300 अरब डॉलर का भारतीय IT सेक्टर… US से करता है 57% कमाई, ग्रीन कार्ड प्रोग्राम से बाहर होते ही 3% गिरा Infosys-Wipro का ADR

ट्रंप प्रशासन के फैसले के बाद भारतीय आईटी कंपनियों- इंफोसिस और विप्रो के अमेरिकन डिपॉजिटरी रिसीट्स (ADRs) में लगभग 3 फीसदी की गिरावट आई. हर साल मंजूर होने वाली सभी H-1B आवेदन में 70 फीसदी से अधिक भारतीय प्रोफेशनल्स की होती हैं.

भारतीय आईटी कंपनियों को झटका. Image Credit: AI

अमेरिका ने गुरुवार को विदेशी कर्मचारियों के लिए ग्रीन कार्ड के लिए आवेदन करने वाले प्रोग्राम से माइक्रोसॉफ्ट, टाटा, इंफोसिस और विप्रो समेत आठ IT कंपनियों को सस्पेंड कर दिया. उनका तर्क है कि इस प्रैक्टिस की वजह से अमेरिकी नागरिक जॉब मार्केट से बाहर हो गए हैं. ट्रंप प्रशासन के इस फैसले के बाद भारतीय आईटी कंपनियों- इंफोसिस और विप्रो के अमेरिकन डिपॉजिटरी रिसीट्स (ADRs) में लगभग 3 फीसदी की गिरावट आई.

H-1B वीजा प्रोग्राम से बाहर हुईं कई कंपनियां

यह गिरावट अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन द्वारा इन कंपनियों को ‘परमानेंट लेबर सर्टिफिकेशन प्रोग्राम’ से सस्पेंड करने के बाद आई. इस प्रोग्राम के तहत कंपनियां H-1B वीजा वाले कर्मचारियों के लिए ग्रीन कार्ड के लिए आवेदन कर सकती हैं.

इन दोनों कंपनियों के अलावा, टाटा और HCL टेक जैसी अन्य घरेलू टेक कंपनियां, और भारत में बड़ी मौजूदगी वाली अमेरिकी कंपनियां- जैसे कॉग्निजेंट, कैपजेमिनी, माइक्रोसॉफ्ट और एडोब- भी इस लिस्ट में शामिल थीं.

ADR क्या है और कैसे काम करता है?

भारतीय आईटी कंपनियों के लिए अमेरिकन डिपॉजिटरी रिसीट (ADR) एक अहम वित्तीय साधन है. इसके जरिए भारतीय कंपनियों के शेयरों में अमेरिकी शेयर बाजार में निवेश किया जा सकता है.

मान लीजिए कि भारत की कोई आईटी कंपनी अमेरिका के निवेशकों से पैसा जुटाना चाहती है. इसके लिए वह अमेरिकी बाजार में ADR जारी कर सकती है. अमेरिकी निवेशक डॉलर में इन ADR को खरीदते और बेचते हैं. प्रत्येक ADR कंपनी के एक या उससे अधिक सामान्य शेयरों का प्रतिनिधित्व कर सकता है.

भारतीय आईटी कंपनियों के लिए ADR क्यों महत्वपूर्ण है?

  • विदेशी निवेश जुटाना: अमेरिकी निवेशकों तक पहुंच बनाने में मदद मिलती है.
  • वैश्विक पहचान: कंपनी की अंतरराष्ट्रीय बाजार में पहचान और निवेशकों की दिलचस्पी बढ़ सकती है.
  • शेयर की कीमत पर असर: ADR की कीमत में उतार-चढ़ाव से कंपनी के भारतीय शेयरों पर भी असर पड़ सकता है, हालांकि दोनों बाजारों के भाव हमेशा एक जैसे नहीं चलते.
  • अमेरिकी निवेशकों की भागीदारी: अमेरिकी निवेशक स्थानीय बाजार की प्रक्रिया के तहत डॉलर में निवेश कर सकते हैं.

भारतीय आईटी सेक्टर की अमेरिका से कमाई

रिपोर्ट के अनुसार, भारत का 300 अरब डॉलर का IT सेक्टर, जो अपनी कमाई का लगभग 57 फीसदी हिस्सा अमेरिका से हासिल करता है, लंबे समय से अमेरिकी वर्क वीजा प्रोग्राम और सॉफ्टवेयर व बिजनेस सर्विस की आउटसोर्सिंग से फायदा उठाता रहा है.

हाल के वर्षों में, टेक कंपनियों ने स्थानीय स्तर पर लोगों को काम पर रखकर और ‘नियरशोरिंग’ (पास के देशों में काम आउटसोर्स करना) के जरिए H-1B वीजा पर अपनी निर्भरता कम की है.

पिछले साल भारतीयों के लिए लगभग 57,000 नए H-1B वीजा मंजूर किए गए, जो FY24 के मुकाबले 28% कम थे. पिछले साल सितंबर में अमेरिका ने नए आवेदकों के लिए H-1B वीजा की फीस बढ़ाकर सालाना 1,00,000 डॉलर कर दी थी.

US एंटी-फ्रॉड टास्क फोर्स के तहत एक्शन

ग्रीन कार्ड प्रोग्राम से इन कंपनियों को बाहर करने की घोषणा US एंटी-फ्रॉड टास्क फोर्स के तहत की गई कार्रवाई के हिस्से के तौर पर वाइस प्रेसिडेंट जे.डी. वेंस, लेबर सेक्रेटरी कीथ सोंडरलिंग और अटॉर्नी जनरल टॉड ब्लैंच ने की.

सोंडरलिंग ने कहा, ‘मैं दुनिया की कुछ सबसे बड़ी IT आउटसोर्सिंग कंपनियों – कॉग्निजेंट, इंफोसिस, टाटा, विप्रो, HCL और कैपजेमिनी – को ‘परमानेंट लेबर सर्टिफिकेशन प्रोग्राम’ से सस्पेंड कर रहा हूं.’ उन्होंने कहा कि लेबर डिपार्टमेंट कई एक्टिव फेडरल जांचों के कारण माइक्रोसॉफ्ट और एडोब को भी इस प्रोग्राम से सस्पेंड कर रहा है.

अमेरिकी कर्मचारियों से छीन ली गईं नौकरियां

सोंडरलिंग ने कहा, ‘2009 से सिर्फ इन कंपनियों ने ही लगभग 30 लाख विदेशी कर्मचारियों की मांग की है. उन्हें 2,30,000 से अधिक H-1B वीजा मंजूरी और 1,00,000 से ज्यादा परमानेंट लेबर सर्टिफिकेशन मिले हैं.’

सोंडरलिंग ने कहा कि इसका मतलब है कि लाखों नौकरियां अमेरिकी कर्मचारियों से छीन ली गईं. हर साल मंजूर होने वाली सभी H-1B आवेदन में 70 फीसदी से अधिक भारतीय प्रोफेशनल्स की होती हैं.

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