Bombay House की जंग: कैसे Ratan Tata ने Tata Group के पुराने दिग्गजों को दी चुनौती

1991 में Tata Sons की कमान संभालने के बाद Ratan Tata ने समूह के पुराने ताकतवर दिग्गजों को चुनौती दी. रिटायरमेंट नीति और संगठनात्मक बदलावों के जरिए उन्होंने Tata Group को ज्यादा एकीकृत बनाया और नई पीढ़ी के नेतृत्व का रास्ता तैयार किया.

रतन टाटा Image Credit:

Tata Group आज भारत के सबसे बड़े और भरोसेमंद कारोबारी समूहों में गिना जाता है, लेकिन करीब तीन दशक पहले इसकी तस्वीर काफी अलग थी. 1991 में जब Ratan Tata ने Tata Sons की कमान संभाली, तब उनके सामने सिर्फ कारोबार बढ़ाने की चुनौती नहीं थी, बल्कि समूह के भीतर मौजूद ताकतवर दिग्गजों से निपटने की भी बड़ी जिम्मेदारी थी. Russi Mody, Darbari Seth और Ajit Kerkar जैसे पुराने नेता अपनी-अपनी कंपनियों में बेहद मजबूत पकड़ रखते थे.

JRD Tata के दौर में बनी थी अलग व्यवस्था

JRD Tata के लंबे कार्यकाल में Tata Group की कंपनियां काफी हद तक स्वतंत्र तरीके से काम करती थीं. Tata Steel, Tata Chemicals और Indian Hotels जैसी बड़ी कंपनियों के प्रमुख अपने कारोबार में काफी शक्तिशाली थे. उन्हें अक्सर Tata Group के ‘satraps’ यानी अपने-अपने इलाके के मजबूत शासकों के तौर पर देखा जाता था.

Ratan Tata जब चेयरमैन बने, तब Tata Sons की कई समूह कंपनियों में हिस्सेदारी इतनी ज्यादा नहीं थी कि वह आसानी से उनके फैसलों पर प्रभाव डाल सके. ऐसे में चेयरमैन के पास औपचारिक पद तो था, लेकिन हर कंपनी पर सीधा नियंत्रण नहीं था.

Russi Mody से हुआ पहला बड़ा टकराव

Ratan Tata की शुरुआती बड़ी चुनौतियों में Tata Steel के तत्कालीन प्रमुख Russi Mody के साथ टकराव शामिल था. Mody Tata Steel में बेहद प्रभावशाली थे और कंपनी को लंबे समय तक मजबूत नेतृत्व दे चुके थे.

तनाव उस समय बढ़ा जब Mody ने Tata Steel में एक वरिष्ठ पद पर अपनी पसंद के व्यक्ति की नियुक्ति की. Ratan Tata की सहमति के बिना हुए इस फैसले ने दोनों के बीच मतभेद बढ़ा दिए. बाद में मामला बोर्ड और JRD Tata तक पहुंचा.

इसके बाद Ratan Tata ने समूह में पुरानी व्यवस्था बदलने की दिशा में कदम बढ़ाए. 1992 में उन्होंने लंबे समय से मौजूद रिटायरमेंट नीति को प्रभावी तरीके से लागू किया. इसके तहत एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर और एग्जीक्यूटिव चेयरमैन के लिए 65 साल और नॉन-एग्जीक्यूटिव डायरेक्टरों के लिए 75 साल की उम्र सीमा तय थी.

Retirement Rule बना बड़ा हथियार

इस नीति का असर कई पुराने दिग्गजों पर पड़ा. Russi Mody ने एग्जीक्यूटिव पद छोड़ दिया, जबकि बाद में उनका Tata Steel के साथ संबंध भी खत्म हुआ. Darbari Seth ने 75 वर्ष की उम्र पूरी होने से कुछ महीने पहले Tata Chemicals के चेयरमैन पद से इस्तीफा दे दिया. वहीं Indian Hotels के प्रमुख Ajit Kerkar को 65 वर्ष की उम्र में बोर्ड से बाहर होना पड़ा.

इस बदलाव ने Tata Group में नेतृत्व की नई पीढ़ी के लिए रास्ता खोला. Ratan Tata के लिए यह सिर्फ पुराने चेहरों को हटाने का मामला नहीं था. उनका मकसद समूह की कंपनियों को एक साझा रणनीति और ब्रांड के तहत ज्यादा मजबूती से जोड़ना था.

कंपनियों को एक समूह की तरह सोचने पर जोर

Ratan Tata ने Tata Group को ज्यादा एकीकृत बनाने के लिए कई बड़े कदम उठाए. उन्होंने Tata Sons की समूह कंपनियों में हिस्सेदारी बढ़ाने पर जोर दिया. इसके अलावा कारोबार को अलग-अलग सेक्टर में व्यवस्थित करने और एक-दूसरे से टकराते कारोबार को समेटने की कोशिश की गई.

समूह के ब्रांड को भी ज्यादा महत्व दिया गया. Tata नाम के इस्तेमाल के लिए ब्रांड फीस की व्यवस्था शुरू हुई. पुराने नेताओं ने इसका विरोध किया, क्योंकि कई कंपनियां खुद को स्वतंत्र कारोबारी इकाई मानती थीं.

कारोबार में भी बदलाव की शुरुआत

Ratan Tata ने सिर्फ संगठनात्मक बदलाव नहीं किए, बल्कि Tata Steel और Tata Motors जैसे प्रमुख कारोबारों को प्रतिस्पर्धी बनाने पर भी ध्यान दिया. 1990 के दशक में भारतीय अर्थव्यवस्था तेजी से खुल रही थी और विदेशी कंपनियों से मुकाबला बढ़ रहा था.

उन्होंने टेक्नोलॉजी, नए उत्पादों और अंतरराष्ट्रीय साझेदारियों पर जोर दिया. Tata Motors को यात्री वाहन कारोबार में उतारने का फैसला भी इसी सोच का हिस्सा था. बाद में Indica जैसी कार ने कंपनी की पहचान बदलने में अहम भूमिका निभाई.

आज फिर क्यों याद आ रही है पुरानी कहानी?

Tata Sons के मौजूदा चेयरमैन N. Chandrasekaran के फरवरी 2027 में पद छोड़ने की घोषणा के बाद समूह में नेतृत्व को लेकर चर्चा फिर तेज हो गई है. Tata Trusts अब उनके उत्तराधिकारी की तलाश की प्रक्रिया शुरू कर चुका है.

ऐसे समय में Ratan Tata के शुरुआती दौर की ‘Bombay House battles’ इसलिए महत्वपूर्ण हो जाती हैं, क्योंकि उस समय भी सवाल यही था कि Tata Group की कमान कितनी केंद्रीकृत होनी चाहिए और अलग-अलग कंपनियों के प्रमुखों की कितनी स्वतंत्रता होनी चाहिए.

Ratan Tata ने इन चुनौतियों का जवाब संगठनात्मक बदलाव, मजबूत नियंत्रण और लंबी अवधि की रणनीति के जरिए दिया. उनके प्रयासों से Tata Group ज्यादा एकीकृत और आधुनिक कारोबारी समूह के रूप में उभरा. आज नेतृत्व परिवर्तन के नए दौर में वही पुरानी सीख फिर चर्चा में है—बड़े कारोबारी समूह को आगे बढ़ाने के लिए सिर्फ मजबूत कंपनियां ही नहीं, बल्कि मजबूत और स्पष्ट नेतृत्व भी जरूरी होता है.

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