सोना-चांदी के बाद अब कॉपर की बारी! 25 साल का इतिहास दे रहा बड़ा संकेत, AI-EV बूम देगा रिकॉर्ड ट्रिगर
सोना और चांदी के बाद अब कमोडिटी मार्केट का अगला बड़ा सुपरस्टार ‘कॉपर’ बनता दिख रहा है. AI, डेटा सेंटर, इलेक्ट्रिक व्हीकल्स और ग्लोबल इलेक्ट्रिफिकेशन की बढ़ती मांग के बीच कॉपर की कीमतें रिकॉर्ड हाई पर पहुंच गई हैं, जबकि सप्लाई लगातार दबाव में है.

Copper prices rally: कमोडिटी मार्केट में अब हवा का रुख बदल रहा है और पुराना इतिहास खुद को दोहराने के लिए तैयार है. साल 2025 पूरी तरह से कीमती मेटल के नाम रहा, जहां सोने ने 60% से अधिक और चांदी ने 148% का धमाकेदार रिटर्न देकर निवेशकों को मालामाल कर दिया.
HDFC Securities की रिपोर्ट के मुताबिक, इस दौरान कॉपर (तांबा) भी 40% बढ़ा, लेकिन सोने और चांदी की तुलना में यह अभी भी कई दशकों के निचले स्तर पर ट्रेड कर रहा है. कमोडिटी सुपरसाइकिल का अगला बड़ा दांव अब इसी अंतर को पाटने पर लगा है. आसान शब्दों में कहें, तो अब सोना-चांदी नहीं, बल्कि ‘कॉपर’ निवेशकों की किस्मत बदलने आ रहा है. आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), डेटा सेंटर्स, इलेक्ट्रिक व्हीकल्स (EVs) और ग्लोबल इलेक्ट्रिफिकेशन का काम बिना कॉपर के मुमकिन ही नहीं है, जबकि इसकी सप्लाई लगातार घट रही है.
रिकॉर्ड हाई पर कॉपर, क्या कहते हैं ताजा आंकड़े?
ग्लोबल मार्केट में कॉपर की मांग और सप्लाई के बीच का अंतर इतना बढ़ चुका है कि इसकी कीमतें आसमान छू रही हैं.
- रिकॉर्ड स्तर: साल 2026 की पहली तिमाही (1QCY26) में कॉपर ने ~$14,800 प्रति टन का अपना नया ऑल-टाइम हाई बनाया है, हालांकि रिपोर्ट में दावा है कि कीमतें इससे भी ऊपर जाएंगी.
- मौजूदा भाव: फिलहाल अंतरराष्ट्रीय बाजार में कॉपर $13,500 प्रति टन के आसपास ट्रेड कर रहा है.
- इतिहास से तुलना: इस समय अमेरिकी इक्विटी (S&P 500) के मुकाबले कमोडिटी इंडेक्स (S&P GSCI) 25 साल के निचले स्तर पर है. इसका लॉन्ग-टर्म औसत 25% का है, जो आज सिमटकर महज 11% रह गया है. इतिहास गवाह है कि जब भी यह अनुपात इस स्तर पर आया है, कमोडिटी ने इक्विटी बाजार को पछाड़कर मल्टी-ईयर रिटर्न दिया है.
वो 3 बड़े कारण, जो कॉपर को बनाएंगे ‘सुपरस्टार’
कच्चे तेल या अन्य कमोडिटीज की तरह कॉपर की मांग को टाला नहीं जा सकता. इसके पीछे तीन बेहद मजबूत और लॉन्ग-टर्म फैक्टर्स काम कर रहे हैं:
- एआई और डेटा सेंटर्स की मजबूरी: आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के विस्तार और नए डेटा सेंटर्स के निर्माण में भारी मात्रा में बिजली और इंफ्रास्ट्रक्चर की जरूरत होती है, जिसके लिए कॉपर अनिवार्य है.
- सप्लाई का भयंकर संकट: पिछले एक दशक में माइनिंग कंपनियों ने नए प्रोजेक्ट्स में निवेश (Capex) 40% तक घटा दिया है. साल 2015 के बाद से दुनिया में कॉपर की कोई बड़ी (Tier-1) खोज नहीं हुई है, ऊपर से चिली जैसे बड़े देशों में कॉपर का उत्पादन लगातार गिर रहा है. किसी भी नई खदान को शुरू होने में 5 से 7 साल का समय लगता है.
- डी-डॉलरलाइजेशन और कमजोर डॉलर: दुनिया भर के केंद्रीय बैंक अमेरिकी ट्रेजरी से अपना पैसा निकालकर सोने और अन्य हार्ड एसेट्स में लगा रहे हैं. डॉलर इंडेक्स (DXY) के कमजोर होने से डॉलर-डिनॉमिनेटेड कमोडिटीज, विशेषकर कॉपर को सीधा फायदा मिल रहा है.
महंगाई और अमेरिकी कर्ज का सपोर्ट
ग्लोबल मैक्रोइकॉनॉमिक्स भी इस समय कॉपर जैसी हार्ड एसेट्स के पक्ष में खड़ी दिख रही है. रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिकी फेडरल कर्ज इस समय वहां की जीडीपी के 120% से अधिक हो चुका है. कर्ज पर ब्याज चुकाना अमेरिकी बजट का सबसे बड़ा खर्च बन गया है. इस तरह के वित्तीय दबाव और लगातार बनी रहने वाली महंगाई (Higher-for-longer Inflation) के दौर में निवेशक कागजी करेंसी के बजाय कॉपर जैसे ठोस और गैर-विवादास्पद कमोडिटी एसेट्स को लॉन्ग-टर्म पोर्टफोलियो में जगह दे रहे हैं.
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भारतीय निवेशकों के पास क्या है रास्ता?
भारत में फिलहाल रिटेल निवेशकों के लिए सीधे कॉपर के डेडिकेटेड ईटीएफ (ETF) उपलब्ध नहीं हैं. लेकिन अगर आप इस सुपरसाइकिल का फायदा उठाना चाहते हैं, तो एक्सपर्ट्स के मुताबिक ये तीन लीगल रास्ते सबसे बेहतर हैं:
- MCX फ्यूचर्स: कमोडिटी मार्केट की समझ रखने वाले ट्रेडर सीधे मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज (MCX) पर कॉपर फ्यूचर्स के जरिए दांव लगा सकते हैं.
- निफ्टी मेटल इंडेक्स: शेयर बाजार के निवेशक इक्विटी रूट के जरिए ‘Nifty Metal’ बास्केट या कॉपर से जुड़ी कंपनियों के स्टॉक्स में एलोकेशन बढ़ा सकते हैं.
- ग्लोबल कॉपर ईटीएफ: बड़े और अल्ट्रा हाई नेटवर्थ (UHNI) निवेशक आरबीआई की ‘लिबरलाइज्ड रेमिटेंस स्कीम’ (LRS) रूट का इस्तेमाल करके सीधे ग्लोबल कॉपर ईटीएफ में निवेश कर सकते हैं.