CD vs CP: बैंकों में पैसों की कमी, क्या बढ़ेगा आपके लोन का बोझ?
भारत के बैंकिंग सिस्टम में हाल के महीनों में लोन-टू-डिपॉजिट रेशियो (LDR) ऊंचे स्तर पर पहुंचा है. आसान भाषा में समझें तो बैंक जितना पैसा जमा कर रहे हैं, उससे ज्यादा कर्ज दे चुके हैं. यही वजह है कि बैंकों को अतिरिक्त फंड जुटाने के लिए Certificates of Deposit (CDs) का सहारा लेना पड़ रहा है.
CD vs CP का खेल क्या है?
CD बैंक जारी करते हैं, जबकि Commercial Paper (CP) कंपनियां जारी करती हैं. जब बैंक ज्यादा CD जारी करते हैं और उन पर आकर्षक ब्याज देते हैं, तो निवेशकों का झुकाव CD की तरफ बढ़ता है. इसका सीधा असर CP की मांग पर पड़ सकता है, जिससे कंपनियों के लिए उधारी महंगी हो सकती है.
आप पर क्या असर?
अगर बैंकों की फंडिंग कॉस्ट बढ़ती है, तो वे लोन की ब्याज दरें बढ़ा सकते हैं. इसका मतलब होम लोन, कार लोन और बिजनेस लोन महंगे होने का जोखिम बढ़ सकता है. हालांकि, असर तुरंत नहीं दिखता, लेकिन ट्रेंड जारी रहा तो EMI पर दबाव संभव है. डिपॉजिट ग्रोथ धीमी और क्रेडिट डिमांड मजबूत रहने से बैंकिंग सिस्टम में लिक्विडिटी का दबाव बन सकता है. इससे आर्थिक खपत और निवेश की गति पर भी असर पड़ सकता है.