4 साल में AI पर लगेगा 731 लाख करोड़ का दांव, होगा मुनाफा या डाट.कॉम की तरह फूटेगा बुलबुला, इस रिपोर्ट से समझें गणित
बड़ी हाइपरस्केलर कंपनियां 2030 तक AI पर 731 लाख करोड़ रुपये खर्च कर सकती हैं. इस भारी-भरकम निवेश के सामने कमाई बढ़ाने की बड़ी चुनौती भी है. जानें 2031 तक 15% रिटर्न के लिए 1 ट्रिलियन डॉलर अतिरिक्त EBIT और 3.4 ट्रिलियन डॉलर रेवेन्यू की जरूरत क्यों है.

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) पर दुनिया की बड़ी टेक कंपनियां भारी निवेश करने की तैयारी में हैं. 2026 से 2030 के बीच छह बड़ी हाइपरस्केलर कंपनियां AI इंफ्रास्ट्रक्चर पर कुल 7.7 ट्रिलियन डॉलर (731 लाख करोड़) खर्च कर सकती हैं. इसमें करीब 6.8 ट्रिलियन डॉलर का निवेश उस कैपिटल एक्सपेंडिचर से अतिरिक्त होगा, जो AI में तेजी आने से पहले इन कंपनियों के खर्च का सामान्य स्तर था.
UBS Global Research के मुताबिक, इस भारी-भरकम निवेश के सामने कमाई बढ़ाने की बड़ी चुनौती भी है. अनुमान के मुताबिक, 2031 तक निवेश पर 15 फीसदी रिटर्न हासिल करने के लिए इन कंपनियों को ब्याज और टैक्स से पहले अपनी कमाई यानी EBIT में करीब 1 ट्रिलियन डॉलर की अतिरिक्त बढ़ोतरी करनी होगी. मौजूदा क्लाउड कारोबार के मार्जिन को देखें तो इसके लिए लगभग 3.4 ट्रिलियन डॉलर का अतिरिक्त रेवेन्यू जुटाना होगा. यही वजह है कि अब सवाल केवल यह नहीं है कि AI की मांग कितनी बढ़ेगी, बल्कि यह भी है कि कंपनियां इस मांग को कमाई में कितनी प्रभावी तरीके से बदल पाएंगी.
AI पर खर्च और कमाई के बीच कितना बड़ा अंतर?
UBS के मुताबिक, हाइपरस्केलर कंपनियां ऐतिहासिक रूप से सॉफ्टवेयर, सोशल मीडिया और ई-कॉमर्स जैसे कम संपत्ति वाले कारोबार से टैक्स से पहले 40 फीसदी से अधिक रिटर्न हासिल करती रही हैं. लेकिन AI इस बिजनेस मॉडल को बदल रहा है. AI इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए बड़े पैमाने पर डेटा सेंटर, कंप्यूटिंग क्षमता और दूसरी सुविधाओं की जरूरत है. इससे इन कंपनियों का कारोबार पहले के मुकाबले अधिक कैपिटल आधारित हो रहा है.
UBS को उम्मीद है कि कंपनियों के कारोबार में AI की हिस्सेदारी बढ़ने से निवेश पर मिलने वाले रिटर्न यानी ROIC में 20 से 25 प्रतिशत अंक की गिरावट आ सकती है. इसके बावजूद, 2031 तक 15 फीसदी ROIC हासिल करने के लिए करीब 1 ट्रिलियन डॉलर की अतिरिक्त EBIT की जरूरत होगी. यह आंकड़ा इन छह कंपनियों की मौजूदा संयुक्त EBIT के लगभग दोगुने से कुछ कम है. मौजूदा क्लाउड मार्जिन के आधार पर इस अतिरिक्त कमाई के लिए करीब 3.4 ट्रिलियन डॉलर का अतिरिक्त रेवेन्यू चाहिए. इसलिए AI में निवेश की सफलता का असली पैमाना केवल सेवाओं की मांग नहीं, बल्कि उनसे होने वाली कमाई भी होगी.
UBS का कहना है कि इस निवेश से संतोषजनक रिटर्न मिलना संभव है, लेकिन इसके लिए दो शर्तें पूरी होनी चाहिए. पहली, AI से उत्पादकता में वास्तविक बढ़ोतरी हो. दूसरी, AI से पैदा होने वाले आर्थिक लाभ का एक बड़ा हिस्सा कंपनियां अपनी सेवाओं के जरिए कमाई में बदल सकें.
AI से उत्पादकता बढ़ी, तो वैश्विक अर्थव्यवस्था को कितना फायदा?
UBS के मुताबिक, वैश्विक नॉमिनल अर्थव्यवस्था का आकार फिलहाल करीब 110 ट्रिलियन डॉलर है. अगर पिछले दशक की रफ्तार से इसकी बढ़ोतरी जारी रहती है, तो AI से मिलने वाले किसी अतिरिक्त लाभ के बिना भी 2031 तक यह लगभग 136 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच सकती है. रिपोर्ट के अनुमान के मुताबिक, अगर AI सालाना उत्पादकता वृद्धि में 0.5%, 1% या 1.5% की अतिरिक्त बढ़ोतरी करता है, तो 2031 तक वैश्विक GDP क्रमशः 3 ट्रिलियन डॉलर, 7 ट्रिलियन डॉलर या 10 ट्रिलियन डॉलर अधिक हो सकती है.
अर्थव्यवस्था में होने वाली यह अतिरिक्त बढ़ोतरी हाइपरस्केलर और दूसरी AI कंपनियों के लिए जरूरी रेवेन्यू जुटाने का आधार बन सकती है. हालांकि, उत्पादकता बढ़ने का मतलब यह नहीं है कि AI इंफ्रास्ट्रक्चर पर पैसा लगाने वाली कंपनियों को ही इसका पूरा फायदा मिलेगा.
टेलीकॉम और डॉटकॉम इंडस्ट्री से क्या सबक मिलता है?
UBS ने AI निवेश की तुलना टेलीकॉम और डॉटकॉम यानी केबल इंडस्ट्री से की है. इन क्षेत्रों ने व्यापक अर्थव्यवस्था की उत्पादकता बढ़ाने में भूमिका निभाई, लेकिन निवेश करने वाली कंपनियां पैदा हुए आर्थिक मूल्य का उतना हिस्सा अपने पास नहीं रख सकीं. आखिरकार, इस मूल्य का बड़ा हिस्सा इंटरनेट, ई-कॉमर्स, सोशल मीडिया, स्ट्रीमिंग और स्मार्टफोन कारोबार से जुड़ी कंपनियों को मिला.
हालांकि, UBS के मुताबिक, हाइपरस्केलर कंपनियों के पास टेलीकॉम कंपनियों के मुकाबले कमाई के ज्यादा रास्ते हैं. वे अलग-अलग सेवाओं और कारोबार के जरिए AI से पैदा होने वाले आर्थिक लाभ का बड़ा हिस्सा हासिल करने की कोशिश कर सकती हैं.
टेक कंपनियों के बॉन्ड में गिरावट से क्यों बढ़ी चिंता?
AI इंफ्रास्ट्रक्चर पर बढ़ते खर्च को लेकर निवेशकों की चिंता के बीच कुछ टेक कंपनियों के बॉन्ड कमजोर हुए हैं. खास तौर पर निओक्लाउड कंपनियों, जैसे CoreWeave, के बॉन्ड पर दबाव ने इस बहस को तेज किया है कि क्या AI में किया जा रहा निवेश पर्याप्त रिटर्न दे पाएगा. हालांकि, UBS के EM स्ट्रैटेजिस्ट सुनील तिरुमलाई ने कहा कि क्रेडिट मार्केट में दिख रहे दबाव को AI निवेश की पूरी रणनीति में आई कमजोरी के रूप में नहीं देखना चाहिए.
ग्लोबल इन्वेस्टमेंट बैंक के एक नोट के मुताबिक, अगले चार से पांच वर्षों में AI डेटा सेंटर पर होने वाले कुल कैपिटल एक्सपेंडिचर में निओक्लाउड कंपनियों की हिस्सेदारी केवल 5% से 7% रहने की उम्मीद है. इसलिए UBS के अनुसार, ये कंपनियां वैश्विक AI कैपेक्स की पूरी कहानी के केंद्र में नहीं हैं. UBS ने यह भी कहा कि इस साल हाइपरस्केलर कंपनियों के बॉन्ड पर यील्ड बढ़ी है, लेकिन इस बढ़ोतरी की लगभग पूरी वजह अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड में आया उछाल है.
क्रेडिट मार्केट में दबाव खास तौर पर उन कंपनियों पर केंद्रित है, जिनकी बैलेंस शीट कमजोर मानी जाती है या जिन पर भविष्य में बड़ी वित्तीय देनदारियां आने का जोखिम है. इसका मतलब यह नहीं है कि AI इंफ्रास्ट्रक्चर में निवेश का पूरा चक्र टूट रहा है. असली जोखिम यह है कि अगर कंपनियों का कैपिटल एक्सपेंडिचर उनकी कमाई से तेज बढ़ता रहा, तो निवेशकों को इस पूरे निवेश से मिलने वाले रिटर्न का दोबारा आकलन करना पड़ सकता है.
AI डेटा सेंटर के लिए बिजली भी बड़ी चुनौती
AI इंफ्रास्ट्रक्चर के विस्तार में बिजली की उपलब्धता भी अहम भूमिका निभाएगी. UBS की ग्लोबल सेमीकंडक्टर टीम का मानना है कि प्रस्तावित डेटा सेंटर चलाने के लिए पर्याप्त बिजली उपलब्ध कराने की संभावनाओं को लेकर तस्वीर फिलहाल स्पष्ट है. हालांकि, इसके लिए योजनाओं को समय पर लागू करना जरूरी होगा. कानून और नीतियों से सहयोग मिलना चाहिए और बिजली ग्रिड या ऑफ-ग्रिड क्षमता बढ़ाने के काम में देरी नहीं होनी चाहिए.
अगर बिजली की उपलब्धता या इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार करने में रुकावट आती है, तो कंपनियों के लिए अपनी तय निवेश योजनाओं को समय पर पूरा करना मुश्किल हो सकता है.
भारत का बाजार अब तक अपेक्षाकृत मजबूत
UBS की उभरते बाजारों की तुलना के मुताबिक, 5 अक्टूबर के बाद से एशिया, उभरते बाजारों और वैश्विक टेक शेयरों में उतार-चढ़ाव के बीच भारत उन बाजारों में शामिल रहा है, जिन्होंने अपेक्षाकृत बेहतर प्रदर्शन किया है. हालांकि, भारत का यह प्रदर्शन AI पर वैश्विक खर्च को लेकर पैदा होने वाले जोखिमों को पूरी तरह खत्म नहीं करता. फिर भी, अब तक भारतीय बाजार पर वैश्विक AI कैपेक्स से जुड़े सबसे तीखे दबाव का असर अपेक्षाकृत कम दिखाई दिया है.
निवेशकों के लिए आगे सबसे बड़ा सवाल यह होगा कि AI पर खर्च कितनी तेजी से बढ़ रहा है, उससे कितनी उत्पादकता पैदा हो रही है और उस लाभ का कितना हिस्सा निवेश करने वाली कंपनियों की कमाई में बदल पा रहा है.
निवेशकों के लिए क्यों अहम है यह रिपोर्ट?
UBS के अनुमान के मुताबिक, छह बड़ी हाइपरस्केलर कंपनियों को 2026 से 2030 के बीच कुल 7.7 ट्रिलियन डॉलर खर्च करने की उम्मीद है. इस निवेश से 2031 तक 15% रिटर्न हासिल करने के लिए करीब 1 ट्रिलियन डॉलर की अतिरिक्त EBIT और मौजूदा क्लाउड मार्जिन पर लगभग 3.4 ट्रिलियन डॉलर के अतिरिक्त रेवेन्यू की जरूरत होगी.
ये आंकड़े बताते हैं कि AI से अर्थव्यवस्था को बड़ा फायदा मिलना और AI में निवेश करने वाली कंपनियों को पर्याप्त कमाई होना, दोनों अलग-अलग बातें हैं. आने वाले सालों में कंपनियों की सफलता इस पर निर्भर करेगी कि AI से उत्पादकता कितनी बढ़ती है, सेवाओं से कितना अतिरिक्त रेवेन्यू मिलता है और वे उस आर्थिक लाभ को कमाई में बदलने में कितनी सफल रहती हैं. निवेश का पैमाना इतना बड़ा है कि कमाई में उम्मीद से कम बढ़ोतरी भी निवेशकों की रणनीति और रिटर्न को लेकर आकलन बदल सकती है.
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