बिल्डर ने तय तारीख तक नहीं दिया घर? RERA का ये नियम दिला सकता है आपका पैसा वापस

अगर बिल्डर ने बिक्री समझौते में तय तारीख तक घर का कब्जा नहीं दिया है, तो खरीदार के पास RERA के तहत कुछ परिस्थितियों में प्रोजेक्ट से बाहर निकलकर अपनी रकम वापस मांगने का अधिकार हो सकता है. इसके साथ लागू ब्याज और मुआवजे का दावा भी किया जा सकता है.

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घर खरीदना किसी भी व्यक्ति के लिए बड़ा वित्तीय फैसला होता है. लेकिन अगर बिल्डर समय पर घर का कब्जा नहीं देता या प्रोजेक्ट बीच में अटक जाता है, तो खरीदार के लिए मुश्किल बढ़ जाती है. एक तरफ होम लोन की ईएमआई चलती रहती है और दूसरी तरफ किराए का खर्च भी उठाना पड़ सकता है. ऐसे मामलों में रियल एस्टेट (रेगुलेशन एंड डेवलपमेंट) एक्ट, 2016 यानी RERA घर खरीदारों को पैसा वापस लेने का कानूनी रास्ता देता है.

मनीकंट्रोल की रिपोर्ट के मुताबिक, अगर डेवलपर बिक्री समझौते में तय समय या तय तारीख तक घर का कब्जा देने में नाकाम रहता है, तो कुछ परिस्थितियों में खरीदार प्रोजेक्ट से बाहर निकलकर अपनी जमा रकम वापस मांग सकता है. इसके साथ लागू ब्याज और मुआवजे का दावा भी किया जा सकता है.

हालांकि, सिर्फ प्रोजेक्ट में देरी होने का मतलब यह नहीं है कि हर मामले में पैसा अपने आप वापस मिल जाएगा. बिक्री समझौते में कब्जे की तारीख, देरी कितनी हुई है और क्या खरीदार ने बाद में किसी नई समयसीमा को मंजूरी दी है, इन बातों का असर पड़ सकता है.

RERA की धारा 18 के तहत कब मांग सकते हैं पैसा वापस?

RERA की धारा 18(1) के तहत अगर प्रमोटर बिक्री समझौते में तय शर्तों के मुताबिक या समझौते में दी गई तारीख तक प्रॉपर्टी का कब्जा देने में नाकाम रहता है, तो खरीदार के पास प्रोजेक्ट से बाहर निकलने का अधिकार है. अगर खरीदार प्रोजेक्ट छोड़ने का फैसला करता है, तो प्रमोटर को उससे ली गई रकम वापस करनी होगी. इसके साथ तय दर के मुताबिक ब्याज और RERA के तहत मुआवजा भी देना होगा.

यहां खरीदार के पास सिर्फ पैसा वापस लेने का ही विकल्प नहीं है. अगर वह प्रोजेक्ट से बाहर नहीं निकलना चाहता, तो वह प्रोजेक्ट में बना रह सकता है और कब्जा मिलने तक देरी के हर महीने के लिए ब्याज का दावा कर सकता है.

कितना ब्याज मिल सकता है?

RERA की धारा 18 के तहत पूरे देश में ब्याज की एक ही तय दर नहीं है. लागू ब्याज दर संबंधित राज्य के RERA नियमों और विनियमों पर निर्भर करती है. हालांकि, कई राज्यों में निर्धारित ब्याज दर SBI की सबसे ज्यादा Marginal Cost of Lending Rate यानी MCLR + 2% सालाना है. इसलिए किसी मामले में कितना ब्याज मिलेगा, यह संबंधित राज्य के RERA नियमों के आधार पर तय होगा.

क्या खरीदार को प्रोजेक्ट छोड़ना जरूरी है?

नहीं. RERA के तहत खरीदार के पास दो विकल्प हो सकते हैं. अगर वह प्रोजेक्ट से बाहर निकलना चाहता है, तो जमा रकम, लागू ब्याज और मुआवजे की मांग कर सकता है. वहीं, अगर वह घर लेना चाहता है तो प्रोजेक्ट में बना रहकर कब्जा मिलने तक देरी की अवधि के लिए ब्याज मांग सकता है.

सुप्रीम कोर्ट ने Experion Developers Pvt. Ltd. बनाम Sushma Ashok Shiroor (2022) मामले में भी RERA की धारा 18 के तहत खरीदार के इस विकल्प को मान्यता दी थी. अदालत ने माना था कि धारा 18 की शर्तें पूरी होने और खरीदार के प्रोजेक्ट से बाहर निकलने का फैसला करने पर रिफंड मांगने का अधिकार बना रहता है.

रिफंड का फैसला लेते समय RERA किन बातों को देखता है?

रिफंड के मामले में RERA अथॉरिटी कई बातों पर गौर कर सकती है. इसमें बिक्री समझौता, उसमें दी गई कब्जे की तारीख, देरी की अवधि और प्रोजेक्ट में निर्माण की वास्तविक स्थिति शामिल है.

इसके अलावा यह भी देखा जा सकता है कि प्रमोटर ने RERA के तहत अपनी जिम्मेदारियां पूरी की हैं या नहीं. प्रोजेक्ट के लिए कोई एक्सटेंशन मिला है या नहीं, नई समयसीमा तय की गई है या नहीं और बिल्डर तथा खरीदार के बीच क्या बातचीत हुई है, इन बातों को भी ध्यान में रखा जा सकता है.

यह भी देखा जा सकता है कि देरी बिल्डर की वजह से हुई है या खरीदार की वजह से. प्रोजेक्ट से जुड़ी जरूरी मंजूरियां और RERA के तहत दिए गए एक्सटेंशन भी मामले में अहम हो सकते हैं.

सबसे अहम बात यह होती है कि क्या प्रमोटर बिक्री समझौते में तय अवधि के भीतर कब्जा देने में नाकाम रहा है और देरी कितनी लंबी और लगातार है.

बिल्डर ने नई कब्जे की तारीख दे दी तो क्या रिफंड का अधिकार खत्म हो जाएगा?

सिर्फ बिल्डर की ओर से नई कब्जे की तारीख देने से खरीदार का RERA के तहत रिफंड का अधिकार अपने आप खत्म नहीं होता. अगर बिक्री समझौते में दी गई मूल कब्जे की तारीख निकल चुकी है और खरीदार प्रोजेक्ट से बाहर निकलने का फैसला करता है, तो बिल्डर की ओर से एकतरफा नई तारीख देने से उसका यह अधिकार खत्म नहीं होता.

हालांकि, मामला तब अलग हो सकता है जब खरीदार खुद नई समयसीमा पर सहमत हो जाए. अगर खरीदार ने किसी संशोधन, अतिरिक्त समझौते या सहमति पत्र पर हस्ताक्षर करके कब्जे की नई तारीख स्वीकार कर ली है, तो इसका असर उसके रिफंड के दावे पर पड़ सकता है.

इसलिए किसी भी ऐसे दस्तावेज पर हस्ताक्षर करने से पहले उसकी शर्तों को ध्यान से पढ़ना जरूरी है, खासकर तब जब उसमें कब्जे की तारीख बढ़ाने या देरी से जुड़े दावे छोड़ने की बात हो.

बिल्डर पैसा वापस करने से मना करे तो क्या करें?

अगर खरीदार प्रोजेक्ट से बाहर निकलना चाहता है, तो उसे अपना फैसला बिल्डर को साफ तौर पर लिखित रूप में बताना चाहिए. इसमें मूल बिक्री समझौते और उसमें दी गई कब्जे की तारीख का हवाला देना चाहिए. खरीदार को बिक्री समझौता, किए गए भुगतान के रिकॉर्ड, बिल्डर के साथ हुई बातचीत, देरी से जुड़े नोटिस और प्रोजेक्ट के RERA रजिस्ट्रेशन व उसकी स्थिति से जुड़े दस्तावेज भी संभालकर रखने चाहिए.

अगर वैध मांग के बावजूद बिल्डर पैसा वापस नहीं करता है, तो खरीदार संबंधित राज्य RERA अथॉरिटी के पास शिकायत कर सकता है. RERA की धारा 31 के तहत शिकायत दाखिल करके जमा रकम और लागू ब्याज वापस लेने की मांग की जा सकती है.

क्या देरी होने पर EMI रोक देनी चाहिए?

प्रोजेक्ट में देरी होने पर खरीदार को अपनी तरफ से होम लोन की EMI या दूसरी तय किस्तें रोकने का फैसला जल्दबाजी में नहीं करना चाहिए. RERA के तहत खरीदार के अधिकारों के साथ उसकी अपनी जिम्मेदारियां भी होती हैं.

अगर भुगतान रोकने पर विचार किया जा रहा है, तो बिक्री समझौते और मामले की पूरी स्थिति को देखते हुए कानूनी सलाह लेना बेहतर है.

घर खरीदारों के लिए सबसे जरूरी बात

बिल्डर की ओर से घर देने में देरी का मतलब यह नहीं है कि खरीदार को हमेशा इंतजार करते रहना होगा. RERA की धारा 18 कुछ परिस्थितियों में खरीदार को प्रोजेक्ट से बाहर निकलकर अपनी रकम वापस मांगने का अधिकार देती है. इसके साथ लागू ब्याज और मुआवजे का दावा भी किया जा सकता है.

लेकिन रिफंड मांगने से पहले खरीदार को मूल बिक्री समझौते में दी गई कब्जे की तारीख, देरी की अवधि और बाद में स्वीकार की गई किसी नई समयसीमा को जरूर जांचना चाहिए. इसके बाद अगर वह प्रोजेक्ट से बाहर निकलना चाहता है, तो अपना फैसला बिल्डर को लिखित रूप में देना चाहिए और सभी जरूरी दस्तावेज सुरक्षित रखने चाहिए. जरूरत पड़ने पर संबंधित राज्य RERA अथॉरिटी में शिकायत दर्ज कराई जा सकती है.

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