15 दिन में ₹1 लाख करोड़ जुटाए, लेकिन क्या डिपॉजिट की आफत से जीत पाएंगे बैंक?

भारतीय बैंकिंग प्रणाली वर्तमान में एक महत्वपूर्ण चुनौती का सामना कर रही है, जहां ऋण की मांग जमा वृद्धि से कहीं अधिक है. क्रेडिट ग्रोथ लगभग 17.5% तक पहुंच गई है, जबकि जमा वृद्धि मुश्किल से 12% से ऊपर है, जिससे 5.5% से अधिक का बड़ा अंतर पैदा हो गया है. इस फंडिंग गैप को पूरा करने के लिए बैंकों को बाजार की ओर रुख करना पड़ा है. जून के पहले पखवाड़े में ही बैंकों ने सर्टिफिकेट ऑफ डिपॉजिट (सीडी) के जरिए ₹1 लाख करोड़ से ज्यादा जुटा लिए.

जमा वृद्धि में सुस्ती के कई कारण हैं. लोग अब उच्च रिटर्न के लिए शेयर बाजार, म्यूचुअल फंड और एसआईपी में निवेश करना पसंद कर रहे हैं, क्योंकि सावधि जमा (एफडी) पर मिलने वाला 6-7% रिटर्न बढ़ती महंगाई को मात नहीं दे पा रहा है. भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने एफसीएनआर(बी) जमा के माध्यम से विदेशी मुद्रा आकर्षित करने के लिए रियायतें भी दी हैं, लेकिन यह भी अनुमानित ऋण मांग को पूरा करने के लिए अपर्याप्त माना जा रहा है. यह स्थिति न केवल बैंकों के लिए बल्कि आम एफडी निवेशकों और कर्जदारों के लिए भी ब्याज दरों और रिटर्न के संबंध में महत्वपूर्ण असर डालती है.

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