सरकार के बाद अब SEBI ने भी LTCG पर दी हरी झंडी, क्या शेयर बाजार में भर-भरकर आएगा विदेशी पैसा?
LTCG Tax Latest News: SEBI ने सरकार को विदेशी निवेशकों पर लगने वाला लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन (LTCG) टैक्स खत्म करने का सुझाव दिया है. इसके साथ ही एक साल से ज्यादा पुरानी म्यूचुअल फंड यूनिट्स को बेचकर दूसरी स्कीम में निवेश करने पर टैक्स छूट देने का प्रस्ताव भी रखा है. हालांकि, इन सुझावों पर अंतिम फैसला सरकार को लेना है.

भारतीय शेयर बाजार में विदेशी निवेशकों की घटती दिलचस्पी को बढ़ाने के लिए मार्केट रेगुलेटर SEBI ने सरकार को एक अहम सुझाव दिया है. SEBI ने विदेशी निवेशकों पर लगने वाले लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन (LTCG) टैक्स को खत्म करने की सिफारिश की है. इसके साथ ही घरेलू म्यूचुअल फंड निवेशकों को भी टैक्स में राहत देने का प्रस्ताव रखा है. इसके तहत अगर निवेशक अपनी पुरानी म्यूचुअल फंड होल्डिंग बेचकर दूसरी स्कीम में पैसा लगाते हैं, तो उन्हें LTCG टैक्स से छूट देने का सुझाव दिया गया है.
मनी कंट्रोल की रिपोर्ट के मुताबिक, SEBI ने सरकार के सामने ये सुझाव रखे हैं. ये सिफारिशें फरवरी में आने वाले सालाना बजट से कुछ महीने पहले दी गई हैं. हालांकि, ये सुझाव बाध्यकारी नहीं हैं और इन पर अंतिम फैसला सरकार को लेना है.
विदेशी निवेशकों पर LTCG टैक्स खत्म करने की सिफारिश
SEBI ने विदेशी निवेशकों को भारतीय शेयर बाजार में निवेश के लिए प्रोत्साहित करने के मकसद से LTCG टैक्स हटाने का सुझाव दिया है. रिपोर्ट के मुताबिक, इन प्रस्तावों का मकसद विदेशी निवेशकों पर शुरुआती टैक्स बोझ कम करना है.
फिलहाल, एक साल से ज्यादा समय तक रखी गई सिक्योरिटीज की बिक्री पर 12.5 फीसदी लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन टैक्स लगता है. वहीं, एक साल या उससे कम समय तक रखी गई सिक्योरिटीज पर 20 फीसदी शॉर्ट टर्म कैपिटल गेन टैक्स देना होता है. इसके अलावा, शेयरों की खरीद-बिक्री पर सिक्योरिटीज ट्रांजैक्शन टैक्स (STT) और डिविडेंड पर विथहोल्डिंग टैक्स भी लगता है.
SEBI का कहना है कि भारत में शेयरों में निवेश से जुड़ी ट्रांजैक्शन लागत दुनिया के कई बाजारों के मुकाबले ज्यादा है. ब्रोकरेज फर्म Jefferies ने भी इस सप्ताह अपनी एक रिपोर्ट में कहा था कि कैपिटल गेन टैक्स में कटौती से विदेशी निवेशकों के लिए भारतीय बाजार ज्यादा आकर्षक हो सकता है और पोर्टफोलियो निवेश को बढ़ावा मिल सकता है. वहीं, ब्रोकरेज फर्म IIFL का अनुमान है कि कैपिटल गेन टैक्स खत्म होने से विदेशी निवेशकों का रिटर्न 2.3 प्रतिशत अंक तक बढ़ सकता है.
म्यूचुअल फंड निवेशकों को भी मिल सकती है टैक्स राहत
SEBI ने घरेलू म्यूचुअल फंड निवेशकों के लिए भी टैक्स राहत का सुझाव दिया है. इसके तहत अगर कोई निवेशक एक साल से ज्यादा समय तक रखी गई म्यूचुअल फंड यूनिट्स को बेचकर किसी दूसरी म्यूचुअल फंड स्कीम में निवेश करता है, तो इस स्विच को टैक्स के दायरे में आने वाली बिक्री नहीं माना जाना चाहिए.
इस प्रस्ताव का मकसद निवेशकों को घरेलू म्यूचुअल फंड में लंबे समय तक निवेश बनाए रखने के लिए प्रोत्साहित करना है. फिलहाल, एक म्यूचुअल फंड स्कीम से दूसरी स्कीम में स्विच करने पर इसे बिक्री माना जाता है और इस पर लागू नियमों के मुताबिक कैपिटल गेन टैक्स देना पड़ सकता है. भारतीय म्यूचुअल फंड इंडस्ट्री के पास कुल 82.6 लाख करोड़ रुपये की संपत्ति प्रबंधन के तहत है. वहीं, मंथली इन्वेस्टमेंट स्कीम के जरिए हर महीने औसतन 3,000 करोड़ रुपये का निवेश आ रहा है.
विदेशी निवेशकों ने इस साल भारतीय शेयरों से निकाले 31 अरब डॉलर
पिछले दो साल में भारतीय शेयर बाजार का प्रदर्शन उभरते बाजारों के मुकाबले कमजोर रहा है. इसी वजह से विदेशी निवेशकों की बिकवाली बढ़ी है. सूत्रों के मुताबिक, इस साल विदेशी निवेशकों ने भारतीय शेयरों से रिकॉर्ड 31 अरब डॉलर निकाले हैं. दूसरी तरफ, खुदरा निवेशकों का विदेशों में निवेश बढ़ा है, क्योंकि भारतीय बाजार में रिटर्न कमजोर रहे हैं.
SEBI ने पिछले दो साल में विदेशी निवेशकों के साथ कई बैठकें की हैं. इन बैठकों में निवेशकों की ओर से बार-बार भारत की टैक्स व्यवस्था में बदलाव की जरूरत बताई गई. विदेशी निवेशकों की लगातार बिकवाली से भारतीय रुपये पर भी दबाव पड़ा है.
दो साल में Nifty 50 में 4.8% की गिरावट
भारतीय बाजार के कमजोर प्रदर्शन का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि पिछले दो साल में Nifty 50 में 4.8% की गिरावट आई है. वहीं, इसी अवधि में MSCI Emerging Markets Index 40% चढ़ा है. घरेलू इक्विटी म्यूचुअल फंड का रिटर्न भी इस दौरान कमजोर रहा है. फंड रिसर्च फर्म Morningstar के आंकड़ों के मुताबिक, लार्ज-कैप शेयरों में निवेश करने वाले फंडों का औसत रिटर्न 1.6 फीसदी गिरा है.
ऐसे में SEBI के इन सुझावों को भारतीय शेयर बाजार में निवेश बढ़ाने और घरेलू निवेशकों को म्यूचुअल फंड में लंबे समय तक बनाए रखने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है. हालांकि, इन प्रस्तावों पर सरकार का अंतिम फैसला आने के बाद ही यह साफ होगा कि निवेशकों को वास्तव में कितनी राहत मिलेगी.
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