पेट्रोल-डीजल का विकल्प बनेंगे ये 7 ईंधन! बदल सकते हैं भारत में गाड़ियों का फ्यूचर
देश में पेट्रोल और डीजल के ऑप्शन के तौर पर सिर्फ इथेनॉल नहीं है. देश के सामने कई दूसरे विकल्प मौजूद हैं. CNG, बायो-CNG, बायोडीजल, LNG, मेथनॉल, DME और ग्रीन हाइड्रोजन जैसे ईंधनों पर अलग-अलग जरूरतों के हिसाब से काम किया जा रहा है.

Alternative Fuels: भारत में पेट्रोल और डीजल के विकल्प के तौर पर सिर्फ इथेनॉल पर ही काम नहीं हो रहा है. E20 के बाद भी देश के सामने कई दूसरे विकल्प मौजूद हैं. CNG, बायो-CNG, बायोडीजल, LNG, मेथनॉल, DME और ग्रीन हाइड्रोजन जैसे ईंधनों पर अलग-अलग जरूरतों के हिसाब से काम किया जा रहा है.
भारत की लंबी अवधि की स्ट्रेटजी किसी एक ईंधन को पेट्रोल और डीजल का पूरा विकल्प बनाने की नहीं है. इसका मकसद ईंधन के कई विकल्प तैयार करना, कच्चे तेल पर निर्भरता घटाना और प्रदूषण कम करना है. यानी आने वाले समय में कार से लेकर बस, ट्रक और भारी उद्योग तक में अलग-अलग ईंधन का इस्तेमाल हो सकता है.
CNG
CNG भारत में पेट्रोल और डीजल का सबसे पुराना और स्थापित विकल्प है. इसका इस्तेमाल कार, टैक्सी, बस और दूसरे कमर्शियल वाहनों में पहले से हो रहा है. शहरों में चलने वाले वाहनों के लिए CNG एक अच्छा विकल्प हो सकता है. हालांकि, यह पूरी तरह प्रदूषण मुक्त ईंधन नहीं है और गैस भरने के लिए बड़े नेटवर्क की जरूरत होती है.
बायो-CNG
बायो-CNG या CBG को कृषि अवशेष, गोबर और दूसरे जैविक कचरे से तैयार किया जाता है. यानी जिस कचरे को अक्सर बेकार समझा जाता है, उससे गाड़ियों के लिए ईंधन बनाया जा सकता है. इससे किसानों के लिए कमाई का एक अतिरिक्त जरिया तैयार हो सकता है और प्राकृतिक गैस पर निर्भरता भी घट सकती है. बस, ट्रक और बड़े कमर्शियल वाहनों के लिए इसका इस्तेमाल अहम हो सकता है.
बायोडीजल
बायोडीजल को वनस्पति तेल, इस्तेमाल किए गए खाना पकाने के तेल और दूसरे उपयुक्त स्रोतों से बनाया जा सकता है. इसका इस्तेमाल डीजल इंजन वाले वाहनों में तय मानकों और वाहन की क्षमता के हिसाब से किया जा सकता है. यह पारंपरिक डीजल पर निर्भरता कम करने में मदद कर सकता है. हालांकि, इसकी उपलब्धता और बड़े पैमाने पर उत्पादन के लिए कच्चे माल की पर्याप्त आपूर्ति जरूरी है.
LNG
LNG यानी Liquefied Natural Gas को प्राकृतिक गैस को बेहद ठंडा करके तरल रूप में तैयार किया जाता है. इसे कम जगह में ज्यादा मात्रा में स्टोर किया जा सकता है. भारत में LNG की सबसे बड़ी भूमिका लंबी दूरी के ट्रक, बस और भारी वाहनों में हो सकती है. इलेक्ट्रिक वाहनों के मुकाबले लंबी दूरी और ज्यादा वजन ढोने वाले वाहनों में यह एक विकल्प बन सकता है.
मेथनॉल और DME
मेथनॉल और DME यानी Dimethyl Ether भी भविष्य के वैकल्पिक ईंधनों में शामिल हैं. इनका इस्तेमाल सिर्फ गाड़ियों तक सीमित नहीं रह सकता, बल्कि उद्योगों में भी इनकी भूमिका हो सकती है. इनकी बड़ी चुनौती यह है कि बड़े स्तर पर इस्तेमाल के लिए नए इंजन, ईंधन के तय मानक, पर्याप्त ढांचा और कम लागत में उत्पादन जरूरी होगा.
ग्रीन हाइड्रोजन
ग्रीन हाइड्रोजन को अक्षय ऊर्जा और इलेक्ट्रोलिसिस के जरिए तैयार किया जाता है. यह उन क्षेत्रों में खासतौर पर उपयोगी हो सकता है, जहां सीधे बिजली से काम करना मुश्किल है. भारी वाहन, जहाज, स्टील और दूसरे उद्योगों में ग्रीन हाइड्रोजन की भूमिका बढ़ सकती है. भारत की National Green Hydrogen Mission के तहत इसके उत्पादन, मैन्युफैक्चरिंग और ट्रायल प्रोजेक्ट्स पर काम हो रहा है.
फरवरी 2026 में भारत ने ग्रीन अमोनिया और ग्रीन मेथनॉल के मानक भी जारी किए हैं, जिससे हाइड्रोजन से जुड़े ईंधनों के लिए ढांचा मजबूत हुआ है.
तो भविष्य में गाड़ियों में क्या भरेगा?
इस सवाल का जवाब शायद कोई एक ईंधन नहीं है. भारत के लिए CNG, बायो-CNG, बायोडीजल, LNG, मेथनॉल, DME और ग्रीन हाइड्रोजन सभी की अलग-अलग भूमिका हो सकती है. यात्री वाहनों के कुछ हिस्सों में बैटरी वाली इलेक्ट्रिक गाड़ियां आगे रह सकती हैं. वहीं, ट्रक, बस, लंबी दूरी के वाहन और उद्योगों में गैस या दूसरे वैकल्पिक ईंधन ज्यादा उपयोगी हो सकते हैं.