Yes Bank के निवेशकों को बड़ी राहत, सुप्रीम कोर्ट ने रद्द किया ₹8415 करोड़ के AT1 बॉन्ड राइट-ऑफ का फैसला
यस बैंक के निवेशकों को सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत मिली है. शीर्ष अदालत ने 8,415 करोड़ रुपये के AT1 बॉन्ड को राइट-ऑफ करने के फैसले को रद्द कर दिया है. कोर्ट ने बॉम्बे हाई कोर्ट के जनवरी 2023 के फैसले को बरकरार रखते हुए यस बैंक, आरबीआई और केंद्र सरकार की अपीलें खारिज कर दी हैं. मार्च 2020 में बैंक के संकट के दौरान इन बॉन्ड की पूरी रकम शून्य कर दी गई थी. जानिए इस फैसले का निवेशकों पर क्या असर होगा.

सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को यस बैंक के 8415 करोड़ रुपये के Additional Tier-1 (AT1) बॉन्ड को राइट-ऑफ करने के फैसले को रद्द कर दिया है. इस फैसले से उन संस्थागत और रिटेल निवेशकों को राहत मिली है, जिनकी बॉन्ड में लगाई गई रकम मार्च 2020 में बैंक के रेस्क्यू के दौरान शून्य कर दी गई थी. शीर्ष अदालत ने बॉम्बे हाई कोर्ट के जनवरी 2023 के फैसले को बरकरार रखा है. साथ ही, यस बैंक, भारतीय रिजर्व बैंक और केंद्र सरकार की अपीलों को खारिज कर दिया है.
क्या है सुप्रीम कोर्ट का फैसला
जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने AT1 बॉन्ड को राइट-ऑफ करने के फैसले को रद्द करने वाले बॉम्बे हाई कोर्ट के आदेश को बरकरार रखा. शीर्ष अदालत ने 20 मई को इस मामले में अपना फैसला सुरक्षित रखा था. इस मामले में केंद्र सरकार, आरबीआई, यस बैंक और बॉन्डधारकों की दलीलें सुनी गई थीं.
यह विवाद मार्च 2020 में यस बैंक के संकट के दौरान लिए गए फैसले से जुड़ा है. उस समय बैंक की वित्तीय स्थिति खराब हो रही थी. बढ़ते बैड लोन और जमाकर्ताओं के भरोसे में कमी के बीच आरबीआई ने बैंक के बोर्ड को अपने कंट्रोल में ले लिया था और मोरेटोरियम लगाया था.
क्या हैं AT1 बॉन्ड
AT1 बॉन्ड बैंक की कैपिटल जुटाने का एक माध्यम हैं. ये रिस्क वाले फाइनेंशियल इंस्ट्रूमेंट होते हैं, जिनका इस्तेमाल बैंक की कैपिटल को मजबूत करने के लिए किया जाता है. बैंक की वित्तीय स्थिति बिगड़ने पर तय शर्तों के तहत इन बॉन्ड पर नुकसान का बोझ डाला जा सकता है. कुछ परिस्थितियों में इनकी रकम पूरी तरह राइट-ऑफ भी की जा सकती है.
मार्च 2020 में यस बैंक को संकट से निकालने के लिए रिस्ट्रक्चरिंग प्लान लाई गई थी. इसके तहत भारतीय स्टेट बैंक के नेतृत्व वाले बैंकों के ग्रुप ने कैपिटल निवेश किया था. इसी प्रक्रिया के दौरान बैंक के प्रशासक ने 8,415 करोड़ रुपये के AT1 बॉन्ड को पूरी तरह राइट-ऑफ कर दिया था. इससे बॉन्डधारकों की निवेश की गई रकम शून्य हो गई थी.
विवाद की जड़ क्या थी
इस मामले में सबसे बड़ा सवाल यह था कि AT1 बॉन्ड को राइट-ऑफ करने का फैसला रिस्ट्रक्चरिंग प्लान के तहत वैध था या नहीं. अदालत ने यह भी विचार किया कि बैंक का रिस्ट्रक्चरिंग कानूनी रूप से कब पूरा माना जाएगा. क्या योजना नोटिफाई होने के साथ ही रिस्ट्रक्चरिंग पूरा हो जाता है या उसके सभी चरण पूरे होना जरूरी है?
इसके अलावा, अदालत ने यह भी जांचा कि बॉन्ड को राइट-ऑफ करने के लिए जरूरी नॉन-वायबिलिटी यानी बैंक के फिजिबल न रह जाने की स्थिति को स्वतंत्र रूप से लागू किया जा सकता है या इसे बैंकिंग रेगुलेशन एक्ट की धारा 45 के तहत रिस्ट्रक्चरिंग प्रोसेस से जुड़ा होना चाहिए.
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निवेशकों के लिए फैसले का क्या मतलब है?
सुप्रीम कोर्ट के फैसले से AT1 बॉन्डधारकों को बड़ी कानूनी राहत मिली है. अदालत ने राइट-ऑफ के फैसले को रद्द करने वाले बॉम्बे हाई कोर्ट के आदेश को बरकरार रखा है. हालांकि, इस फैसले के बाद निवेशकों को रकम कब और किस प्रक्रिया से मिलेगी, इसकी जानकारी दिए गए डिटेल में नहीं है.