Engineering Exports: ट्रंप टैरिफ भी नहीं रोक पाया भारत की रफ्तार, 15.5% बढ़ा अमेरिका को निर्यात

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के टैरिफ दबाव के बावजूद भारत के इंजीनियरिंग सामान के निर्यात में तेजी आई है. अप्रैल से अगस्त के दौरान अमेरिका को निर्यात 15.5 फीसदी बढ़कर 9.97 अरब डॉलर पहुंच गया. अगस्त में इसमें 31 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई. भारत के कुल निर्यात में इंजीनियरिंग सामान की हिस्सेदारी 27 से 28 फीसदी है.

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के टैरिफ दबाव के बावजूद भारत के इंजीनियरिंग सामान के निर्यात में तेजी आई है. Image Credit: money9

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के टैरिफ दबाव के बावजूद भारत के इंजीनियरिंग सामान के निर्यात में तेजी देखने को मिली है. पिछले साल अमेरिका की ओर से लगाए गए 50 फीसदी अतिरिक्त टैरिफ के कारण भारतीय इंजीनियरिंग उत्पादों के निर्यात में गिरावट आई थी, लेकिन इसके बाद कारोबार ने तेजी से वापसी की. अप्रैल से अगस्त के दौरान अमेरिका को इंजीनियरिंग सामान का निर्यात 15.5 फीसदी बढ़कर 9.97 अरब डॉलर पहुंच गया. अगस्त में तो निर्यात में 31 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई. यह प्रदर्शन इसलिए अहम है क्योंकि टैरिफ लागू होने से पहले की तुलना में भी निर्यात की रफ्तार मजबूत रही.

भारत के कुल निर्यात में इंजीनियरिंग सामान की बड़ी हिस्सेदारी

भारत के कुल निर्यात में इंजीनियरिंग सामान की हिस्सेदारी करीब 27 से 28 फीसदी है. वहीं, मैन्युफैक्चरिंग गुड्स के निर्यात में इसका योगदान लगभग 40 फीसदी है. इस कैटेगरी में स्टील और धातु उत्पाद, मशीनरी, वाहन, ऑटो पार्ट्स, डिफेंस इक्विपमेंट और विमान के पुर्जे शामिल हैं.

50 फीसदी टैरिफ के बाद भी अमेरिका से बढ़ी मांग

अमेरिका ने स्टील और एल्युमीनियम से जुड़े कुछ उत्पादों पर भी 50 फीसदी टैरिफ लगाया था. इसके बावजूद भारतीय निर्यातकों का कहना है कि अमेरिकी खरीदारों के लिए सप्लायर बदलना आसान नहीं है. खासकर उन कंपनियों के मामले में, जो पहले से अमेरिकी कंपनियों की सप्लाई चेन का हिस्सा हैं.

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सप्लाई चेन और लॉजिस्टिक्स ने निभाई अहम भूमिका

इंजीनियरिंग सामान के निर्यात में तेजी बनाए रखने के पीछे मौजूदा सप्लाई चेन भी अहम रही. निर्यातकों के मुताबिक, नए सप्लायर के साथ काम शुरू करने में समय और खर्च लगता है. इसके लिए लॉजिस्टिक्स और सप्लाई व्यवस्था को दोबारा तैयार करना पड़ता है. इसलिए अमेरिकी कंपनियां तुरंत पुराने सप्लायर को बदलने से बचती हैं.