डिलीवरी जॉब का क्रेज हुआ कम! पेट्रोल महंगा होते ही बदल गई वर्कर्स की पहली पसंद

बढ़ती पेट्रोल-डीजल और वाहन लागत ने गिग वर्कर्स की नौकरी की पसंद बदल दी है. डिलीवरी से जुड़े कर्मचारी अब फिक्स्ड सैलरी, वेयरहाउसिंग, मैन्युफैक्चरिंग और EV सेक्टर की नौकरियों को ज्यादा प्राथमिकता दे रहे हैं, जहां कम खर्च में बेहतर कमाई की उम्मीद है.

गिग वर्कर्स

Highlights

  • बढ़ती ईंधन लागत से गिग वर्कर्स की नौकरी पसंद बदली
  • फिक्स्ड सैलरी वाली नौकरियों की मांग तेजी से बढ़ी
  • EV, वेयरहाउसिंग और मैन्युफैक्चरिंग में बढ़ा रोजगार आकर्षण

भारत में बढ़ती ईंधन और वाहन चलाने की लागत का असर अब गिग वर्कर्स की नौकरी की पसंद पर भी दिखने लगा है. डिलीवरी और ड्राइविंग जैसे काम करने वाले कर्मचारी अब सिर्फ ज्यादा कमाई के वादे वाली नौकरियों के बजाय ऐसी नौकरियां तलाश रहे हैं, जिनमें कम खर्च हो और आमदनी ज्यादा तय हो.

डिलीवरी जॉब के लिए कम हुआ टैलेंट पूल

रिक्रूटमेंट फर्म Adecco India के मुताबिक, पिछले चार महीनों में डिलीवरी से जुड़ी गिग नौकरियों के लिए उपलब्ध वर्कर्स का पूल करीब 5-10% घटा है. हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि ये कर्मचारी बेरोजगार हो गए हैं. कई वर्कर्स अब मैन्युफैक्चरिंग, वेयरहाउसिंग, रिटेल और सेल्स जैसी नौकरियों का रुख कर रहे हैं.

इन क्षेत्रों में उन्हें अपेक्षाकृत स्थिर कमाई या कम कामकाजी खर्च मिल रहा है. यानी गिग वर्कर्स अब नौकरी चुनते समय सिर्फ संभावित कमाई नहीं, बल्कि पेट्रोल, वाहन और दूसरे खर्चों के बाद हाथ में बचने वाली रकम को भी ज्यादा महत्व दे रहे हैं.

फिक्स्ड पे और EV जॉब्स की मांग बढ़ी

Apna.co के आंकड़ों के मुताबिक, वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही में डिलीवरी, ड्राइवर और लॉजिस्टिक्स से जुड़ी जॉब पोस्टिंग सालाना आधार पर 60% बढ़ीं. वहीं, इलेक्ट्रिक व्हीकल से जुड़ी नौकरियों की पोस्टिंग में 593% का उछाल आया. वेयरहाउस जॉब्स 91% और फिक्स्ड-पे वाली नौकरियां 205% बढ़ीं.

इन नौकरियों में उम्मीदवारों की दिलचस्पी भी ज्यादा रही. EV से जुड़ी एक नौकरी के लिए सामान्य डिलीवरी जॉब के मुकाबले 62.5% ज्यादा उम्मीदवार आए. फिक्स्ड-पे वाली नौकरियों को 244% और वेयरहाउस जॉब्स को 350% ज्यादा उम्मीदवार मिले.

पेट्रोल महंगा होने से बढ़ा दबाव

गिग वर्कर्स की परेशानी की बड़ी वजह बढ़ती ईंधन लागत है. रिपोर्ट के मुताबिक, फरवरी में ईरान-अमेरिका संघर्ष शुरू होने के बाद पेट्रोल की कीमत करीब 7.5 रुपये प्रति लीटर बढ़ी है. डिलीवरी पार्टनर्स को ज्यादातर मामलों में अपने वाहन का ईंधन खर्च खुद उठाना पड़ता है.

इसके अलावा, केंद्रीय सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने संसद में बताया था कि पेट्रोल में इथेनॉल मिलाने से वाहन की ईंधन दक्षता वाहन की उम्र और मॉडल के आधार पर 2-6% तक प्रभावित हो सकती है.

कंपनियां बदल रही हैं हायरिंग स्ट्रैटेजी

बढ़ती लागत के कारण कंपनियों के लिए डिलीवरी वर्कर्स को बनाए रखना भी महंगा हो रहा है. Genius HRtech के मुताबिक, बेहतर टेक-होम इनकम की तलाश कर रहे कर्मचारियों के बीच प्रतिस्पर्धा बढ़ने से हायरिंग लागत 15-20% बढ़ी है.

Apna.co के अनुसार, विज्ञापित न्यूनतम औसत वेतन सालाना आधार पर 21.6% बढ़कर 35,191 रुपये और अधिकतम औसत वेतन 34.5% बढ़कर 59,287 रुपये हो गया.

गिग वर्क का बदल रहा है मॉडल

अब कंपनियां कर्मचारियों को आकर्षित करने के लिए न्यूनतम कमाई की गारंटी, EV और CNG वाहनों से जुड़ी नौकरियां और फिक्स्ड-पे मॉडल जैसे विकल्प अपना रही हैं. इससे संकेत मिलता है कि भारत में गिग इकोनॉमी अब सिर्फ ज्यादा कमाई की संभावना पर नहीं, बल्कि लंबे समय तक टिकाऊ और आर्थिक रूप से व्यवहारिक रोजगार मॉडल पर ध्यान दे रही है.

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