EV कारों की बाजार हिस्सेदारी में भारत ने अमेरिका को छोड़ा पीछे, इन ब्रांड के गाड़ियों को मिल रही तवज्जो
भारत ने अप्रैल 2026 में इलेक्ट्रिक कार की बाजार हिस्सेदारी के मामले में अमेरिका को पीछे छोड़ दिया है. VAHAN डेटा के मुताबिक, अप्रैल में भारत में नई कार बिक्री में EVs की हिस्सेदारी 5.8% पहुंच गई, जबकि अमेरिका में यह 5.1% रही.

EV Cars: भारतीय ऑटोमोबाइल सेक्टर ने एक नया मुकाम हासिल किया है. अप्रैल 2026 के महीने में भारत ने इलेक्ट्रिक कार की बाजार हिस्सेदारी में दुनिया के सबसे बड़े बाजारों में से एक, अमेरिका को पहली बार पीछे छोड़ दिया है. ‘वाहन’ (VAHAN) रजिस्ट्रेशन डेटा के मुताबिक, अप्रैल में भारत में बिकने वाली कुल कारों में इलेक्ट्रिक कारों की हिस्सेदारी रिकॉर्ड 5.8% पर पहुंच गई. वहीं, इसके विपरीत अमेरिका में यह आंकड़ा गिरकर 5.1% पर आ गया. पश्चिम एशिया संकट और घरेलू बाजार में ईंधन की बढ़ती कीमतों के बीच भारतीय ग्राहकों का रुख तेजी से ईवी की तरफ हुआ है.
पैठ में आगे पर कुल वॉल्यूम में अभी भी पीछे
भले ही कुल बिक्री में ईवी की हिस्सेदारी के मामले में भारत आगे निकल गया हो, लेकिन कुल गाड़ियों की संख्या के मामले में अमेरिका अभी भी काफी आगे है. इसका मुख्य कारण यह है कि अमेरिकी कार बाजार का आकार भारत से तीन गुना बड़ा है.
- भारत में बिक्री: अप्रैल महीने में कुल 23,500 इलेक्ट्रिक कारें बिकीं.
- अमेरिका में बिक्री: इसी अवधि के दौरान अमेरिका में करीब 70,000 ईवी की बिक्री हुई.
घरेलू बाजार में किस कंपनी का रहा दबदबा?
भारतीय बाजार में टाटा मोटर्स ने अपनी बादशाहत बरकरार रखी है, जबकि महिंद्रा और एमजी मोटर भी मजबूती से रेस में बने हुए हैं. प्रमुख कंपनियों का प्रदर्शन इस प्रकार रहा:
- टाटा मोटर्स: 8,543 यूनिट्स की बिक्री के साथ पहले पायदान पर (सालाना आधार पर 92% की भारी ग्रोथ).
- महिंद्रा एंड महिंद्रा (M&M): 5,413 यूनिट्स बेचकर दूसरे स्थान पर रही.
- JSW एमजी मोटर इंडिया: 5,006 यूनिट्स की बिक्री के साथ तीसरे स्थान पर रही.
- विनफास्ट और मारुति सुजुकी: दोनों कंपनियों ने क्रमशः लगभग 1,232-1,232 गाड़ियां बेचीं.
(नोट: अमेरिका में टेस्ला अभी भी टॉप पर है, जिसके बाद जनरल मोटर्स, फोर्ड और हुंडई का नंबर आता है.)
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ईंधन की कीमतों और ‘युद्ध’ ने बढ़ाई डिमांड
भारत में ईवी पैठ बढ़ने की सबसे बड़ी वजह अंतरराष्ट्रीय मोर्चे पर तनाव है. पश्चिम एशिया (West Asia) में चल रहे युद्ध के कारण खरीदार पहले से ही तेल महंगा होने की आशंका जता रहे थे. मई महीने में सरकारी तेल कंपनियों द्वारा चौथी बार ईंधन के दाम बढ़ाने के बाद इस डिमांड को और हवा मिली है.