दांव पर टाटा ट्रस्ट्स का कंट्रोल, IPO से पहले Tata Sons ने ‘आर्टिकल्स ऑफ एसोसिएशन’ की शुरू की समीक्षा
Tata Sons Listing: सेबी (SEBI) के नियमों का पालन करने के लिए की जा रही इस समीक्षा से टाटा संस पर टाटा ट्रस्ट्स के प्रभाव के तरीके में बदलाव आ सकता है, हालांकि टाटा ट्रस्ट्स की मेजॉरिटी हिस्सेदारी और सामान्य वोटिंग अधिकार पहले की तरह बने रहेंगे.

Tata Sons Listing: टाटा संस ने संभावित पब्लिक लिस्टिंग से पहले अपने ‘आर्टिकल्स ऑफ एसोसिएशन’ (AoA) की समीक्षा शुरू कर दी है. इस समीक्षा का मकसद बोर्ड में नियुक्तियों, स्वतंत्र निदेशकों और टाटा ट्रस्ट्स के पास मौजूद विशेष अधिकारों से जुड़े बदलावों को शामिल करना है. मामले से जुड़े अधिकारियों ने यह जानकारी दी है. ईटी की रिपोर्ट के अनुसार, सेबी (SEBI) के नियमों का पालन करने के लिए की जा रही इस समीक्षा से टाटा संस पर टाटा ट्रस्ट्स के प्रभाव के तरीके में बदलाव आ सकता है, हालांकि टाटा ट्रस्ट्स की मेजॉरिटी हिस्सेदारी और सामान्य वोटिंग अधिकार पहले की तरह बने रहेंगे.
बदलाव के लिए मंजूरी जरूरी
अधिकारियों ने बताया कि ‘आर्टिकल्स ऑफ एसोसिएशन’ में किसी भी तरह के बदलाव के लिए, जो कंपनी और उसके शेयरधारकों के अधिकारों और जिम्मेदारियों को तय करता है, एक आम बैठक (जनरल मीटिंग) में ‘विशेष प्रस्ताव’ (स्पेशल रेजोल्यूशन) के जरिए मंजूरी लेनी होगी. टाटा ट्रस्ट्स, जिसके पास टाटा समूह की होल्डिंग कंपनी की लगभग 66 फीसदी हिस्सेदारी है, अपने प्रभाव को सुरक्षित रखने के लिए ‘आर्टिकल 104B’ और ‘121’ पर निर्भर है.
शेयरधारकों की मंजूरी अहम
इसमें बोर्ड में नामांकन के अधिकार और ‘अफरमेटिव वोटिंग’ (सहमति देने वाले वोट) की शक्तियां शामिल हैं. पब्लिक लिस्टिंग होने पर ये विशेष अधिकार सेबी के ‘रेगुलेशन 31B’ के दायरे में आ जाएंगे. इसके तहत, ऐसे अधिकारों के लिए हर पांच साल में कम से कम एक बार शेयरधारकों की मंजूरी लेना जरूरी होगा, और इन अधिकारों को आगे जारी रखने के लिए आम शेयरधारकों की मंजूरी अहम भूमिका निभाएगी.
टाटा संस की लिस्टिंग क्यों है जरूरी?
यह समीक्षा ऐसे समय में हो रही है जब भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने टाटा संस की उस अर्जी को खारिज कर दिया है, जिसमें उसने ‘कोर इन्वेस्टमेंट कंपनी’ के रूप में अपना रजिस्ट्रेशन सरेंडर करने की मांग की थी. अब टाटा संस को ‘अपर-लेयर नॉन-बैंकिंग फाइनेंशियल कंपनियों’ (NBFCs) के लिए बने नियमों का पालन करना होगा. इन नियमों के अनुसार, ऐसी कंपनियों को इस श्रेणी में वर्गीकृत होने के तीन साल के भीतर अपने इक्विटी शेयरों को लिस्ट कराना अनिवार्य है.
लिस्टिंग की इस योजना ने टाटा समूह के भीतर होल्डिंग कंपनी के भविष्य को लेकर मतभेदों को सामने ला दिया है. टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन नोएल टाटा ने टाटा संस के पुनर्गठन (रीस्ट्रक्चरिंग) सहित अन्य विकल्पों पर विचार करने का समर्थन किया है, जबकि कंपनी के बोर्ड ने RBI के नियमों का पालन करने का पक्ष लिया है.
क्या कहता है मौजूदा नियम?
मौजूदा ‘आर्टिकल्स’ के तहत, टाटा ट्रस्ट्स बोर्ड के एक-तिहाई सदस्यों को नामांकित कर सकता है. साथ ही, कुछ खास फैसलों के लिए ट्रस्ट्स द्वारा नामांकित निदेशकों के बहुमत की सहमति (अफरमेटिव वोट) जरूरी होती है. बोर्ड की बैठक के लिए जरूरी ‘कोरम’ (न्यूनतम उपस्थिति) पूरा करने के लिए भी इन नामांकित निदेशकों में से बहुमत का मौजूद होना आवश्यक है.
सेबी के नियमों (जो लिस्टेड कंपनियों पर लागू होते हैं) के अनुरूप होने के लिए इन प्रावधानों में बदलाव की जरूरत पड़ सकती है. इसमें विशेष अधिकारों और समय-समय पर शेयरधारकों से मंजूरी लेने से जुड़े नियम भी शामिल हैं.
कानूनी जरूरतें
चेयरमैन चुनने की प्रक्रिया की भी समीक्षा की जा सकती है. अभी जो पांच सदस्यीय चयन समिति है, उसमें तीन सदस्य ट्रस्ट्स से जुड़े हुए हैं. बोर्ड की समितियों को लिस्टिंग की शर्तों के हिसाब से ढालना होगा. साथ ही, शेयर ट्रांसफर पर लगी पाबंदियों में भी बदलाव करने पड़ सकते हैं, ताकि आम जनता की हिस्सेदारी और स्टॉक मार्केट में ट्रेडिंग संभव हो सके.
अधिकारियों ने बताया कि बदलाव कितने बड़े होंगे, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि लिस्टिंग का प्रस्तावित ढांचा कैसा है और उस पर कौन-कौन से कानूनी नियम लागू होते हैं.
ट्रस्ट्स का प्रभाव
ट्रस्ट्स के पास मेजॉरिटी हिस्सेदारी होने के कारण, शेयरधारकों के फैसलों पर उनका काफी प्रभाव बना रहेगा. हालांकि, नॉमिनेशन के अधिकारों, वोटिंग के नियमों और बोर्ड के गठन में बदलाव होने से, बोर्ड के स्तर पर उनके इस प्रभाव का इस्तेमाल करने के तरीकों पर कुछ पाबंदियां लग सकती हैं.
अधिकारियों ने बताया कि यह समीक्षा अभी शुरुआती चरण में है और अभी तक किसी भी अंतिम बदलाव को मंजूरी नहीं दी गई है.