए बढ़ी हुई लागत का बोझ ग्राहकों पर डालना हमेशा आसान नहीं होता. ऐसे में उनकी कमाई पर ज्यादा असर पड़ सकता है.
विदेशी निवेशकों की बिकवाली, नए शेयरों की बढ़ती सप्लाई और महंगे कच्चे तेल का एक साथ असर बाजार में निवेशकों की चिंता बढ़ा रहा है.
लार्जकैप शेयरों में कमाई की संभावनाएं बेहतर?
कई बाजार जानकारों का मानना है कि फिलहाल कई सेक्टरों में लार्जकैप कंपनियों की कमाई को लेकर तस्वीर ज्यादा स्पष्ट है. दूसरी ओर, मिडकैप शेयरों में तेज विकास की संभावना वाले कारोबार भी मौजूद हैं. ऐसे में निवेश का फैसला केवल इस आधार पर नहीं होना चाहिए कि कंपनी लार्जकैप, मिडकैप या स्मॉलकैप कैटेगरी में आती है. कंपनी की कमाई में बढ़ोतरी, शेयर का वैल्यूएशन और कारोबार की गुणवत्ता ज्यादा अहम हैं.
बाजार में उतार-चढ़ाव के बीच निवेशकों को चुनिंदा शेयरों पर ध्यान देना चाहिए और केवल तेज ग्रोथ की उम्मीद में बहुत ऊंची कीमत चुकाने से बचना चाहिए. चरणबद्ध तरीके से निवेश करने से भी बाजार के उतार-चढ़ाव के असर को संभालने में मदद मिल सकती है. हालांकि, कुछ बाजार जानकारों की राय है कि Nifty 50 में करीब 50% हिस्सेदारी रखने वाले बैंकिंग, आईटी और FMCG जैसे सेक्टरों पर दबाव रहने से बड़े शेयरों का प्रदर्शन प्रभावित हो सकता है. इसके मुकाबले तेज विकास वाले कई सेक्टर मिडकैप और स्मॉलकैप कंपनियों में ज्यादा मौजूद हैं. इससे कुछ छोटे और मझोले शेयरों में आगे भी बेहतर प्रदर्शन की संभावना बनी रह सकती है.
क्या स्मॉलकैप और मिडकैप में गिरावट अभी और बढ़ सकती है?
बाजार की मौजूदा चिंता यह है कि खासकर स्मॉलकैप शेयरों में गिरावट जारी रह सकती है. इसकी वजह यह है कि कुछ शेयरों की कीमतें कंपनियों के कारोबारी प्रदर्शन के बजाय बाजार में उपलब्ध नकदी और निवेशकों की मांग से ज्यादा प्रभावित हुई हैं. ऐसे शेयरों में जब नकदी का प्रवाह कम होता है या निवेशक बिकवाली शुरू करते हैं, तो कीमतों में तेज गिरावट आ सकती है. यही वजह है कि बाजार में कमजोर सेंटीमेंट के दौरान स्मॉलकैप और मिडकैप शेयरों पर ज्यादा दबाव देखने को मिल रहा है.
दूसरी ओर, जिन लार्जकैप शेयरों का वैल्यूएशन उचित स्तर पर है, उनमें लंबी अवधि के निवेशकों को खरीदारी के मौके मिल सकते हैं. हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि सभी बड़े शेयर सस्ते हो गए हैं या हर मिडकैप और स्मॉलकैप शेयर में आगे गिरावट ही आएगी.
निवेशकों के लिए जरूरी है कि वे कंपनी की कमाई, कारोबार की संभावनाओं और शेयर के वैल्यूएशन को देखकर फैसला लें. बाजार में गिरावट के दौरान सिर्फ कीमत कम होने के आधार पर किसी शेयर को सस्ता मानना जोखिम भरा हो सकता है.
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