अमेरिका ने इन्फोसिस, TCS, विप्रो, HCL समेत कई IT कंपनियों को दिया झटका, ग्रीन कार्ड प्रोग्राम से किया बाहर
इन कंपनियों में में कॉग्निजेंट, इंफोसिस, टीसीएस, विप्रो, HCL और कैपजेमिनी शामिल हैं. इन कंपनियों पर आरोप है कि उन्होंने विदेशी कर्मचारियों के लिए परमानेंट रेजिडेंसी (स्थायी निवास) पाने के मकसद से इस सिस्टम का गलत इस्तेमाल किया.

राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन ने गुरुवार को भारतीय समेत कई आईटी कंपनियों को जोरदार झटका दिया है. एक बड़े कदम के तहत अमेरिकी सरकार ने कई बड़ी IT आउटसोर्सिंग कंपनियों को ‘परमानेंट लेबर सर्टिफिकेशन प्रोग्राम (PERM)’ से सस्पेंड कर दिया है. इसकी वजह कई एक्टिव फेडरल जांच बताई गई हैं.
इन कंपनियों में में कॉग्निजेंट, इंफोसिस, टीसीएस, विप्रो, HCL और कैपजेमिनी शामिल हैं. इन कंपनियों पर आरोप है कि उन्होंने विदेशी कर्मचारियों के लिए परमानेंट रेजिडेंसी (स्थायी निवास) पाने के मकसद से इस सिस्टम का गलत इस्तेमाल किया.
ट्रंप प्रशासन के निशाने पर रहे हैं ऐसे प्रोग्राम
अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने कहा कि हम माइक्रोसॉफ्ट और कई अन्य कंपनियों को उस प्रोग्राम से सस्पेंड कर रहा है, जिसके तहत विदेशी कर्मचारी ग्रीन कार्ड के लिए अप्लाई कर सकते हैं. साथ ही, प्रशासन ने उन यूनिवर्सिटीज की भी आलोचना की जो एक्सचेंज प्रोग्राम के तहत विदेशी छात्रों को अमेरिका लाती हैं.
ऐसे प्रोग्राम अक्सर ट्रंप के कुछ समर्थकों के निशाने पर रहे हैं, जिनका तर्क है कि इनसे अमेरिकी छात्रों और कर्मचारियों को नुकसान पहुंचता है. वहीं, समर्थकों का कहना है कि इन प्रोग्राम्स की वजह से अमेरिका दुनिया भर से बेहतरीन टैलेंट को आकर्षित कर पाता है और जरूरी नौकरियों में खाली जगहों को भर पाता है.
रिपब्लिकन राष्ट्रपति के समर्थकों का लंबे समय से यह तर्क रहा है कि H-1B वीजा जैसे कई प्रोग्राम असल में अमेरिकी कंपनियों को विदेशी कर्मचारियों को नौकरी पर रखने की सुविधा देते हैं, जिससे अंततः अमेरिकियों को नुकसान होता है.
PERM क्या है?
PERM एक लेबर सर्टिफिकेशन है जिसकी जरूरत आमतौर पर एम्प्लॉयर्स को तब पड़ती है जब वे किसी विदेशी कर्मचारी को नौकरी के आधार पर मिलने वाले ग्रीन कार्ड के लिए स्पॉन्सर करते हैं. नौकरी पर आधारित ग्रीन कार्ड की कई अहम कैटेगरी के लिए इसकी जरूरत होती है.
इस प्रोग्राम के तहत, एम्प्लॉयर को US डिपार्टमेंट ऑफ लेबर को यह साबित करना होगा कि किसी खास नौकरी के लिए कोई योग्य, इच्छुक और उपलब्ध US वर्कर नहीं है, और विदेशी वर्कर को काम पर रखने से उसी तरह का काम करने वाले US वर्कर की सैलरी और काम की स्थितियों पर बुरा असर नहीं पड़ेगा.
यह क्यों जरूरी है?
इस कदम से Infosys, TCS, Wipro और HCL जैसी भारतीय IT कंपनियों पर दबाव बढ़ेगा, जो US में भारतीय प्रोफेशनल्स को बड़े पैमाने पर नौकरी देती हैं. साथ ही, इससे उन कर्मचारियों पर भी असर पड़ सकता है जो अस्थायी वर्क स्टेटस से स्थायी रेजिडेंसी (Permanent Residency) की ओर बढ़ना चाहते हैं.
हालांकि, इस कदम से H-1B वीजा रद्द नहीं होंगे और न ही ये कंपनियां H-1B वर्करों को नौकरी देने से रुकेंगी. इसके बजाय, सस्पेंशन की वजह से कंपनियां नए PERM एप्लीकेशन फाइल नहीं कर पाएंगी और जब तक सस्पेंशन लागू रहेगा, तब तक पेंडिंग एप्लीकेशन होल्ड पर रहेंगे. भारतीय IT कंपनियों को अधिक कानूनी, कंप्लायंस और एडमिनिस्ट्रेटिव खर्चों का सामना भी करना पड़ सकता है.
US लेबर सेक्रेटरी कीथ सोंडरलिंग ने कहा, ‘हम इन कंपनियों से जुड़े किसी भी नए परमानेंट लेबर सर्टिफिकेशन को स्वीकार नहीं करेंगे और न ही किसी पेंडिंग सर्टिफिकेशन पर आगे बढ़ेंगे.’
भारतीय IT कर्मचारियों के लिए इसका क्या मतलब है?
भारतीय प्रोफेशनल्स पर इसका तुरंत असर यह हो सकता है कि उनके मौजूदा H-1B वीजा रद्द होने के बजाय, एम्प्लॉयर-स्पॉन्सर्ड ग्रीन कार्ड प्रोसेस में देरी हो सकती है.
प्रभावित कंपनियों के जो कर्मचारी पहले से ही PERM प्रोसेस में हैं, उनके एप्लीकेशन में तब तक देरी हो सकती है जब तक सस्पेंशन लागू रहेगा. जिन लोगों के एम्प्लॉयर प्रोसेस शुरू करने की तैयारी कर रहे थे, उन्हें भी नए एप्लीकेशन फाइल करने के लिए इंतजार करना पड़ सकता है.
डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन के इस ताजा कदम का अमेरिका में भारतीय प्रोफेशनल्स पर खास असर पड़ सकता है, क्योंकि FY2023 में ग्रीन कार्ड पाने वाले लगभग 37% भारतीयों ने इसे एम्प्लॉयमेंट-बेस्ड प्रेफरेंस के जरिए हासिल किया था. यह एक ऐसा रास्ता है, जिसमें PERM एक अहम कदम है.
इसलिए, किसी भी लंबे समय तक चलने वाले सस्पेंशन से उन भारतीय टेक्नोलॉजी प्रोफेशनल्स के लिए अनिश्चितता बढ़ सकती है, जिनके एम्प्लॉयर उन्हें परमानेंट रेजिडेंसी के लिए स्पॉन्सर कर रहे हैं.