ICICI Prudential MF लाया ये नया फंड, 12 अक्टूबर तक है निवेश का मौका
अमेरिका में, S&P 500 इंडेक्स में टॉप 10 कंपनियों की हिस्सेदारी 38 फीसदी है, जबकि 2016 में यह केवल 19 फीसदी थी. ऐसा कुछ चुनिंदा कंपनियों के दबदबे और एआई को लेकर भारी उत्साह के कारण है.

देश की सबसे बड़ी म्यूचुअल फंड कंपनियों में से एक ICICI Prudential म्यूचुअल फंड ने एक नए फंड को लॉन्च कर दिया है. इसका मकसद उन स्टॉक्स और कंपनियों की पहचान करना है जिनकी अभी मार्केट में वैल्यू कम है, लेकिन भविष्य में उनमें सुधार की गुंजाइश है. मार्केट की भाषा में इसे कॉन्ट्रेरियन इन्वेस्टिंग कहते हैं. कॉन्ट्रेरियन इन्वेस्टिंग क्या है और यह किस तरह से काम करता है? आइए जानते हैं.
ये ओपन एंडेड इक्विटी स्कीम है जो कॉन्ट्रेरियन इन्वेस्टमेंट स्ट्रेटेजी का इस्तेमाल करती है. कॉन्ट्रेरियन इन्वेस्टिंग इस आइडिया पर बेस्ड है कि मार्केट अक्सर एसेट्स की गलत कीमत को तय करते हैं और गलत कीमत का तय करना हर एसेट क्लास की एक आम बात है. जानकारी के लिए बता दें कि इस फंड में अगले महीने 12 अक्टूबर 2026 तक इन्वेस्ट किया जा सकता है.
सही समय की कैसे करें पहचान?
ये स्कीम ऐसे मौकों को पहचानने के लिए बिना सहमति और रिसर्च पर बेस्ड तरीका अपनाती है. यह उन इन्वेस्टर्स को टारगेट करती है जिनका इन्वेस्टमेंट का समय लंबे समय का होता है और जो मार्केट के सेंटिमेंट या माहौल के बदलने का इंतजार करने को तैयार होते हैं. इस स्कीम को धर्मेश कक्कड़, संकरन नरेन, गौरव चिकने और सशक्त गोयल मिलकर मैनेज करेंगे.
ICICI Prudential म्यूचुअल फंड के CIO और ED संकरन नरेन का कहना है कि कॉन्ट्रेरियन इन्वेस्टिंग का अर्थ केवल सस्ती चीजें खरीदना नहीं है. इसके लिए लंबे समय का नजरिया और अच्छी रिसर्च चाहिए. कॉन्ट्रेरियन इन्वेस्टिंग की खास बात यह है कि इसे तब खरीदा जाता है जब स्टॉक की डिमांड कम हो, जब खरीदने वालों से ज्यादा बेचने वाले होते हैं और इसलिए कीमत काफी गिर गई होती है.
उनके अनुसार, यह स्कीम अलग-अलग मार्केट कैपिटलाइज़ेशन में इन्वेस्ट करने की फ्लेक्सिबिलिटी देती है, लेकिन हमारा मेन फोकस उन स्टॉक्स को पहचानने पर होगा जिन्होंने अंडरपरफॉर्म किया है. गौर करने वाली बात यह है कि रिसर्च के जरिए सही इन्वेस्टमेंट की पहचान की जाए और इंतजार करने का सब्र रखें, क्योंकि उलटी पोजीशन जल्दी नहीं बदलती है.
कॉन्ट्रा स्ट्रैटेजी के काम का तरीका
इस स्ट्रैटेजी के पीछे का आइडिया यह है कि मार्केट हमेशा किसी कंपनी या एसेट की सही वैल्यू नहीं तय करता है. कभी-कभी, खराब सेंटीमेंट, डर या किसी टेम्पररी प्रॉब्लम की वजह से, अच्छी कंपनियों के शेयर भी काफी गिर सकते हैं.
क्या सोचता है कॉन्ट्रेरियन इन्वेस्टर?
- क्या स्टॉक बहुत ज्यादा गिर गया है?
- क्या कंपनी के फंडामेंटल्स मजबूत है?
- क्या समस्या टेम्पररी है या परमानेंट?
- क्या भविष्य में कमाई बेहतर हो सकती है?
- अगर मार्केट का आउटलुक बदलता है तो स्टॉक में कितनी बढ़त हो सकती है?
इन्वेस्टिंग कैसे की जाती है?
इन्वेस्टमेंट शुरू करते समय, टीम आम सहमति से बचते हुए, सोच-समझकर काम कर सकती है. यह उन कंपनियों को ढूंढती है जिनका डेट-टू-इक्विटी रेशियो अच्छा हो, इंस्टीट्यूशनल होल्डिंग्स पर नजर रखती है और ऐसे मौके ढूंढती है जहां सेंटिमेंट कमजोर हो लेकिन नॉर्मल कमाई में बढ़ने की संभावना हो. इसके अलावा, यह उन सेक्टर्स को ध्यान से देखता है जिनमें बड़े बदलाव या उतार-चढ़ाव आए हैं. एक बार जब कॉन्ट्रेरियन मिसप्राइसिंग खत्म हो जाती है, सेंटिमेंट बदल जाता है या कोई बेहतर स्टॉक मिल जाता है तो उससे निकला जा सकता है.
मार्केट के हर कोने में गलत प्राइसिंग होती है, जिससे उलटे मौके बनते हैं. यह कन्फ्यूजन कई चुनौतियों से और बढ़ जाता है, जिसमें ग्लोबल ग्रोथ की चिंताएं, वेस्ट एशिया में तनाव, फॉरेन इंस्टीट्यूशनल इन्वेस्टर (FII) का पैसा निकालना, सेक्टर में बड़े बदलाव, सेंट्रल बैंक की मॉनेटरी पॉलिसी, साइक्लिकल रिसेशन, बहुत ज्यादा कर्ज में डूबी कंपनियां, वैल्यूएशन और कमाई, और गिरता रुपया शामिल हैं.
भारत और यूएस के बीच इन्वेस्टमेंट पैटर्न में अंतर
उदाहरण के नजरिए से समझते हैं, यूएस में S&P 500 इंडेक्स की टॉप 10 कंपनियों का अब मार्केट में 38 फीसगी हिस्सा है, जबकि 2016 में यह 19 फीसदी था. ऐसा इसलिए है क्योंकि कुछ चुनिंदा कंपनियों का दबदबा और AI के लिए जबरदस्त उत्साह वैल्यूएशन को ऐतिहासिक ऊंचाई पर ले जा रहा है. इसके उलट, भारत का मार्केट शेयर बड़ा है, लेकिन अलग-अलग सेक्टर से रिटर्न मिला-जुला और एक जैसा नहीं है. यह अंतर भारत में उलटे मौकों को दिखाता है.
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