होर्मुज संकट से 145 देशों में पेट्रोल महंगा, 95 फीसदी घटी जहाजों की आवाजाही; आधा हो गया तेल का एक्सपोर्ट
Strait of Hormuz crisis: होर्मुज जलडमरूमध्य वैश्विक सप्लाई चेन के सबसे बड़े संकट के केंद्र में बदल गया है. इसका असर सिर्फ कच्चे तेल पर नहीं, बल्कि रिफाइंड पेट्रोलियम उत्पादों, एलपीजी, खाद और कंटेनर कारोबार पर भी पड़ रहा है.

दुनिया की ऊर्जा आपूर्ति का सबसे अहम समुद्री रास्ता होर्मुज स्ट्रेट अब सिर्फ एक समुद्री रास्ता भर नहीं रहा, बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए बड़ा जोखिम बन गया है. ईरान, अमेरिका और इजरायल युद्ध के छह महीने बाद इस रास्ते से जहाजों की आवाजाही करीब 95 फीसदी तक घट गई है. इसका सीधा असर खाड़ी देशों से होने वाले कच्चे तेल के निर्यात पर पड़ा है और अगस्त 2026 में यहां से रोजाना करीब 90 लाख बैरल कच्चा तेल ही निकल पा रहा है, जबकि 2025 में यह आंकड़ा लगभग 1.7 करोड़ बैरल प्रतिदिन था. यानी वैश्विक तेल बाजार के लिए सप्लाई का बड़ा हिस्सा अचानक संकट में आ गया है.
145 देशों में पेट्रोल महंगा
होर्मुज जलडमरूमध्य वैश्विक सप्लाई चेन के सबसे बड़े संकट के केंद्र में बदल गया है. अल जजीरा की रिपोर्ट के अनुसार, युद्ध से पहले इस समुद्री रास्ते से रोजाना 100 से ज्यादा जहाज गुजरते थे, लेकिन अब इनकी संख्या घटकर सिर्फ पांच रह गई है. जहाजों की आवाजाही में लगभग 95% की गिरावट आई है. इसका असर सिर्फ कच्चे तेल पर नहीं, बल्कि रिफाइंड पेट्रोलियम उत्पादों, एलपीजी, खाद और कंटेनर कारोबार पर भी पड़ रहा है.
कच्चे तेल का निर्यात करीब आधा
होर्मुज संकट का सबसे बड़ा असर खाड़ी देशों के कच्चे तेल निर्यात पर पड़ा है. साल 2025 में खाड़ी देशों से होर्मुज के रास्ते करीब 1.7 करोड़ बैरल कच्चा तेल रोजाना एक्सपोर्ट होता था. अगस्त 2026 में यह घटकर करीब 90 लाख बैरल प्रतिदिन रह गया है. यानी सप्लाई लगभग आधी हो गई है.
जानकारों का कहना है कि रोजाना करीब 50-70 लाख बैरल तेल की सप्लाई बाधित हो रही है. वहीं, होर्मुज से सीधे निकलने वाला कच्चा तेल घटकर महज 22 लाख बैरल प्रतिदिन रह गया है. अगर यह स्थिति लंबे समय तक बनी रहती है तो अगले छह महीनों तक वैश्विक तेल बाजार में अस्थिरता का खतरा बना रह सकता है.
दुनिया के तेल और गैस कारोबार के लिए होर्मुज क्यों अहम?
युद्ध से पहले दुनिया के करीब 38 फीसदी कच्चे तेल, 29% एलपीजी और 19% एलएनजी की आवाजाही होर्मुज के रास्ते होती थी. इसलिए इस समुद्री मार्ग में किसी भी तरह की रुकावट का असर सीधे पेट्रोल-डीजल, रसोई गैस, बिजली, माल ढुलाई और रोजमर्रा की वस्तुओं की कीमतों पर पड़ता है.
28 फरवरी के हमलों के बाद अब तक 145 देशों में पेट्रोल महंगा हो चुका है. सबसे ज्यादा कीमतों में बढ़ोतरी म्यांमार और भूटान में दर्ज की गई है. कच्चे तेल की कीमत भी युद्ध से पहले के मुकाबले करीब 20 फीसदी अधिक बताई गई है.
किन देशों में पेट्रोल सबसे ज्यादा महंगा हुआ?
| देश | 23 फरवरी की कीमत | मौजूदा कीमत | बढ़ोतरी |
|---|---|---|---|
| म्यांमार | 73.73 | 114.65 | 55.50% |
| भूटान | 63.62 | 98.62 | 55.02% |
| क्यूबा | 123.52 | 185.99 | 50.58% |
| गिनी | 60.47 | 90.61 | 49.84% |
| मॉरिटानिया | 56.66 | 83.93 | 48.15% |
खाड़ी के बंदरगाहों पर भी संकट
होर्मुज संकट का असर खाड़ी के बंदरगाहों पर भी दिखाई दे रहा है. प्रमुख कंटेनर पोर्ट्स पर जहाजों की रोजाना औसत आवाजाही 7.11 से घटकर 1.03 रह गई है. यानी करीब 85% की गिरावट आई है.
यूएई और कतर में पोर्ट ट्रैफिक करीब 68%, इराक में 67% और बहरीन में 66% तक घटा है. ईरान में भी गिरावट करीब 52% रही. इसके मुकाबले सऊदी अरब में गिरावट सिर्फ 15.3% रही. सऊदी के पूर्व-पश्चिम पाइपलाइन और लाल सागर के बंदरगाहों ने वैकल्पिक निर्यात मार्ग उपलब्ध कराने में मदद की है.
असर सिर्फ कच्चे तेल तक सीमित नहीं
होर्मुज से युद्ध से पहले दुनिया के करीब 19% रिफाइंड तेल उत्पाद और 13% खाद कारोबार गुजरता था. इसके अलावा वैश्विक कंटेनर माल का लगभग 3%, जबकि कोयला, अनाज और लौह अयस्क जैसे थोक माल का करीब 2% भी इसी रास्ते से गुजरता था.
अब होर्मुज में जहाजों की आवाजाही युद्ध-पूर्व स्तर के मुकाबले करीब 95% कम है. इसलिए संकट का असर पेट्रोल और डीजल से आगे बढ़कर खाद्य पदार्थों, उर्वरक, औद्योगिक कच्चे माल और वैश्विक माल ढुलाई की लागत पर भी पड़ सकता है.
भारत पर भी पड़ेगा सीधा असर
भारत के लिए होर्मुज संकट इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि देश की ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयातित तेल और गैस से पूरा होता है. पिछले साल भारत ने करीब 2.2 करोड़ टन एलपीजी आयात की थी, जिसमें लगभग 90% सप्लाई पश्चिम एशिया से आई थी. अब होर्मुज संकट ने भारत को खाड़ी देशों पर निर्भरता घटाकर नए सप्लायर तलाशने की दिशा में आगे बढ़ाया है.
एलपीजी में अमेरिका बना भारत का बड़ा सप्लायर
जनवरी में भारत के एलपीजी आयात में अमेरिका की हिस्सेदारी करीब 12% थी, जो जुलाई में बढ़कर 73% हो गई. इसके उलट यूएई की हिस्सेदारी 37% से घटकर 8.2%, कतर की 19% से घटकर 1.5% और कुवैत की 15% से घटकर 2.7% रह गई.
भारत ने कच्चे तेल के सप्लायर भी बदले
एलपीजी के साथ-साथ भारत कच्चे तेल की खरीद में भी डायवर्सिफिकिशन ला रहा है. एलएनजी में अमेरिका, नाइजीरिया, ओमान और अंगोला की हिस्सेदारी बढ़ाई गई है. वहीं कच्चे तेल में वेनेजुएला, ब्राजील और अंगोला से खरीद बढ़ाने की कोशिश की गई है. मई-जुलाई के दौरान भारत ने अमेरिका से करीब 21.9 लाख टन एलपीजी की खरीदारी की.
आगे क्या होगा?
खाड़ी देश जहां अपनी अर्थव्यवस्था को तेल से आगे ले जाने के लिए एआई, डेटा सेंटर और दूसरी नई इंडस्ट्री में निवेश कर रहे हैं, वहीं भारत जैसे बड़े आयातक देश अमेरिका, वेनेजुएला, ब्राजील और अन्य देशों से सप्लाई बढ़ाकर अपनी ऊर्जा सुरक्षा मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं. यानी होर्मुज संकट सिर्फ आज की तेल सप्लाई का संकट नहीं, बल्कि आने वाले वर्षों की वैश्विक ऊर्जा राजनीति और व्यापारिक नक्शे को बदलने वाला घटनाक्रम भी बन सकता है.
होर्मुज संकट ने खाड़ी देशों को भी अपनी अर्थव्यवस्था और ऊर्जा रणनीति पर दोबारा विचार करने के लिए मजबूर किया है. रिपोर्ट के मुताबिक ऊर्जा बदलाव, इलेक्ट्रिक वाहन और होर्मुज संकट के बीच खाड़ी देश अगले 30-50 वर्षों की कमाई के लिए नए स्रोत तैयार कर रहे हैं.
सऊदी अरब
सऊदी अरब एनवीडिया के साथ मिलकर 500 मेगावाट तक का एआई डेटा सेंटर और एडवांस्ड चिप क्षमता विकसित करने की तैयारी कर रहा है.
यूएई
अबूधाबी में ओपनएआई और सॉफ्टबैंक जैसी कंपनियों के साथ मिलकर करीब 5 गीगावाट का एआई कैंपस तैयार किया जा रहा है.
कतर
कतर करीब 3 अरब डॉलर की लागत से डेटा-सेंटर एक्सेस वाला प्लेटफॉर्म तैयार कर रहा है.
अमेरिका का वेनेजुएला कार्ड
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की वेनेजुएला डील को भी नए तेल विकल्प के तौर पर देखा जा रहा है. अगर वेनेजुएला की सप्लाई बढ़ती है तो इससे हॉर्मुज पर निर्भरता कुछ कम हो सकती है. हालांकि इससे सऊदी और इराक जैसे बड़े तेल उत्पादकों की वैश्विक बाजार में पकड़ पर भी असर पड़ सकता है.