नौकरियों पर सरकार का सबसे बड़ा प्लान क्यों हो रहा फेल? बजट बढ़ा, लेकिन एक साल में 3.5 लाख घटे जॉब

देश में छोटे कारोबार और स्वरोजगार को बढ़ावा देने वाली केंद्र सरकार की प्रमुख योजना प्रधानमंत्री रोजगार सृजन कार्यक्रम (PMEGP) अब धीमी पड़ती नजर आ रही है. हालिया आंकड़ों के अनुसार वित्त वर्ष 2025-26 में इस योजना के तहत बैंक लोन में करीब 50 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई. पिछले वर्ष जहां कुल लोन राशि 12,315 करोड़ रुपये थी, वहीं इस वर्ष यह घटकर मात्र 6,148 करोड़ रुपये रह गई. यही नहीं, आवेदन करने वालों की संख्या में भी भारी कमी आई है. विशेषज्ञों का मानना है कि आर्थिक अनिश्चितताओं और बैंकों की सख्त लोन नीति ने छोटे उद्यमियों का भरोसा कमजोर किया है.

एमएसएमई क्षेत्र, जिसे भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ माना जाता है, देश में लगभग 33 करोड़ लोगों को रोजगार देता है और GDP में करीब 31 प्रतिशत योगदान करता है. बावजूद इसके, बैंकों में बढ़ते एनपीए और योजनाओं की अनिश्चितता के कारण नए उद्यमों को फंडिंग मिलने में दिक्कत आ रही है. 15वें वित्त आयोग के बाद योजना के भविष्य को लेकर बनी असमंजस की स्थिति ने भी बैंकिंग सेक्टर को सतर्क बना दिया. इसके अलावा वैश्विक आर्थिक दबाव, निर्यात क्षेत्र में कमजोरी और उत्पादन इकाइयों पर टैरिफ का असर भी छोटे कारोबारों के लिए चुनौती बनकर उभरा है.

रोजगार सृजन पर इसका सीधा असर दिखाई दे रहा है. वित्त वर्ष 2022 में जहां PMEGP के जरिए लगभग 8.25 लाख नौकरियां पैदा हुई थीं, वहीं वित्त वर्ष 2025 में यह संख्या घटकर 4.77 लाख रह गई. हालांकि सरकार ने वित्त वर्ष 2026-27 के लिए इस योजना का बजट बढ़ाकर 4,500 करोड़ रुपये कर दिया है, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि केवल बजट बढ़ाने से समस्या हल नहीं होगी. जरूरत इस बात की है कि बैंकों का भरोसा बहाल किया जाए, लोन प्रक्रिया आसान बनाई जाए और छोटे उद्यमियों को स्थिर कारोबारी माहौल उपलब्ध कराया जाए, ताकि देश में रोजगार और स्वरोजगार दोनों को नई गति मिल सके.

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