ITR में नहीं दिखाई 37 लाख की कमाई, इनकम टैक्स विभाग ने लगाया 29 लाख का जुर्माना; जानें पूरा मामला

एक टैक्सपेयर ने ITR में पिछली कंपनी से मिली 13.63 लाख रुपये की सैलरी, बैंक ब्याज और किराये की कमाई नहीं दिखाई थी. इनकम टैक्स विभाग ने 36.97 लाख रुपये की अतिरिक्त आय जोड़कर 29.07 लाख रुपये की पेनल्टी लगाई. जानें क्या है पूरा मामला.

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इनकम टैक्स रिटर्न (ITR) दाखिल करते समय अगर आप अपनी सैलरी, बैंक ब्याज या किराये से होने वाली कमाई की जानकारी देना भूल जाते हैं, तो यह आपके लिए परेशानी खड़ी कर सकता है. ऐसा ही एक मामला इनकम टैक्स अपीलेट ट्रिब्यूनल (ITAT) की मुंबई बेंच के सामने आया. एक टैक्सपेयर ने अपनी पिछली कंपनी से मिली 13.63 लाख रुपये की सैलरी, बैंक और फिक्स्ड डिपॉजिट से मिले ब्याज और किराये की कमाई को ITR में शामिल नहीं किया था.

इनकम टैक्स विभाग ने दोबारा जांच के दौरान करीब 36.98 लाख रुपये की अतिरिक्त कमाई का पता लगाया. इसके बाद विभाग ने टैक्सपेयर पर 29.07 लाख रुपये की पेनल्टी लगा दी. आइए जानते हैं क्या है पूरा मामला.

क्या है पूरा मामला?

फाइनेंशियल एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, यह मामला वचन सिंह का है. उन्होंने असेसमेंट ईयर 2020-21 के लिए 23 दिसंबर 2020 को अपना इनकम टैक्स रिटर्न दाखिल किया था. इसमें उन्होंने कुल 87,67,260 रुपये की आय दिखाई थी. इसमें Larsen & Toubro Limited से मिलने वाली सैलरी शामिल थी.

बाद में इनकम टैक्स विभाग को जानकारी मिली कि संबंधित वित्त वर्ष में वचन सिंह को Mahagun India Private Limited से भी सैलरी मिली थी. इसके अलावा उनके बैंक खातों और फिक्स्ड डिपॉजिट पर ब्याज की कमाई हुई थी. उन्हें किराये से भी आमदनी हुई थी. ये सभी आय उनके मूल ITR में शामिल नहीं थीं.

इस जानकारी के आधार पर विभाग ने इनकम टैक्स एक्ट की धारा 147 के तहत दोबारा जांच शुरू की और 29 मार्च 2024 को धारा 148 के तहत नोटिस जारी किया. टैक्सपेयर ने इस नोटिस के जवाब में रिटर्न दाखिल नहीं किया, लेकिन 15 अगस्त 2024, 9 दिसंबर 2024 और 20 फरवरी 2025 को विभाग को अपनी सफाई दी.

विभाग ने इनकम टैक्स के Insight पोर्टल पर उपलब्ध जानकारी, Form 26AS, बैंक स्टेटमेंट और टैक्सपेयर के जवाबों की जांच की. इसके बाद तीन मदों में अतिरिक्त आय जोड़ी गई.

36.97 लाख रुपये की अतिरिक्त कमाई का कैसे हुआ खुलासा?

इनकम टैक्स विभाग ने जांच के बाद टैक्सपेयर की आय में कुल 36,97,946 रुपये जोड़े. इसका ब्योरा इस तरह है.

कमाई का जरियाअतिरिक्त आय
Mahagun India Pvt Ltd से सैलरी₹13,63,188
बैंक खाते और FD पर ब्याज₹21,54,758
किराये से आय₹1,80,000
कुल अतिरिक्त आय₹36,97,946

इस तरह टैक्सपेयर की कुल आकलित आय 87.67 लाख रुपये से बढ़कर करीब 1.24 करोड़ रुपये हो गई. विभाग ने 10 मार्च 2025 को धारा 147 के साथ धारा 144 और 144B के तहत दोबारा आकलन पूरा किया.

पिछली कंपनी की सैलरी ITR में क्यों नहीं दिखाई?

सुनवाई के दौरान वचन सिंह ने बताया कि उन्होंने अप्रैल 2019 तक Mahagun India Private Limited में काम किया था. उनके मुताबिक, उनका ITR मौजूदा कंपनी Larsen & Toubro से मिले Form 16 के आधार पर तैयार किया गया था. उन्होंने कहा कि उन्हें Mahagun India से Form 16 नहीं मिला था. इसी वजह से पिछली कंपनी से मिली सैलरी गलती से ITR में शामिल नहीं हो पाई.

इस मामले में एक और बात अहम रही. Mahagun India ने वचन सिंह की सैलरी से 1.70 लाख रुपये का TDS काटा था. लेकिन उन्होंने अपने मूल ITR में इस TDS का क्रेडिट भी क्लेम नहीं किया था. टैक्सपेयर ने दलील दी कि अगर वह जानबूझकर सैलरी छिपाना चाहते, तो उससे जुड़े TDS का क्रेडिट भी क्लेम कर सकते थे. सैलरी और उससे जुड़े TDS, दोनों का ITR में शामिल नहीं होना उनकी इस दलील को समर्थन देता है कि यह चूक अनजाने में हुई थी. ट्रिब्यूनल ने इस बात को एक अहम परिस्थिति माना. हालांकि, उसने यह नहीं कहा कि अनजाने में हुई चूक की बात पूरी तरह साबित हो गई थी.

ब्याज की कमाई में भी सामने आया अंतर

इस मामले में बैंक ब्याज की रकम को लेकर भी अंतर सामने आया. विभाग को शुरुआती जानकारी में टैक्सपेयर की ब्याज से कमाई 42,76,735 रुपये बताई गई थी. लेकिन बैंक स्टेटमेंट, Form 26AS, Insight पोर्टल की जानकारी और टैक्सपेयर की सफाई की जांच के बाद विभाग ने वास्तविक ब्याज आय 21,54,758 रुपये मानी.

इसलिए आय में ब्याज के तौर पर इसी रकम को जोड़ा गया. वहीं, टैक्सपेयर ने दोबारा जांच के दौरान 1.80 लाख रुपये की किराये की आय को स्वीकार किया और इस पर लागू टैक्स व ब्याज चुकाने की इच्छा जताई.

पेनल्टी की कार्रवाई के दौरान टैक्सपेयर ने बताया कि उसने कुल 17,22,640 रुपये टैक्स और ब्याज के रूप में जमा किए हैं. हालांकि, उसने TDS और सेल्फ-असेसमेंट टैक्स क्रेडिट में सुधार की मांग भी की थी.

29 लाख रुपये की पेनल्टी क्यों लगाई गई?

अतिरिक्त आय सामने आने के बाद असेसिंग ऑफिसर ने इनकम टैक्स एक्ट की धारा 270A के तहत पेनल्टी की कार्रवाई शुरू की. विभाग ने 36,97,946 रुपये की अतिरिक्त आय को गलत रिपोर्टिंग यानी Misreporting के कारण कम दिखाई गई आय माना.

विभाग ने इस अतिरिक्त आय पर देय टैक्स 14,53,842 रुपये तय किया. इसके बाद इस टैक्स का 200% यानी 29,07,684 रुपये की पेनल्टी लगा दी. टैक्सपेयर ने इस फैसले को चुनौती दी. उनका कहना था कि विभाग ने यह नहीं बताया कि उनकी कौन-सी कार्रवाई कानून के तहत Misreporting मानी गई है. उन्होंने यह भी कहा कि उन्होंने कोई फर्जी दस्तावेज, गलत एंट्री या काल्पनिक खर्च का दावा नहीं किया था.

हालांकि, असेसिंग ऑफिसर ने उनकी दलील खारिज कर दी. विभाग का कहना था कि टैक्सपेयर ने न तो मूल ITR में यह आय दिखाई और न ही धारा 148 के नोटिस के जवाब में रिटर्न दाखिल किया. विभाग के मुताबिक, दोबारा जांच नहीं होती तो यह आय टैक्स के दायरे से बाहर रह जाती.

इसके बाद टैक्सपेयर ने कमिश्नर ऑफ इनकम टैक्स (अपील) के पास अपील की. लेकिन नेशनल फेसलेस अपील सेंटर ने 4 मार्च 2026 को उनकी अपील खारिज कर दी और पेनल्टी बरकरार रखी. इसके बाद उन्होंने मुंबई बेंच के ITAT का रुख किया.

Under-reporting और Misreporting में क्या है अंतर?

इस मामले में सबसे अहम सवाल यही था कि क्या ITR में अतिरिक्त आय नहीं दिखाने को अपने आप Misreporting माना जा सकता है और क्या इसके लिए 200% पेनल्टी लगाई जा सकती है?

इनकम टैक्स एक्ट की धारा 270A में कम आय दिखाने यानी Under-reporting के मामलों में पेनल्टी का प्रावधान है. लेकिन कानून सामान्य Under-reporting और Misreporting के कारण हुई Under-reporting के बीच अंतर करता है.

धारा 270A(7) के तहत सामान्य Under-reporting के मामले में कम दिखाई गई आय पर देय टैक्स का 50% पेनल्टी लग सकती है. वहीं, धारा 270A(8) के तहत अगर Under-reporting की वजह Misreporting है, तो देय टैक्स का 200% पेनल्टी लग सकती है.

कानून की धारा 270A(9) में Misreporting की छह स्थितियां बताई गई हैं. इनमें तथ्य छिपाना या गलत जानकारी देना, खातों में निवेश दर्ज नहीं करना, सबूत के बिना खर्च का दावा करना, खातों में गलत एंट्री करना, कुल आय पर असर डालने वाली प्राप्तियों को खातों में दर्ज नहीं करना और चैप्टर X के तहत आने वाले कुछ खास इंटरनेशनल या डोमेस्टिक ट्रांजैक्शन की जानकारी नहीं देना शामिल है.

ITAT ने कहा कि विभाग को यह बताना होगा कि टैक्सपेयर का मामला इन छह में से किस श्रेणी में आता है. Under-reporting और Misreporting एक-दूसरे के समान नहीं हैं. ट्रिब्यूनल के मुताबिक, हर Misreporting में Under-reporting शामिल हो सकती है, लेकिन रिटर्न और आकलित आय के बीच हर अंतर को Misreporting नहीं माना जा सकता.

ITAT ने पेनल्टी नोटिस में क्या कमी पाई?

मुंबई बेंच ने पाया कि असेसिंग ऑफिसर ने यह स्पष्ट नहीं किया था कि टैक्सपेयर ने धारा 270A(9) की किस कैटेगरी के तहत गलत रिपोर्टिंग की है. 10 मार्च 2025 के पेनल्टी नोटिस में सिर्फ इतना कहा गया था कि आय को Misreporting के कारण कम दिखाया गया है. लेकिन यह नहीं बताया गया कि मामला तथ्य छिपाने, गलत एंट्री करने या खातों में कमाई दर्ज नहीं करने से जुड़ा है.

पेनल्टी के अंतिम आदेश में भी धारा 270A(9) के प्रावधानों को दोहराया गया, लेकिन यह नहीं बताया गया कि इनमें से कौन-सा प्रावधान इस मामले पर लागू होता है.

ट्रिब्यूनल ने कहा कि Misreporting की हर श्रेणी के लिए अलग-अलग तथ्य और आरोप होते हैं. इसलिए टैक्सपेयर को यह पता होना चाहिए कि उस पर किस तरह की गलती का आरोप लगाया गया है, ताकि वह अपना जवाब दे सके.

ITAT ने इस संबंध में कहा, “कानून के प्रावधान को दोहरा देना, किसी निष्कर्ष का विकल्प नहीं हो सकता.”

ट्रिब्यूनल ने यह भी कहा कि विभाग ने यह साबित नहीं किया कि टैक्सपेयर ने कोई फर्जी दस्तावेज दिया, गलत जानकारी पेश की, झूठा दावा किया या काल्पनिक एंट्री बनाई. सिर्फ मूल ITR में आय शामिल नहीं करने से धारा 270A(9) के तहत तथ्य छिपाना या गलत जानकारी देना साबित नहीं होता.

आय छिपकर टैक्स के दायरे से बाहर रह जाती, तो क्या यह Misreporting है?

इनकम टैक्स विभाग की दलील थी कि अगर दोबारा जांच नहीं होती, तो टैक्सपेयर की अतिरिक्त आय पर टैक्स नहीं लगता. ITAT ने माना कि टैक्सपेयर ने मूल ITR में यह आय नहीं दिखाई थी और धारा 148 के नोटिस के जवाब में रिटर्न भी दाखिल नहीं किया था.

लेकिन ट्रिब्यूनल के मुताबिक, इन परिस्थितियों से Under-reporting का मामला बन सकता है. सिर्फ इसी आधार पर Misreporting साबित नहीं होती. अगर टैक्स के दायरे से बाहर रह जाने की संभावना को ही Misreporting मान लिया जाए, तो दोबारा आकलन में आय जोड़ने वाले लगभग हर मामले में 200% पेनल्टी लग सकती है.

ITAT ने यह भी कहा कि टैक्सपेयर की सफाई कमजोर या अधूरी होने से असेसिंग ऑफिसर की यह जिम्मेदारी खत्म नहीं हो जाती कि वह 200% पेनल्टी लगाने के लिए कानून में बताई गई खास गलती को साबित करे.

ट्रिब्यूनल ने अतिरिक्त आय स्वीकार करने, सैलरी से जुड़े TDS का क्रेडिट क्लेम नहीं करने, दोबारा जांच के दौरान दिए गए जवाब और टैक्स-ब्याज के भुगतान को भी मामले की अहम परिस्थितियों के तौर पर देखा. हालांकि, उसने साफ किया कि उसका फैसला मुख्य रूप से विभाग की उस नाकामी पर आधारित है, जिसमें वह धारा 270A(9) के तहत Misreporting की किसी खास श्रेणी को साबित नहीं कर पाया.

ITAT ने पूरी 29.07 लाख रुपये की पेनल्टी हटाई

मुंबई बेंच ने दिल्ली हाई कोर्ट के GE Capital US Holding Inc. बनाम Deputy Commissioner of Income-tax (2024 SCC OnLine Del 4233) मामले का भी जिक्र किया. इसके अलावा Jaina Marketing and Associates और Prem Brothers Infrastructure LLP से जुड़े फैसलों को भी आधार बनाया.

इन फैसलों के मुताबिक, Under-reporting और Misreporting अलग-अलग तरह की चूक हैं. ज्यादा पेनल्टी लगाने के लिए विभाग को कानून के तहत सही आरोप बताना और उसे साबित करना जरूरी है.

ITAT ने पाया कि असेसिंग ऑफिसर ने जांच, नोटिस या पेनल्टी आदेश के किसी भी चरण में धारा 270A(9) की लागू होने वाली खास श्रेणी नहीं बताई थी. ट्रिब्यूनल ने 200% पेनल्टी को 50% की सामान्य Under-reporting पेनल्टी में बदलने से भी इनकार किया.

इसकी वजह यह थी कि विभाग ने पेनल्टी की कार्रवाई खास तौर पर Misreporting के कारण Under-reporting के आधार पर शुरू की थी. जब यह आरोप ही साबित नहीं हुआ, तो अपीलीय स्तर पर इसे बदलकर एक नया आरोप नहीं बनाया जा सकता था.

इस आधार पर ITAT ने असेसिंग ऑफिसर को 29,07,684 रुपये की पूरी पेनल्टी हटाने का निर्देश दिया. यह आदेश 16 सितंबर 2026 को सुनाया गया. मामले की सुनवाई ज्यूडिशियल मेंबर अमित शुक्ला और अकाउंटेंट मेंबर मकरंद वसंत महादेओकर की बेंच ने की. टैक्सपेयर की अपील स्वीकार कर ली गई.

ITR भरने वालों के लिए क्या है इस फैसले का मतलब?

ITAT का यह फैसला बताता है कि ITR में कम आय दिखना और जानबूझकर गलत जानकारी देना, कानून की नजर में अलग-अलग बातें हैं. अगर विभाग को दोबारा जांच में अतिरिक्त आय मिलती है, तो इससे अपने आप यह साबित नहीं होता कि टैक्सपेयर ने Misreporting की है. 200% पेनल्टी लगाने के लिए विभाग को धारा 270A(9) के तहत लागू होने वाली खास स्थिति बतानी और साबित करनी होगी.

हालांकि, इस फैसले का मतलब यह नहीं है कि ITR में आय छूट जाने पर किसी भी स्थिति में पेनल्टी नहीं लगेगी. ट्रिब्यूनल ने इस मामले में विभाग की पेनल्टी कार्रवाई में कानूनी कमी के आधार पर राहत दी है. हर मामले में पेनल्टी का फैसला उससे जुड़े तथ्यों और परिस्थितियों के आधार पर होगा.

इसलिए ITR दाखिल करते समय सैलरी, बैंक खातों और फिक्स्ड डिपॉजिट पर मिलने वाले ब्याज और किराये से होने वाली कमाई की जानकारी जरूर जांचें. Form 26AS और दूसरे टैक्स रिकॉर्ड से मिलान करने पर ऐसी गड़बड़ियों का पता पहले ही लगाया जा सकता है.

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