कमाई से तेज बढ़ रहा कर्ज, EMI के जाल में फंस रहा मिडिल क्लास; खर्च चलाना हुआ मुश्किल!
भारत में घरेलू कर्ज तेजी से बढ़ रहा है और इसकी रफ्तार कमाई में होने वाली बढ़ोतरी से कहीं ज्यादा है. मार्च 2026 तक एक साल में घरेलू उधारी में 36 फीसदी की बढ़ोतरी हुई और कर्ज जीडीपी के 46 फीसदी के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया. वहीं, 2025-26 में कर्ज बढ़ने की रफ्तार डिस्पोजेबल इनकम से करीब चार गुना रही.

भारत में मिडिल क्लास परिवारों के लिए कर्ज लेना अब पहले के मुकाबले काफी आसान हो गया है. मोबाइल से कुछ ही मिनटों में मिलने वाले लोन और आसान EMI ने लोगों को अपनी पसंद की चीजें खरीदने का मौका दिया है. लेकिन यही सुविधा अब कई परिवारों के लिए परेशानी बनती जा रही है. लोग जितनी तेजी से कर्ज ले रहे हैं, उनकी कमाई उस रफ्तार से नहीं बढ़ रही है. नतीजा यह है कि सैलरी का बड़ा हिस्सा हर महीने EMI चुकाने में जा रहा है. भारतीय परिवारों पर घरेलू कर्ज रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया है. चिंता की बात यह है कि कर्ज बढ़ने की रफ्तार डिस्पोजेबल इनकम यानी खर्च और बचत के लिए उपलब्ध आय से करीब चार गुना ज्यादा रही है. ऐसे में सवाल है कि क्या भारत का मिडिल क्लास कर्ज के जाल में फंसता जा रहा है?
एक साल में 36% बढ़ा घरेलू कर्ज
भारतीय परिवारों पर कर्ज का बोझ तेजी से बढ़ रहा है. आंकड़ों के मुताबिक, मार्च 2026 तक के एक साल में घरेलू कर्ज में 36 फीसदी की बढ़ोतरी हुई. इसके साथ ही कंज्यूमर डेट यानी उपभोक्ताओं पर कर्ज बढ़कर GDP के 46 फीसदी के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया.
हालांकि, अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों के मुकाबले भारत में कुल घरेलू कर्ज कम है, लेकिन होम लोन को हटाकर देखें तो भारतीय कंज्यूमर पर कर्ज का बोझ दुनिया के सबसे ज्यादा दबाव वाले देशों में शामिल है. CLSA के अनुमानों के मुताबिक, गैर-हाउसिंग कर्ज के मामले में भारतीय परिवारों की स्थिति काफी चुनौतीपूर्ण है.
कमाई से चार गुना तेजी से बढ़ रहा कर्ज
घरेलू कर्ज बढ़ने के साथ सबसे बड़ी चिंता यह है कि लोगों की कमाई उसी रेशियो में नहीं बढ़ रही है. सेंटर फॉर सोशल एंड इकोनॉमिक प्रोग्रेस के आंकड़ों के मुताबिक, वित्त वर्ष 2025-26 में भारतीय परिवारों का कर्ज बढ़ने की रफ्तार डिस्पोजेबल इनकम की तुलना में करीब चार गुना रही.
वहीं, महंगाई को समायोजित करने के बाद नौकरीपेशा लोगों की औसत वास्तविक कमाई में भी बहुत सीमित बढ़ोतरी हुई है. पीरियोडिक लेबर फोर्स सर्वे पर आधारित आंकड़ों के मुताबिक, 2025 तक के तीन साल में नियमित वेतन पाने वाले कर्मचारियों की वास्तविक औसत कमाई में 4 फीसदी से भी कम की बढ़ोतरी हुई. इसका मतलब है कि लोगों की आमदनी सीमित रफ्तार से बढ़ रही है, जबकि खर्च और कर्ज का बोझ तेजी से बढ़ रहा है.
iPhone से टीवी तक, EMI पर खरीदारी का बढ़ता चलन
आसान लोन की सुविधा ने लोगों के खरीदारी करने के तरीके को बदल दिया है. अब मोबाइल फोन, टीवी, गेमिंग कंसोल और दूसरे महंगे सामान खरीदने के लिए पूरी रकम जुटाने की जरूरत नहीं पड़ती. छोटी-छोटी मासिक किस्तों के जरिए लोग अपनी पसंद की चीजें खरीद लेते हैं.
रेस्टोरेंट में काम करने वाले 25 वर्षीय नवजोत सिंह इसका उदाहरण हैं. 50,000 रुपये महीने की सैलरी होने के बावजूद उन्होंने iPhone खरीदने के लिए लोन लिया. इसके बाद उन्होंने प्लेस्टेशन, टीवी, वाइन और स्पिरिट्स कोर्स और घर जाने के लिए भी कर्ज लिया.
धीरे-धीरे उनके वेतन का करीब आधा हिस्सा लोन की किस्तों में जाने लगा. खर्च संभालने के लिए उन्हें बाहर खाना, कपड़े खरीदना और जिम जाना तक छोड़ना पड़ा. यह उदाहरण दिखाता है कि छोटी-छोटी EMI मिलकर किस तरह किसी व्यक्ति के मासिक बजट को बिगाड़ सकती हैं.
पुराने कर्ज चुकाने के लिए ले रहे गोल्ड लोन
कर्ज का दबाव इतना बढ़ रहा है कि कुछ लोग पुराने कर्ज चुकाने के लिए भी नया लोन ले रहे हैं. भारत में परिवार अक्सर आर्थिक परेशानी के समय अपने सोने के गहने गिरवी रखकर कर्ज लेते हैं.
इंडिया रेटिंग्स एंड रिसर्च के मुताबिक, मार्च 2026 तक के एक साल में गोल्ड लोन में करीब 45 फीसदी की बढ़ोतरी हुई. यह बैंकों के कुल कर्ज की वृद्धि दर से करीब तीन गुना है.
बजाज फाइनेंस और पीरामल फाइनेंस जैसी गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों ने भी बताया है कि आर्थिक दबाव में फंसे कुछ कर्जदार दूसरे कर्जों की किस्त चुकाने के लिए गोल्ड लोन ले रहे हैं. यानी कर्ज चुकाने के लिए नया कर्ज लेने का चलन बढ़ रहा है.
ब्याज दरें बढ़ीं तो बढ़ सकती है मुश्किल
अब भारतीय परिवारों के सामने एक और चुनौती ब्याज दरों में बढ़ोतरी की है. भारतीय रिजर्व बैंक की प्रमुख ब्याज दर 5.5 फीसदी है. इसमें करीब चार साल बाद पहली बढ़ोतरी की गई थी. अर्थशास्त्रियों का अनुमान है कि आने वाले महीनों में ब्याज दरों में 75 से 100 बेसिस पॉइंट तक की और बढ़ोतरी हो सकती है.
मिडिल क्लास के लिए क्यों बढ़ रही है चिंता?
आसान लोन ने लोगों की खरीदारी की क्षमता जरूर बढ़ाई है, लेकिन इसके साथ EMI का बोझ भी बढ़ रहा है. जब कमाई की तुलना में कर्ज तेजी से बढ़ता है तो परिवारों के पास बचत और दूसरे जरूरी खर्चों के लिए कम पैसा बचता है.
ऐसे में ब्याज दरों में बढ़ोतरी, नौकरी जाने या आमदनी घटने की स्थिति में कर्ज चुकाना मुश्किल हो सकता है. भारत की खपत आधारित अर्थव्यवस्था के लिए भी यह चिंता का विषय है, क्योंकि अगर परिवार अपनी कमाई का बड़ा हिस्सा EMI में खर्च करने लगेंगे तो दूसरी चीजों पर खर्च करने की क्षमता घट सकती है.