कैंसर मरीज की मौत के बाद रिफंड देने से बच रहा था अस्पताल, आयोग ने सुनाया बड़ा फैसला

कैंसर मरीज की मौत के बाद हैदराबाद के एक आयुर्वेदिक अस्पताल को उसके माता-पिता को 63,000 रुपये लौटाने का आदेश दिया गया है. इसमें 53,000 रुपये इस्तेमाल नहीं की गई दवाओं और थेरेपी के लिए, जबकि 10,000 रुपये मुआवजे और कानूनी खर्च के हैं.

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हैदराबाद में एक आयुर्वेदिक अस्पताल को कैंसर से पीड़ित मरीज की मौत के बाद उसके माता-पिता को 63,000 रुपये लौटाने का आदेश दिया गया है. परिवार ने बेटे के इलाज के लिए पहले ही पैसे जमा किए थे, लेकिन उसकी मौत के बाद कई दवाएं और थेरेपी सेशन इस्तेमाल नहीं हो सके. अस्पताल से बार-बार पैसे मांगने के बावजूद जब रकम वापस नहीं मिली, तो परिवार ने उपभोक्ता आयोग का दरवाजा खटखटाया.

बेटे के इलाज के लिए जमा किए थे ₹58,300

मामला हैदराबाद के एक दंपति का है, जिनका बेटा कोलोरेक्टल कैंसर से पीड़ित था. उसका कीमोथेरेपी से इलाज चल रहा था. इसी दौरान परिवार ने अतिरिक्त उपचार के लिए आयुर्वेदिक अस्पताल से संपर्क किया.

17 सितंबर 2025 को दंपति ने अस्पताल में 58,300 रुपये जमा किए. इस रकम में तीन महीने की दवाएं, डॉक्टर से परामर्श और 10 थेरेपी सेशन शामिल थे. परिवार को उम्मीद थी कि इन सेवाओं से बेटे को इलाज के दौरान मदद मिलेगी.

हालांकि, मरीज की तबीयत बिगड़ने पर उसे सर्जरी करानी पड़ी. इसके बाद भी उसकी हालत में सुधार नहीं हुआ और 24 अक्टूबर 2025 को उसकी मौत हो गई.

इस्तेमाल नहीं हुईं दवाएं, वापस नहीं मिले पैसे

बेटे की मौत के बाद परिवार के पास कई दवाएं बची हुई थीं और कुछ थेरेपी सेशन भी नहीं हुए थे. माता-पिता ने बची हुई दवाएं अस्पताल को लौटा दीं और इस्तेमाल नहीं हुई सेवाओं के लिए पैसे वापस मांगे.

परिवार ने ईमेल और व्हाट्सऐप के जरिए कई बार अस्पताल से संपर्क किया. कानूनी नोटिस भी भेजा गया, लेकिन उनकी शिकायत का समाधान नहीं हुआ. इसके बाद दंपति ने उपभोक्ता आयोग में शिकायत दर्ज कराई.

उपभोक्ता आयोग ने क्या फैसला सुनाया?

सुनवाई के दौरान अस्पताल की ओर से कोई प्रतिनिधि पेश नहीं हुआ और न ही पैसे वापस नहीं करने के पक्ष में कोई ठोस सबूत दिया गया. आयोग ने मामले में उपलब्ध दस्तावेजों और परिवार की शिकायत पर विचार किया.

आयोग ने कहा कि जब दवाएं और थेरेपी इस्तेमाल ही नहीं हुईं, तो बिना उचित कारण उनकी पूरी रकम अपने पास रखना गलत है. ऐसा करना अनुचित व्यापार व्यवहार और दूसरे पक्ष को अनुचित लाभ पहुंचाने जैसा है.

आयोग ने अस्पताल को परिवार को कुल 63,000 रुपये देने का आदेश दिया. इसमें 53,000 रुपये इस्तेमाल नहीं हुई दवाओं और थेरेपी के रिफंड के लिए हैं, जबकि 10,000 रुपये मुआवजे और कानूनी खर्च के तौर पर देने होंगे. रिफंड के लिए बची हुई दवाएं लौटाने की शर्त भी रखी गई.

उपभोक्ताओं के लिए क्या है सीख?

यह मामला बताता है कि किसी अस्पताल या सेवा प्रदाता को बिना उचित आधार के इस्तेमाल नहीं हुई सेवाओं की रकम रोककर नहीं रखनी चाहिए. हालांकि, रिफंड मिलना संबंधित परिस्थितियों, भुगतान की शर्तों और उपलब्ध सबूतों पर निर्भर कर सकता है.

अगर किसी मरीज या उसके परिवार को ऐसी परेशानी का सामना करना पड़े, तो भुगतान की रसीद, दवाओं की जानकारी, अस्पताल से हुई बातचीत और भेजे गए नोटिस जैसे दस्तावेज सुरक्षित रखने चाहिए. जरूरत पड़ने पर उपभोक्ता आयोग में शिकायत की जा सकती है.

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