रिटायरमेंट के बाद शेयर बाजार गिरा तो आपकी सेविंग्स का क्या होगा?
रिटायरमेंट के करीब शेयर बाजार में 25% की गिरावट आपके कॉर्पस पर बड़ा असर डाल सकती है. अगर खर्च के लिए इक्विटी बेचनी पड़े, तो नुकसान बढ़ सकता है. ऐसे में 2-3 साल का खर्च बफर मददगार हो सकता है.

रिटायरमेंट के करीब पहुंचते समय ज्यादा रिटर्न के लिए इक्विटी में बड़ा निवेश करना फायदेमंद लग सकता है. लेकिन अगर इसी दौरान शेयर बाजार में 25% की गिरावट आ जाए तो आपकी जमा पूंजी और नियमित आय की योजना पर असर पड़ सकता है.
रिटायरमेंट के समय मार्केट क्रैश का जोखिम क्यों बड़ा है?
निवेश की शुरुआत में बाजार में गिरावट आने पर निवेशक के पास रिकवरी के लिए कई साल होते हैं. लेकिन रिटायरमेंट के ठीक पहले या बाद में स्थिति अलग होती है. इस समय अगर पोर्टफोलियो का बड़ा हिस्सा इक्विटी में है और बाजार तेजी से गिरता है, तो नुकसान की भरपाई के लिए पर्याप्त समय नहीं मिल सकता.
मान लीजिए किसी व्यक्ति के पास रिटायरमेंट के समय ₹1 करोड़ का पोर्टफोलियो है और उसका बड़ा हिस्सा शेयरों में लगा है. अगर बाजार 25% गिरता है, तो इक्विटी हिस्से में बड़ी गिरावट देखने को मिल सकती है. ऐसे समय नियमित खर्च के लिए शेयर बेचने पड़ें तो नुकसान का असर और बढ़ सकता है.
गिरते बाजार में पैसे निकालना बन सकता है समस्या
रिटायरमेंट के बाद आमदनी का बड़ा स्रोत निवेश से मिलने वाली रकम हो सकती है. कई लोग म्यूचुअल फंड से Systematic Withdrawal Plan (SWP) के जरिए हर महीने पैसा निकालते हैं.
समस्या तब आती है जब बाजार गिर रहा हो और उसी समय निवेश से निकासी भी जारी रहे. कम कीमत पर यूनिट बेचने से पोर्टफोलियो में बची रकम घट सकती है. बाजार बाद में रिकवर भी करे, लेकिन कम यूनिट बचने के कारण पहले हुए नुकसान की भरपाई मुश्किल हो सकती है.
इसे रिटायरमेंट प्लानिंग में Sequence of Returns Risk कहा जाता है. यानी निवेश के शुरुआती वर्षों में मिलने वाले रिटर्न का क्रम भी आपके कॉर्पस की अवधि पर असर डाल सकता है.
2-3 साल के खर्च का बफर मददगार
ऐसे जोखिम को कम करने के लिए रिटायरमेंट के करीब पहुंचने वाले निवेशक अपने पोर्टफोलियो में पर्याप्त सुरक्षित और लिक्विड निवेश रख सकते हैं. इसका उद्देश्य यह है कि बाजार में बड़ी गिरावट आने पर रोजमर्रा के खर्च के लिए तुरंत इक्विटी बेचने की जरूरत न पड़े.
कुछ विशेषज्ञ रिटायरमेंट के बाद के शुरुआती 2-3 साल के खर्च के लिए अलग बफर रखने की बात करते हैं. इस अवधि का खर्च अपेक्षाकृत कम जोखिम वाले विकल्पों में रखा जा सकता है. इससे बाजार में गिरावट के दौरान इक्विटी निवेश को समय मिल सकता है.
पूरा पैसा इक्विटी में रखना जरूरी नहीं
रिटायरमेंट पोर्टफोलियो बनाते समय सिर्फ ज्यादा रिटर्न पर ध्यान देना पर्याप्त नहीं है. निवेशक को यह भी देखना चाहिए कि उसे हर महीने कितने पैसे की जरूरत होगी और बाजार में बड़ी गिरावट आने पर वह कितने समय तक बिना इक्विटी बेचने के खर्च चला सकता है.
इक्विटी और डेट के बीच सही संतुलन व्यक्ति की उम्र, खर्च, अन्य आय, जोखिम क्षमता और रिटायरमेंट अवधि पर निर्भर करता है. इसलिए रिटायरमेंट के करीब पहुंचते समय पोर्टफोलियो की समीक्षा करना महत्वपूर्ण है.
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