ड्रग्स, दबदबा और चीन के वर्चस्व का खेल! वेनेजुएला के बाद क्यूबा और कोलंबिया को आंखें क्यों तरेर रहा अमेरिका

लैटिन अमेरिका में हालिया घटनाक्रम ने एक बार फिर महाशक्तियों की राजनीति को केंद्र में ला दिया है. इतिहास, सुरक्षा, ड्रग तस्करी और वैश्विक ध्रुवीकरण के बीच कुछ देशों पर बढ़ता दबाव कई बड़े संकेत देता है. सवाल यह है कि यह सिर्फ चेतावनी है या आने वाले बदलावों की आहट.

Donald Trump Image Credit: whitehouse IG

US-Latin America business: लैटिन अमेरिका एक बार फिर उस मोड़ पर खड़ा दिख रहा है, जहां इतिहास, भू-राजनीति और महाशक्ति की महत्वाकांक्षाएं आपस में टकराती हैं. वेनेजुएला में अमेरिकी सैन्य कार्रवाई और राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को बंधक बनाए जाने की खबर ने पूरे क्षेत्र में बेचैनी फैला दी है. यह महज एक देश के खिलाफ उठाया गया कदम नहीं था, बल्कि एक ऐसा राजनीतिक संकेत था, जिसे हवाना से लेकर बोगोटा और मेक्सिको सिटी तक गंभीरता से पढ़ा जा रहा है.

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस कार्रवाई को न सिर्फ सही ठहराया है, बल्कि इसके बहाने क्यूबा, कोलंबिया और मैक्सिको की सरकारों को भी खुला और सख्त संदेश दे दिया है. अमेरिका ने वेनेजुएला में दखल क्यों दिया, इस सवाल के तुरंत बाद सवाल उठता है कि उसकी आंखें क्यूबा और कोलंबिया पर क्यों टिक गई हैं?

US और लैटिन अमेरिका, रिश्तों की पुरानी गांठ

अमेरिका और लैटिन अमेरिका के रिश्ते कभी सहज नहीं रहे. भौगोलिक निकटता के बावजूद दोनों के बीच भरोसे की डोर हमेशा कमजोर रही है. वैचारिक मतभेद, सत्ता की असमानता, इमिग्रेशन, ड्रग्स तस्करी और सुरक्षा जैसे मुद्दों ने इन संबंधों को जटिल बनाए रखा. अमेरिका का रवैया अक्सर ‘बिग ब्रदर’ जैसा रहा है, जिसमें पड़ोसी देशों की संप्रभुता से ज्यादा अपने हितों को प्राथमिकता दी गई. यही कारण है कि हर नई अमेरिकी कार्रवाई को लैटिन अमेरिका केवल वर्तमान घटना के तौर पर नहीं, बल्कि लंबे इतिहास की कड़ी के रूप में देखता है.

लैटिन अमेरिका मैप, सोर्स- worldatlas

इस इतिहास में 1898 का स्पैनिश-अमेरिकन युद्ध एक अहम मोड़ था, जब क्यूबा को स्पेन से ‘आजाद’ कराने के नाम पर अमेरिका ने वहां गहरी दखलअंदाजी की. सैन्य ठिकाने बने, अर्थव्यवस्था पर नियंत्रण हुआ और क्यूबा की संप्रभुता नाम भर की बची रह गई. इसके कुछ साल बाद 1903 में पनामा कैनाल का प्रकरण सामने आया, जब कोलंबिया से अलग कर पनामा को नया देश बना दिया गया और नहर पर अमेरिकी कब्जा स्थापित हुआ. ये घटनाएं आज भी लैटिन अमेरिका की सामूहिक स्मृति में अमेरिकी हस्तक्षेप के प्रतीक के तौर पर मौजूद हैं.

विचारधारा, सत्ता और आर्थिक प्रतिबंध

वेनेजुएला की मौजूदा घटना इसी ऐतिहासिक सिलसिले की नई कड़ी के रूप में देखी जा रही है. ट्रंप प्रशासन के लिए मादुरो सरकार सिर्फ एक तानाशाही शासन नहीं, बल्कि ऐसा राजनीतिक केंद्र है जो अमेरिका विरोधी धुरी का हिस्सा बन चुका है. क्यूबा और रूस के साथ वेनेजुएला के करीबी रिश्ते वाशिंगटन को लंबे समय से खटकते रहे हैं. ऐसे में वेनेजुएला पर कार्रवाई कर अमेरिका ने यह स्पष्ट कर दिया कि वह अपने प्रभाव क्षेत्र में किसी भी वैकल्पिक शक्ति-संतुलन को स्वीकार करने के मूड में नहीं है.

यहीं से क्यूबा की भूमिका सामने आती है. शीत युद्ध के दौर से लेकर आज तक क्यूबा अमेरिका के लिए एक वैचारिक चुनौती बना रहा है. छह दशक से अधिक समय से चले आ रहे आर्थिक प्रतिबंधों ने क्यूबा की अर्थव्यवस्था को कमजोर जरूर किया, लेकिन राजनीतिक रूप से वह अमेरिका के आगे झुका नहीं. ट्रंप ने हालिया बयानों में क्यूबा को ‘असफल देश’ बताते हुए वहां की बदहाली के लिए सीधे तौर पर सरकार को जिम्मेदार ठहराया. ट्रंप का यह बयान मानवीय चिंता से ज्यादा राजनीतिक रणनीति का हिस्सा लगता है.

अमेरिकी प्रशासन का आरोप है कि क्यूबा वेनेजुएला की मादुरो सरकार को न सिर्फ वैचारिक समर्थन देता है, बल्कि उसकी खुफिया और सुरक्षा मशीनरी में भी गहरी पैठ रखता है.

रूस-चीन की एंट्री से आर्थिक चुनौती

रूस और चीन के साथ क्यूबा और वेनेजुएला के बढ़ते संबंध अमेरिका के लिए अतिरिक्त चिंता का कारण बन गए हैं. यूक्रेन युद्ध के बाद रूस पर लगे प्रतिबंधों के बीच मॉस्को ने हवाना के साथ रिश्ते और मजबूत किए हैं. चीन भी निवेश, बंदरगाहों और रणनीतिक समझौतों के जरिए कैरिबियन और लैटिन अमेरिका में अपनी मौजूदगी बढ़ा रहा है. यह सब अमेरिका को अपने तट के बेहद करीब एक नई भू-राजनीतिक और आर्थिक चुनौती के रूप में दिखाई देता है.

गुस्तावो पेट्रो और नीति में बदलाव से शुरू हुआ टकराव

कोलंबिया का मामला इससे अलग लेकिन उतना ही संवेदनशील है. दशकों तक कोलंबिया अमेरिका का भरोसेमंद साझेदार रहा है, खासकर ड्रग तस्करी के खिलाफ लड़ाई में. 2000 के दशक में अमेरिका ने कोलंबिया को भारी सैन्य और आर्थिक मदद दी, ताकि कोकीन उत्पादन और सशस्त्र नार्को समूहों पर लगाम लगाई जा सके. इस सहयोग ने दोनों देशों को करीब जरूर लाया, लेकिन इससे कोलंबिया की आंतरिक राजनीति और सामाजिक संरचना में नई जटिलताएं भी पैदा हुईं.

राष्ट्रपति गुस्तावो पेट्रो के सत्ता में आने के बाद यह समीकरण बदलने लगा. वाम झुकाव वाले नेता के तौर पर पेट्रो ने ‘टोटल पीस’ (Total Peace) जैसी नीतियों के जरिए संघर्षरत समूहों से बातचीत का रास्ता अपनाया.

अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप और राष्ट्रपति गुस्तावो पेट्रो

उनका तर्क था कि केवल सैन्य कार्रवाई से समस्या का समाधान नहीं होगा, जब तक किसानों को कोका की खेती के विकल्प और सम्मानजनक जीवन नहीं मिलेगा. कुछ इलाकों में हिंसा कम हुई, लेकिन आलोचकों का कहना है कि इससे नार्को नेटवर्कों को फिर से संगठित होने का मौका मिला और कोकीन उत्पादन में बढ़ोतरी हुई.

ट्रंप का सीधा हमला और जवाबी दलील

ट्रंप प्रशासन ने इसी बिंदु को आधार बनाकर पेट्रो पर सीधा हमला बोला. शनिवार को हुए प्रेस कॉन्फ्रेस में अमेरिकी राष्ट्रपति ने कोलंबिया में ‘कोकीन फैक्ट्रियों’ के चलने और वहां से ड्रग्स के अमेरिका पहुंचने का आरोप लगाया. उन्होंने पेट्रो को सख्त और अपमानजनक चेतावनी दी कि उन्हें “अपना ध्यान रखना चाहिए.”

अमेरिका का दावा है कि पेट्रो की नीतियां अव्यावहारिक रहीं और उन्होंने नार्को नेटवर्कों पर प्रभावी नियंत्रण नहीं रखा. हालांकि पेट्रो सरकार ट्रंप के दावों को ठुकराते हुए कहती है कि उनके कार्यकाल में ड्रग्स जब्ती रिकॉर्ड स्तर पर रही है.

मैक्सिको को भी संदेश

इस टकराव में मैक्सिको को भी अलग नहीं रखा गया. ट्रंप ने साफ कहा कि भले ही मैक्सिको की राष्ट्रपति अच्छी हों, लेकिन देश को ड्रग्स कार्टेल चला रहे हैं. यह बयान दिखाता है कि ट्रंप पूरे क्षेत्र में ड्रग्स के मुद्दे को सुरक्षा संकट के तौर पर देखते हैं और जरूरत पड़ने पर सैन्य विकल्प खुले रखना चाहते हैं.

‘बिग ब्रदर’ बने रहने की जिद

इन तमाम घटनाओं को जोड़कर देखें तो तस्वीर साफ होती है. वेनेजुएला पर हमला किसी एक सरकार को सबक सिखाने की कार्रवाई नहीं थी, बल्कि लैटिन अमेरिका में अमेरिकी दबदबे को फिर से मजबूत करने की कोशिश थी. क्यूबा, कोलंबिया और मैक्सिको को दिए गए सख्त संदेश बताते हैं कि अमेरिका अपने प्रभाव क्षेत्र में रूस और चीन की बढ़ती मौजूदगी, वामपंथी सरकारों के उभार और ड्रग तस्करी जैसे मुद्दों को एक साथ जोड़कर देख रहा है.

आज लैटिन अमेरिका एक बार फिर महाशक्तियों की राजनीति का मैदान बनता दिख रहा है. अगर अमेरिका अपनी पुरानी ‘दखलकारी’ नीति से हटकर बराबरी और सहयोग का रास्ता नहीं चुनता, तो यह तनाव और गहराएगा.

Loading...
Unable to load recommendations.