रोड प्रोजेक्ट्स पर स्टाम्प ड्यूटी से रेवेन्यू का नुकसान, MoRTH का राज्यों से शुल्क माफ करने का आग्रह; बढ़ रही जटिलता
अलग-अलग राज्यों में स्टाम्प ड्यूटी की दरें 0.25% से 3% के बीच हैं, लेकिन उत्तर प्रदेश 'टोल-ऑपरेट-ट्रांसफर' (TOT) परियोजनाओं के लिए 12% तक स्टाम्प ड्यूटी की मांग कर रहा है. उनका तर्क है कि इससे उन्हें रेवेन्यू का नुकसान हो रहा है.
Highlights
- राज्य राजस्व के इस आसान और बड़े हिस्से को छोड़ना नहीं चाहते.
- काम को पूरा करने और उनसे कमाई करने की रणनीति में रुकावट.
- लंबे समय तक चलने वाले प्रोजेक्ट्स की फाइनेंशियल मॉडलिंग बिगड़ जाएगी.
सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय ने राज्यों से सड़क परियोजनाओं पर स्टाम्प ड्यूटी माफ करने को कहा है. मंत्रालय का तर्क है कि इस तरह के शुल्क से नियमों का पालन करने का बोझ बढ़ता है और कॉन्ट्रैक्ट को लेकर अस्पष्टता पैदा होती है, जिससे राष्ट्रीय राजमार्ग परियोजनाओं की स्थिरता और आकर्षण कम हो जाता है.
कॉन्ट्रैक्ट वैल्यू और प्रोजेक्ट
ईटी ने अपनी रिपोर्ट में मामले की जानकारी रखने वाले लोगों के हवाले से बताया कि उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, कर्नाटक और ओडिशा जैसे राज्य मांग कर रहे हैं कि स्टाम्प ड्यूटी को कॉन्ट्रैक्ट वैल्यू और प्रोजेक्ट के प्रकार से जोड़ा जाए.
रेवेन्यू का नुकसान
उनका तर्क है कि इससे उन्हें रेवेन्यू का नुकसान हो रहा है. अलग-अलग राज्यों में स्टाम्प ड्यूटी की दरें 0.25% से 3% के बीच हैं, लेकिन उत्तर प्रदेश ‘टोल-ऑपरेट-ट्रांसफर’ (TOT) परियोजनाओं के लिए 12% तक स्टाम्प ड्यूटी की मांग कर रहा है. उनका कहना है कि ये लीज (पट्टे) वाली परियोजनाएं हैं, इसलिए इन पर शुल्क लगना चाहिए.
ईटी के अनुसार, कुछ राज्य राजस्व के इस आसान और बड़े हिस्से को छोड़ना नहीं चाहते हैं. इसलिए वे कंसेशन लेने वाली कंपनियों (Concessionaires) से शुल्क की मांग कर रहे हैं, जिससे कई विवाद पैदा हो सकते हैं और परियोजनाओं में देरी हो सकती है.
मौजूदा व्यवस्था
मौजूदा व्यवस्था के तहत, सड़क मंत्रालय के अधीन काम करने वाली ‘नेशनल हाईवे अथॉरिटी ऑफ इंडिया’ (NHAI) पूरे भारत में राजमार्ग विकास के लिए कंपनियों के साथ कॉन्ट्रैक्ट करती है. इसके लिए केवल 100 रुपये के स्टाम्प पेपर का इस्तेमाल किया जाता है.
स्पष्टता और स्थिरता होना जरूरी
एक अधिकारी ने कहा, ‘ऐसे कॉन्ट्रैक्ट पर राज्य-स्तरीय शुल्क लगाना, जिसका पूरा राजस्व केंद्र सरकार को जाता है, एक तरह से केवल पैसों की अदला-बदली (Circular Fiscal Transfer) है. इससे कोई वास्तविक मूल्य नहीं जुड़ता, बल्कि कॉन्ट्रैक्ट समझौतों में जटिलता ही बढ़ती है.’
मंत्रालय का कहना है कि राजमार्ग क्षेत्र में निवेशकों का भरोसा बनाए रखने के लिए नियमों में स्पष्टता और स्थिरता होना बहुत जरूरी है.
काम पूरा करने और कमाई में रुकावट
मंत्रालय ने कहा, ‘हर राज्य के हिसाब से अलग-अलग स्टाम्प ड्यूटी लगाने की बात, एक समान राष्ट्रीय राजमार्ग नीति के सिद्धांत के खिलाफ है. इससे विवाद, फिर से बातचीत (Renegotiations) और वित्तीय क्लोजर (Financial Closure) में देरी की गुंजाइश बनती है. इन सब वजहों से राष्ट्रीय राजमार्गों के काम को पूरा करने और उनसे कमाई करने की रणनीति में रुकावट आती है.
कॉन्ट्रैक्ट संबंधी चुनौतियां
सरकार का मानना है कि अगर अलग-अलग राज्यों में टोल परियोजनाओं को ‘लीज’ (पट्टे) के रूप में देखा जाने लगे, तो राष्ट्रीय राजमार्ग क्षेत्र के लिए बड़ी वित्तीय और कॉन्ट्रैक्ट संबंधी चुनौतियां खड़ी हो सकती हैं.
इंडस्ट्री एक्सपर्ट का कहना है कि कई राज्यों से होकर गुजरने वाले हाईवे प्रोजेक्ट्स पर अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग दरों से स्टाम्प ड्यूटी लगाने से, लंबे समय तक चलने वाले इन प्रोजेक्ट्स की फाइनेंशियल मॉडलिंग बिगड़ जाएगी.
उन्होंने कहा, ‘इससे नेशनल हाईवे सेक्टर में लंबे समय तक चलने वाले पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप (PPP) प्रोजेक्ट्स के लिए काफी अनिश्चितता पैदा हो जाएगी.’
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