IDBI बैंक का उतार-चढ़ाव भरा सफर, बैड लोन से बिगड़ी सेहत, फिर सरकार ने किया इलाज; कैसे बदल गई सूरत?

यह डील बैंक की चरमरा रही वित्तीय स्थिति को मजबूत करने के लिए एक अहम मोड़ साबित होगी. सरकार एक लंबे प्रयास के बाद इस काम में सफल हो पाई है. सरकार ने मई 2021 में IDBI बैंक में रणनीतिक विनिवेश (स्ट्रैटेजिक डिसइन्वेस्टमेंट) को सैद्धांतिक मंजूरी दी थी.

आईडीबीआई बैंक का सफर. Image Credit: Niharika Kulkarni/NurPhoto via Getty Images

IDBI बैंक लिमिटेड में अब भारत सरकार की नियंत्रण शक्ति खत्म हो जाएगी. सरकार ने अपनी मेजॉरिटी हिस्सेदारी कनाडाई अरबपति प्रेम वत्सा की ‘फेयरफैक्स फाइनेंशियल होल्डिंग्स लिमिटेड‘ को बेच रही है. इस घोषणा के साथ बैंक को बैड लोन (फंसे हुए कर्ज) से उबारने का एक दशक लंबा अध्याय अब समाप्त हो रहा है. सरकार ने IDBI बैंक में 60.72 फीसदी हिस्सेदारी ‘कनाडा इंक’ को 52,878 करोड़ रुपये में बेचने की मंजूरी दी है.

यह डील बैंक की चरमरा रही वित्तीय स्थिति को मजबूत करने के लिए एक अहम मोड़ साबित होगी. सरकार एक लंबे प्रयास के बाद इस काम में सफल हो पाई है.

उतार-चढ़ाव भरा रहा है बैंक का सफर

आजादी के बाद औद्योगिक विकास के लिए फंडिंग देने से लेकर कमर्शियल बैंकिंग तक, और फिर लंबे समय तक चले बैड-लोन (फंसे हुए कर्ज) के संकट से उबरने तक. IDBI बैंक का सफर किसी सपाट सड़क पर सीधी दौड़ती मोटर कार जैसा बिल्कुल भी नहीं रहा है.

इसकी विरासत दो अलग-अलग दौर की कहानी है. पहला- भारत के औद्योगिक विकास के लिए फंडिंग देने में इसकी शुरुआती भूमिका और दूसरा, बैड-लोन की वजह से खराब हुई बैलेंस शीट को सुधारने की चुनौती.

किस मकसद के साथ शुरू हुआ था बैंक?

1 जुलाई 1964 को ‘इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट बैंक ऑफ इंडिया’ (IDBI) के रूप में इसकी स्थापना हुई. मकसद था कि यह बैंक देश में औद्योगीकरण को बढ़ावा देने के लिए लोन उपलब्ध कराएगा. तब यह एक डेवलपमेंट फाइनेंस इंस्टीट्यूशन’ (DFI) के रूम में काम करता था, इंडस्ट्रीयल प्रोजेक्ट्स, आधुनिकीकरण और विस्तार के लिए लॉन्ग टर्म की फंडिंग प्रदान करता था. साथ ही बैंक कैपिटल मार्केट को डेवलप करने के लिए कम विकसित क्षेत्रों में औद्योगिक विकास को सपोर्ट देने में भी अपनी भूमिका निभाता था.

बदली भूमिका और बढ़ती गईं चुनौतियां

लेकिन जैसे-जैसे भारत का वित्तीय तंत्र विकसित हुआ, इस संस्थान की भूमिका भी बदलती चली गई. उद्योगों को लोन देने में कमर्शियल बैंकों की भूमिका बढ़ती चली गई. ऐसे में डेवलपमेंट फाइनेंस और कमर्शियल बैंकों बीच अंतर कम होने लगा. इस वजह से 1 अक्टूबर 2004 को IDBI को एक बैंकिंग कंपनी में बदल दिया गया.

2005 में IDBI बैंक का IDBI लिमिटेड के साथ विलय कर दिया गया और 2008 में इस संस्थान का नाम बदलकर IDBI बैंक लिमिटेड कर दिया गया. 2006 में आर्थिक संकट से जूझ रहे ‘यूनाइटेड वेस्टर्न बैंक’ के विलय से इसके कामकाज का दायरा तो बढ़ा, लेकिन साथ ही एक संकटग्रस्त बैंक को अपने साथ मिलाने की चुनौती भी सामने आई.

बड़े कर्जदारों ने किया डिफॉल्ट

बिजनेस स्टैंडर्ड के अनुसार, 2000 के दशक के मध्य से लेकर अंत तक, जब बैंक ने कॉरपोरेट क्षेत्र को बड़े पैमाने पर कर्ज देना शुरू किया, तब इसकी मुश्किलें और अधिक स्पष्ट हो गईं. बाद में कई बड़े कर्जदारों ने कर्ज चुकाने से इनकार कर दिया (डिफॉल्ट कर दिया), जिससे IDBI और अन्य कर्जदाता बैंकों को भारी नुकसान उठाना पड़ा. इनमें ‘किंगफिशर एयरलाइंस लिमिटेड’ का मामला प्रमुख था.

एसेट्स क्वालिटी में भारी गिरावट

बिजनेस स्टैंडर्ड के अनुसार, IDBI की एसेट्स क्वालिटी में भारी गिरावट आई. इसके कुल लोन पोर्टफोलियो का एक-तिहाई से अधिक हिस्सा खराब हो गया. सितंबर 2018 तक, इसका ग्रॉस नॉन परफॉर्मिंग एसेट्स (Gross NPAs) लोन का 31.78 फीसदी तक पहुंच गया. जबकि नेट एनपीए 17.30 फीसदी था.

भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने इस बैंक को अपने ‘प्रॉम्प्ट करेक्टिव एक्शन’ (PCA) ढांचे के तहत डाल दिया. इसके तहत बैंक की कुछ गतिविधियों के विस्तार पर रोक लगा दी गई, ताकि वह अपनी पूंजी की स्थिति और एसेट्स क्वलिटी में सुधार कर सके.

सरकार के दखल से सुधरी स्थिति

इस स्थिति से उबरने के लिए सरकार से बड़े सहयोग की आवश्यकता थी. सरकार ने 2010 से 2020 के बीच बैंक में लगभग 25,000 करोड़ रुपये का निवेश किया, जबकि भारतीय जीवन बीमा निगम (LIC) ने बैंक में नियंत्रण हिस्सेदारी (Controlling Stake) हासिल कर ली. बैंक के हालिया वित्तीय आंकड़े इसके सुधार के स्तर को दर्शाते हैं.

सितंबर 2018 में 31.78 फीसदी रहा ग्रॉस NPA मार्च 2026 तक घटकर 2.32 फीसदी पर आ गया. जबकि इसी अवधि में नेट एनपीए 17.30 फीसदी से घटकर 0.15 फीसदी पर आ गया. मार्च 2026 में इसका कैपिटल एडिक्वेसी रेश्यो सुधरकर 26.65 फीसदी हो गया.

मुनाफे में बैंक

IDBI बैंक ने मार्च 2026 को समाप्त वित्तीय वर्ष में 9,513 करोड़ रुपये का रिकॉर्ड नेट प्रॉफिट दर्ज किया, जो पिछले वर्ष के 7,515 करोड़ रुपये से लगभग 27 फीसदी अधिक है. कुल जमा राशि (डिपॉजिट) सालाना आधार पर 12 फीसदी बढ़कर 3.47 ट्रिलियन रुपये हो गई, जबकि नेट एडवांसेज 16 फीसदी बढ़कर 2.54 ट्रिलियन रुपये हो गए.

यह सुधार बैंक के बढ़ते कारोबार में भी दिखता है. बैंक द्वारा दिए गए आंकड़ों के अनुसार, 30 सितंबर तक इसका कुल कारोबार 6.27 ट्रिलियन रुपये को पार कर गया था, जो एक साल में 18 फीसदी की बढ़ोतरी को दिखाता है.

बदल गया सवाल

बेहतर हुई बैलेंस शीट ने बैंक के सामने मौजूद सवाल को बदल दिया. पहले सवाल यह था कि नुकसान को कैसे रोका जाए और पूंजी को कैसे बहाल किया जाए, जबकि अब सवाल यह है कि नए ओनरशिप स्ट्रक्चर के तहत ग्रोथ को कैसे बरकरार रखा जाए.

सरकार ने मई 2021 में IDBI बैंक में रणनीतिक विनिवेश (स्ट्रैटेजिक डिसइन्वेस्टमेंट) को सैद्धांतिक मंजूरी दी थी. इसका उद्देश्य प्रबंधन नियंत्रण को ट्रांसफर करना और सरकार तथा LIC के सहयोग पर बैंक की निर्भरता को कम करना था.

इसलिए, प्रस्तावित फेयरफैक्स (Fairfax) डील केवल शेयरहोल्डिंग में बदलाव से कहीं अधिक है. यह एक ऐसे बैंक को, जिसे कभी सरकारी पूंजी के सहारे की जरूरत थी, एक ऐसे मॉडल की ओर ले जाने का प्रयास है, जिसमें एक रणनीतिक निवेशक प्रबंधन नियंत्रण अपने हाथ में लेता है और विकास के अगले चरण के लिए जरूरी संसाधन प्रदान करता है.

नया मॉडल साबित होगी डील?

महत्वपूर्ण बात यह है कि IDBI बैंक अपने ‘डेवलपमेंट फाइनेंस’ वाले मूल स्वरूप से निकलकर विदेशी स्वामित्व की ओर एक बड़ा कदम बढ़ा रहा है, जिसमें सरकार की भी एक सीमित भूमिका बनी रहेगी.

इस डील की सफलता, भारत में रुकी हुई बैंकिंग निजीकरण प्रक्रिया में नई जान फूंक सकती है. सरकार का यह सबसे बड़ा विनिवेश कदम, एक मजबूत बैंकिंग उद्योग के निर्माण के लिए एक नया मॉडल भी साबित हो सकता है.

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