रतन टाटा के निधन के बाद क्यों मुश्किलों में फंसा Tata ग्रुप? ट्रस्ट्स से लेकर टाटा संस के IPO तक; समझें पूरा विवाद
अब सवाल है कि रतन टाटा के जाने के बाद टाटा ग्रुप में क्या बदला? जवाब शायद किसी फैक्ट्री, कार या स्टील प्लांट में नहीं, बल्कि मुंबई की एक कंपनी के बोर्डरूम में छिपा है, जिसका नाम टाटा संस है. इस कंपनी के पास टाटा ग्रुप की सबसे बड़ी कंपनियों की कमान है.

देश के सबसे प्रतिष्ठित कारोबारी समूहों में शामिल टाटा ग्रुप के सामने नेतृत्व, कॉरपोरेट गवर्नेंस और टाटा संस के भविष्य को लेकर चुनौतियां हैं. समूह अपने पूर्व चेयरमैन रतन टाटा के निधन के बाद लगातार सुर्खियों में बना हुआ है, और इसकी वजह कोई कारोबारी संकट या फिर किसी बिजनेस से जुड़ा बड़ा उलटफेर नहीं है. मुद्दा कॉरपोरेट गवर्नेंस और समूह पर कंट्रोल का है. 9 अक्तूबर 2024 को रतन टाटा के निधन के बाद टाटा ट्रस्ट्स की कमान नोएल टाटा के हाथों में आई और फिर यहीं से कंट्रोलिंग पावर को लेकर बोर्ड रूम तलवारें खिंच गईं.
रतन टाटा के बाद टाटा ग्रुप में क्या बदला?
रतन टाटा के निधन के बाद टाटा समूह के भीतर कई ऐसे घटनाक्रम हुए हैं, जिन्होंने ग्रुप की कमान और टाटा ट्रस्ट्स-टाटा संस के रिश्तों पर सवाल खड़े किए हैं. अब सवाल है कि रतन टाटा के जाने के बाद टाटा ग्रुप में क्या बदला? जवाब शायद किसी फैक्ट्री, कार या स्टील प्लांट में नहीं, बल्कि मुंबई की एक कंपनी के बोर्डरूम में छिपा है, जिसका नाम टाटा संस है. इस कंपनी के पास टाटा ग्रुप की सबसे बड़ी कंपनियों की कमान है, आज उसी के भविष्य को लेकर सबसे ज्यादा सवाल हैं.
फैसले लेने का अधिकार
जानकारों का मानना है कि रतन टाटा के रहते टाटा ग्रुप की सबसे बड़ी ताकत उसकी एकजुटता थी. उनके जाने के बाद पहली बार यह सवाल सार्वजनिक तौर पर सामने आया है कि टाटा नाम के पीछे आखिर अंतिम फैसला किसका होगा. दरअसल, रतन टाटा के रहते नेतृत्व का अंतिम नैतिक और संस्थागत अधिकार काफी हद तक स्पष्ट था. उनके निधन के बाद सवाल खड़ा हुआ कि अब टाटा समूह में अंतिम दिशा कौन तय करेगा?
9 अक्टूबर 2024: रतन टाटा का निधन
रतन टाटा के निधन से टाटा संस और उन चैरिटेबल ट्रस्टों के बीच एक अहम कड़ी टूट गई, जिनके पास होल्डिंग कंपनी की लगभग 66 फीसदी हिस्सेदारी है. उनके निधन के बाद टाटा ट्रस्ट्स के सामने लीडरशिप बदलने की चुनौती आ गई, जबकि टाटा संस चंद्रशेखरन की देखरेख में काम करती रही. दो दिन बाद, रतन टाटा के सौतेले भाई नोएल टाटा को टाटा ट्रस्ट्स का चेयरमैन नियुक्त किया गया.
यह बदलाव सुचारू रूप से होता दिख रहा था, लेकिन एक अहम रुकावट पहले से ही मौजूद थी. टाटा संस के नियमों में बदलाव के कारण, टाटा ट्रस्ट्स का चेयरमैन एक ही समय में टाटा संस का चेयरमैन नहीं बन सकता था. इसलिए नोएल टाटा संस के डायरेक्टर बने, जबकि चंद्रशेखरन होल्डिंग कंपनी के प्रमुख बने रहे.
2024 के आखिर में लिस्टिंग का दबाव
लीडरशिप में बदलाव के साथ-साथ टाटा संस के सामने एक और मुद्दा था, एक अनलिस्टेड कंपनी के तौर पर इसकी स्थिति.
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने टाटा संस को ‘अपर-लेयर नॉन-बैंकिंग फाइनेंशियल कंपनी’ (NBFC) के तौर पर वर्गीकृत किया था. RBI के नियमों के तहत, ऐसी कंपनियों को वर्गीकरण के तीन साल के भीतर लिस्ट होना जरूरी था, जिससे टाटा संस के लिए सितंबर 2025 की समय-सीमा तय हो गई.
टाटा संस पब्लिक नहीं होना चाहती थी और उसने लिस्टिंग की जरूरत से छूट मांगी, लेकिन RBI ने अभी तक ऐसी कोई छूट नहीं दी है.
जुलाई 2025: प्राइवेट बने रहने की कोशिश
जुलाई 2025 तक, टाटा संस ने प्राइवेट बने रहने के अपने पक्ष को मजबूत करने के लिए एक अहम कदम उठाया. उसने लगभग 30,000 करोड़ रुपये का कर्ज चुका दिया, जिससे वह असल में कर्ज-मुक्त हो गई. इस कदम से वह एक कारण हट गया, जिसे RBI यह तय करते समय ध्यान में रखता है कि क्या कोई NBFC ‘अपर-लेयर’ में आती है या नहीं.
सितंबर 2025: पहला बड़ा टकराव
टाटा ट्रस्ट्स के अंदर का तनाव तब सबके सामने आया जब 11 सितंबर को हुई एक बैठक में टाटा संस बोर्ड में ट्रस्ट के नॉमिनी विजय सिंह को हटा दिया गया. सात में से चार ट्रस्टियों ने उनके बने रहने का विरोध किया. विवाद की मुख्य वजह यह शिकायत थी कि टाटा संस बोर्ड में मौजूद टाटा ट्रस्ट्स के तीन नॉमिनी ने होल्डिंग कंपनी में हो रही अहम गतिविधियों के बारे में बाकी ट्रस्टियों को ठीक से जानकारी नहीं दी थी.
सितंबर 2025: लिस्टिंग की समय-सीमा गुजर गई
टाटा संस बिना पब्लिक हुए RBI की सितंबर 2025 की समय-सीमा तक पहुंच गई. कंपनी ने लिस्टिंग की जरूरत से छूट मांगी थी और प्राइवेट बने रहने के अपने मामले को मजबूत करने के लिए अपना डेट कम किया था, लेकिन RBI ने छूट नहीं दी.
अक्टूबर 2025: टाटा-मिस्त्री के बीच एक और टकराव
तनाव तब और बढ़ गया जब नोएल टाटा और दो सीनियर ट्रस्टियों ने रतन टाटा के लंबे समय से करीबी रहे मेहली मिस्त्री को स्थायी ट्रस्टी के तौर पर दोबारा नियुक्त करने का विरोध किया. रतन टाटा की मौत के कुछ ही दिनों बाद नोएल को टाटा ट्रस्ट्स का चेयरमैन बनाने में मिस्त्री ने अहम भूमिका निभाई थी. उन्हें हटाए जाने से ट्रस्ट्स पर कंट्रोल की लड़ाई में एक नया मोर्चा खुल गया और कानूनी चुनौती की संभावना भी पैदा हो गई.
फरवरी 2026: चंद्रा के भविष्य पर सवाल
फरवरी में टाटा संस बोर्ड में चंद्रशेखरन के तीसरे कार्यकाल का मुद्दा फिर से उठा. दो मुख्य टाटा ट्रस्ट्स ने पांच साल के कार्यकाल विस्तार का समर्थन किया था, जिसकी सिफारिश टाटा संस की नॉमिनेशन और रेमुनरेशन कमेटी और बोर्ड ने भी की थी. लेकिन इस प्रस्ताव को सभी का समर्थन नहीं मिला.
बाद में चंद्रशेखरन ने कहा कि आम सहमति न होने के कारण उन्होंने इस फैसले को टालने का फैसला किया. बिना किसी समाधान के छह महीने बीत गए.
मई-जुलाई 2026: आंकड़ों से बढ़ा दबाव
लीडरशिप पर बहस के साथ-साथ टाटा संस के नए बिजनेस- जैसे एयर इंडिया, टाटा डिजिटल, टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स और एग्रेटास- की भी बारीकी से जांच हो रही थी.
जैसे-जैसे इन बिजनेस का नुकसान बढ़ता गया, बोर्ड ने घंटों इनकी समीक्षा की. टाटा संस के 16 प्राइवेट बिजनेस का कुल नुकसान FY26 में लगभग दोगुना होकर 27,854 करोड़ रुपये हो गया, जो एक साल पहले 15,311 करोड़ रुपये था. इस नुकसान का बड़ा हिस्सा नए वेंचर्स की वजह से हुआ था.
जुलाई 2026: रतन टाटा के शेयरों की जांच
तनाव रतन टाटा की संपत्ति (एस्टेट) तक भी पहुंच गया. रतन टाटा के पास मौजूद टाटा संस के 3,368 शेयरों को उनके बनाए दो चैरिटेबल फाउंडेशन में ट्रांसफर करने का काम 1989 में हुए एक पुराने शेयर ट्रांसफर से जुड़ी शिकायत के कारण रुक गया. महाराष्ट्र चैरिटी कमिश्नर इस मामले की जांच की और हाल ही में फैसला आया कि शेयरों का ट्रांसफर नियमों के अनुसार ही किया गया था.
अगस्त 2026: चंद्रशेखरन ने पद छोड़ने का फैसला किया
चंद्रशेखरन ने तय किया है कि फरवरी 2027 में उनका मौजूदा कार्यकाल खत्म होने पर वे अगला कार्यकाल नहीं लेंगे. टाटा संस के बोर्ड को लिखे पत्र में चंद्रशेखरन, जिन्होंने टाटा ग्रुप में अपने प्रोफेशनल करियर के 40 साल पूरे कर लिए हैं, ने कहा कि सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट (SDTT) और सर रतन टाटा ट्रस्ट (SRTT) ने सर्वसम्मति से उनके कार्यकाल को और पांच साल बढ़ाने की सिफारिश की थी और 24 फरवरी 2026 को टाटा संस की बोर्ड बैठक में एक प्रस्ताव पेश किया गया था.
चंद्रशेखरन ने लिखा, ‘हालांकि, यह प्रस्ताव आगे नहीं बढ़ पाया क्योंकि बोर्ड के एक सदस्य ने इसका समर्थन नहीं किया, और सर्वसम्मति से समर्थन न मिलने के कारण, मैंने इस फैसले को टालने का निर्णय लिया.’
उनके इस फैसले से फरवरी 2027 से पहले उनके उत्तराधिकारी को चुनने की औपचारिक प्रक्रिया शुरू हो गई है.
सबसे बड़ा विवाद: टाटा संस IPO लाए या नहीं?
RBI के नियमों के तहत टाटा संस को पब्लिक लिस्टिंग की दिशा में आगे बढ़ना था. लेकिन टाटा ट्रस्ट्स की तरफ से कंपनी को प्राइवेट बनाए रखने की कोशिश की गई. नोएल टाटा भी टाटा संस की लिस्टिंग के पक्ष में नहीं बताए गए हैं. टाटा संस ने RBI से अपना रजिस्ट्रेशन सरेंडर करने की कोशिश की, ताकि IPO की बाध्यता से बचा जा सके. लेकिन सितंबर 2026 में RBI ने यह अनुरोध खारिज कर दिया. इससे टाटा संस के लिए लिस्टिंग का रास्ता काफी हद तक खुल गया है.
टाटा संस के बोर्ड की बैठक 17 सितंबर को होनी है. इसी पर अब सभी की नजरें टिकी हैं. RBI के ताजा फैसले ने विवाद और कंट्रोल की पूरी कहानी को और महत्वपूर्ण बना दिया है. अब टाटा संस के सामने सवाल सिर्फ IPO आएगा या नहीं का नहीं, बल्कि IPO कब और किस तरीके से आएगा, इसका है.
भविष्य को लेकर बढ़ती अंदरूनी खींचतान
रतन टाटा के निधन के बाद टाटा समूह की सबसे बड़ी चुनौती कारोबार नहीं, बल्कि उस विशाल कारोबारी साम्राज्य पर नियंत्रण, नेतृत्व और टाटा संस के भविष्य को लेकर बढ़ती अंदरूनी खींचतान है.
कुल मिलाकर, टाटा ग्रुप की कहानी इस समय कारोबारी संकट से ज्यादा सत्ता, नेतृत्व और गवर्नेंस के बदलाव की कहानी बन गई है.
रतन टाटा के बाद यह पहला बड़ा दौर है, जब समूह को उनकी मौजूदगी के बिना इन जटिल संस्थागत सवालों का जवाब तलाशना पड़ रहा है.
विवाद बोर्ड रूम में पनपा है और वहीं इससे निपटने की संभवत: कोशिश की जा रही है, लेकिन इसका असर बोर्डरूम तक सीमित नहीं है.