Subhash Chandra Case: इनसॉल्वेंसी रुल्स में ये 4 बडे़ बदलाव करेगी IBBI! जानें कंपनियों पर क्या होगा असर
सुभाष चंद्रा के मामले में 22006.57 करोड़ रुपये के दावों के मुकाबले केवल 6.25 करोड़ रुपये के रिपेमेंट प्लान को लेकर उठे सवालों के बीच IBBI ने पर्सनल गारंटर की दिवाला प्रक्रिया में चार बदलाव प्रस्तावित किए हैं. इनमें संबंधित पक्षों की वोटिंग रोकना, संदिग्ध लेनदेन की जांच, गारंटर की संपत्ति का अनिवार्य वैल्यएशन और कर्जदाताओं के फैसले का विस्तृत रिकॉर्ड रखना शामिल है.

सुभाष चंद्रा के मामले में बेहद कम रकम वाले रिपेमेंट प्लान को लेकर उठे सवालों के बीच दिवाला प्रक्रिया से जुडे़ नियमों में बदलाव की तैयारी है. इंसाल्वेंसी एंड बैंकरप्सी बोर्ड ऑफ इंडिया यानी IBBI ने पर्सनल गारंटर से जुड़ी दिवाला प्रक्रिया को मजबूत करने के लिए चार बदलाव प्रस्तावित किए हैं. इनका असर कंपनियों और उनके व्यक्तिगत गारंटर दोनों पर पड़ सकता है. प्रस्तावों का मकसद बैंकों और दूसरे कर्ज लेने वाले को ज्यादा सेफ्टी देना है. IBBI ने इन बदलावों पर 3 अक्टूबर तक लोगों से सुझाव मांगे हैं. इन बदलावों में वोटिंग, संपत्ति की वैल्यू और ट्रांजेक्शन की जांच से जुडे़ नियम शामिल हैं.
सुभाष चंद्रा केस से क्यों उठा सवाल
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, 25 अगस्त को NCLT की एक सदस्यीय पीठ ने सुभाष चंद्रा का रिपेमेंट प्लान मंजूर किया था. इस प्लान में 22006.57 करोड़ रुपये के मंजूर दावों के मुकाबले केवल 6.25 करोड़ रुपये देने की पेशकश की गई थी. इतनी कम रकम को लेकर बैंकों और दूसरे कर्जदाताओं ने सवाल उठाए. बैंकों का आरोप था कि कुछ गैर बैंक संस्थाएं सुभाष चंद्रा से जुड़ी या संबंधित थीं. आरोप यह भी था कि इन संस्थाओं ने उनके प्रभाव में आकर प्लान को आगे बढ़ाने में भूमिका निभाई.
वोटिंग से रोकने का प्रस्ताव
IBBI ने प्रस्ताव दिया है कि गारंटर से जुड़ी संबंधित पार्टी को रिपेमेंट प्लान पर वोट करने का अधिकार नहीं होना चाहिए. मौजूदा नियम में एसोसिएट को वोटिंग से रोकने का प्रावधान है. लेकिन एसोसिएट की परिभाषा संबंधित पार्टी की तुलना में सीमित है. ऐसे में कुछ ऐसी संस्थाएं वोट कर सकती हैं जिन पर गारंटर का प्रभाव हो सकता है. नए प्रस्ताव का मकसद इस कमी को दूर करना है. इससे कर्जदाताओं के हितों की सुरक्षा मजबूत हो सकती है.
दिवाला प्रक्रिया में लेनदेन की जांच होगी
नए प्रस्ताव के तहत रिजॉल्यूशन प्रोफेशनल को गारंटर के पुराने लेनदेन की भी जांच करनी होगी. इसमें कम कीमत पर संपत्ति बेचने जैसे अंडरवैल्यूड ट्रांजैक्शन की जांच शामिल होगी. इसके अलावा पसंदीदा लेनदेन और बहुत ज्यादा ब्याज वाले कर्ज की भी जांच की जा सकती है. जांच में सामने आई जानकारी वोटिंग से पहले कर्जदाताओं के सामने रखनी होगी. किसी कानूनी कार्रवाई के लिए कर्जदाताओं की मंजूरी जरूरी होगी.
संपत्ति की वैल्यू तय करना जरूरी
IBBI ने गारंटर की संपत्ति के वैल्यूएशन को भी जरूरी बनाने का प्रस्ताव दिया है. इसके लिए रजिस्टर्ड वैल्यूअर संपत्ति की फेयर वैल्यू और रियलाइजेबल वैल्यू तय करेगा. फेयर वैल्यू से संपत्ति की उचित कीमत का अंदाजा लगाया जाएगा. वहीं रियलाइजेबल वैल्यू से यह पता चलेगा कि संपत्ति बेचने पर कितनी रकम मिल सकती है. इस रिपोर्ट को रिपेमेंट प्लान के साथ कर्जदाताओं के सामने रखा जाएगा.
फैसले का पूरा रिकॉर्ड रखना होगा
प्रस्ताव में कर्जदाताओं की बैठक और उनके फैसले का विस्तृत रिकॉर्ड रखने की बात कही गई है. इसमें बैठक में हुई चर्चा, आपत्तियां और फैसले के पीछे दिए गए कारण दर्ज करने होंगे. खास तौर पर तब ज्यादा जानकारी देनी होगी जब रिपेमेंट प्लान की रकम मंजूर दावों या संपत्ति की अनुमानित कीमत से काफी कम हो. इससे पूरी प्रक्रिया में ट्रांसेपेरेंसी बढ़ सकती है. साथ ही बाद में किसी फैसले पर सवाल उठने पर रिकॉर्ड के आधार पर स्थिति समझी जा सकेगी.
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सुभाष चंद्रा मामले में अब तक क्या हुआ
1 सितंबर को पांच सदस्यीय NCLT पीठ ने 25 अगस्त के आदेश पर रोक लगा दी थी. पीठ ने सुभाष चंद्रा को अपनी संपत्तियां बेचने या उनके ट्रांसपेरेंसी पर भी रोक लगा दी. इसके बाद चंद्रा ने पांच सदस्यीय पीठ के गठन को चुनौती दी. उनका कहना है कि ट्रिब्यूनल के पास इस तरह की पीठ बनाने का अधिकार नहीं है. इसी बीच सीबीआई ने अलग मामले में सुभाष चंद्रा और अन्य लोगों के खिलाफ एलआईसी हाउसिंग फाइनेंस को 1322 करोड़ रुपये से ज्यादा के कथित नुकसान को लेकर मामला दर्ज किया है.