डिस्काउंट का खेल! फेस्टिव सीजन में छूट देकर कैसे ई-कॉमर्स कंपनियां कर लेती हैं मोटी कमाई?
Amazon और Flipkart जैसी बड़ी ई कॉमर्स कंपनियां फेस्टिव सीजन सेल के दौरान कैसे आप लोगों को 70 से 80 फीसदी तक का डिस्काउंट देकर मोटी कमाई कर लेती हैं? क्या आपने कभी सोचा है?
Highlights
- सेल में डिस्काउंट का असली सच.
- ज्यादा बिक्री से बढ़ता है कुल मुनाफा.
- सब्सक्रिप्शन और कमीशन से मोटी कमाई.
फेस्टिव सीजन आने से पहले ही Flipkart और Amazon जैसे बड़े ई कॉमर्स प्लेटफॉर्म बिग बिलियन डेज और ग्रेट इंडियन फेस्टिवल सेल का ढोल पीटने लगते हैं. कंपनियां 70 फीसदी से 80 फीसदी तक डिस्काउंट बैनर दिखाकर कस्टमर्स के मन में लालच पैदा करती हैं. लेकिन क्या आपने कभी इस बात पर गौर किया है कि कंपनियां इतनी ज्यादा छूट देने के बावजूद घाटे में जाने के बजाय कैसे मोटी कमाई कर लेती हैं? पहली बात तो ये समझिए कि जो कंपनी करोड़ों का बिजनेस करती है वो कभी आपको डिस्काउंट देने के चक्कर में अपना नुकसान नहीं करेगी.
कंपनी की बिजनेस स्ट्रेटेजी ऐसी होती है कि फेस्टिव सीजन के दौरान डिस्काउंट के नाम पर सामान भी धड़ाधड़ बिकता है, डिस्काउंट से कस्टमर भी खुश रहता है और ई-कॉमर्स कंपनियां भी सामान बेचकर बढ़िया कमाई कर लेती हैं, लेकिन ये सबकुछ होता कैसे है? आइए समझते हैं.
पहला है वॉल्यूम गेम
ई कॉमर्स कंपनियां ज्यादा बिक्री, ज्यादा मुनाफा की स्ट्रेटेजी पर काम करती हैं. किसी भी ई-कॉमर्स कंपनी का मुख्य आधार वॉल्यूम है. कंपनियां फेस्टिव सीजन सेल के दौरान बिक्री को बढ़ाने के लिए अपना मुनाफा कम कर लेती हैं, अब आपको लग रहा होगा कि मुनाफा कम हुआ तो ये तो कंपनी के लिए नुकसान वाली बात है लेकिन नहीं, कंपनी का नजरिए अलग है.
कंपनियां डिस्काउंट देकर ग्राहकों को लुभाने में सफल रहती हैं जिससे फेस्टिव सीजन के दौरान बिक्री 10 गुना या उससे भी ज्यादा बढ़ जाती है. सेल बढ़ी तो ऐसे में भले ही किसी प्रोडक्ट पर मुनाफा 10 फीसदी से कम होकर 2 फीसदी रह गया लेकिन बाकी दिनों की तुलना में सेल कई गुना बढ़ने से मुनाफा भी कई गुना बढ़ जाता है.
दूसरा है कमीशन का गेम
ई कॉमर्स कंपनियां सेलर्स को सामान बेचने के लिए प्लेटफॉर्म देती हैं और ई कॉमर्स कंपनियां इन सेलर्स से बिक्री के नाम पर कई तरह के चार्ज लेती हैं जिससे कंपनियों का मुनाफा बढ़ता है.
तीसरा है सब्सक्रिप्शन का खेल
मान लीजिए कि किसी प्रोडक्ट की बहुत ज्यादा डिमांड है, हर कोई वही प्रोडक्ट खरीदना चाहता है लेकिन बात इतनी सी है कि जिसने पहले ऑर्डर किया, उसी को प्रोडक्ट मिलेगा तो कंपनियां सेल शुरू होने से पहले अर्ली एक्सेस देने के नाम पर मेंबरशिप बेचकर मोटा पैसा कमाती हैं.
अमेजन के पास प्राइम मेंबरशिप तो वहीं फ्लिपकार्ट के पास ब्लैक मेंबरशिप है, अगर आपके पास मेंबरशिप है तो आपको सेल से पहले अर्ली एक्सेस मिलेगा और अपने फेवरेट प्रोडक्ट को बाकी ग्राहकों (जिनके पास मेंबरशिप नहीं है) की तुलना सबसे पहले खरीद पाएंगे. उदाहरण से समझते हैं, मान लीजिए कि अमेजन पर सेल 5 अक्टूबर से शुरू हो रही है तो वहीं मेंबरशिप वालों को 4 अक्टूबर से अर्ली एक्सेस मिलने लगता है जिससे ग्राहक इसका फायदा उठाकर सबसे पहले उस प्रोडक्ट को खरीदने में सफल हो जाते हैं जिस प्रोडक्ट की बंपर डिमांड है.
अगर कोई फेस्टिव सीजन के दौरान अर्ली एक्सेस के लिए Amazon Prime Membership लेता है तो अमेजन की मंथली मेंबरशिप के लिए 299 रुपए का चार्ज देता है. वहीं, दूसरी ओर फ्लिपकार्ट तीन महीने की ब्लैक मेंबरशिप के लिए 499 रुपए का चार्ज लेती है. उदाहरण के लिए मान लीजिए कि 1 करोड़ लोगों ने भी अगर मेंबरशिप खरीदी तो कंपनी मेंबरशिप के जरिए ही करोड़ों की कमाई कर लेती हैं.
पुराने स्टॉक को निकालती है कंपनियां
कई बार कंपनियां पुराना स्टॉक निकालने के लिए भी फेस्टिव सीजन के दौरान बंपर डिस्काउंट का फायदा देती हैं और ज्यादा छूट का लालच भला किसे पसंद नहीं है. ज्यादा छूट हर किसी को लुभाती है .
FOMO का खेल
कई बार बैनर या किसी प्रोडक्ट के नीचे टाइम चल रहा होता है कि डील कुछ ही टाइम में खत्म होने वाली है, ये है डर का खेल. अगर कोई बढ़िया डील है तो हर किसी को यही लगेगा कि डील हाथ से जानी नहीं चाहिए और व्यक्ति बिना कंपेयर किए तुरंत पहले डील को लपकने की कोशिश करेगा.
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