हर पांचवें ट्रक का थमा पहिया! बढ़ते डीजल की कीमतों ने लगाया ब्रेक, अब चौतरफा बढ़ेगी महंगाई

देश में बढ़ती डीजल कीमतों और कई राज्यों में पैदा हुए ईंधन संकट का असर अब ट्रांसपोर्ट सेक्टर पर साफ दिखाई देने लगा है. रिपोर्ट्स के मुताबिक, देश के करीब 20 फीसदी कमर्शियल ट्रक डीजल की किल्लत और बढ़ती लागत के कारण सड़कों से हट चुके हैं.

महंगाई दे रही है दस्तक Image Credit: Money9 Live

Higher Freight Rates Could Fuel Inflation: देश के लॉजिस्टिक्स और गुड्स ट्रांसपोर्ट सेक्टर पर इस समय दोहरी मार पड़ रही है. एक तरफ वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में उछाल के बाद घरेलू बाजार में लगातार ईंधन के दाम बढ़ रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ कई राज्यों में पैदा हुए डीजल संकट ने ट्रकों की रफ्तार पर ब्रेक लगा दिया है. इकोनॉमिक टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, देश के कुल 95 लाख कमर्शियल ट्रकों में से करीब 20 फीसदी (लगभग पांचवां हिस्सा) डीजल की किल्लत और भारी कीमतों के कारण खड़े हो चुके हैं. इस संकट ने मालभाड़े (Freight Rates) को मुख्य रूटों पर 10 से 15 फीसदी तक बढ़ा दिया है, जिससे आने वाले दिनों में आम जनता पर चौतरफा महंगाई का बोझ बढ़ना तय नजर आ रहा है.

ट्रांसपोर्ट लागत बढ़ने का सीधा असर रोजमर्रा के सामानों की सप्लाई चेन पर पड़ता है. फल-सब्जियों से लेकर FMCG, सीमेंट, स्टील और ई-कॉमर्स डिलीवरी तक लगभग हर सेक्टर का माल ट्रकों के जरिए ही पहुंचता है, ऐसे में बढ़ा हुआ मालभाड़ा आखिरकार उपभोक्ताओं को महंगे सामान के रूप में चुकाना पड़ सकता है.

क्यों खड़ा हुआ डीजल का अचानक संकट?

सड़क पर अचानक ट्रकों के थमने की सबसे बड़ी वजह थोक और खुदरा डीजल की कीमतों में आया भारी अंतर है. दरअसल, थोक में डीजल खरीदने वाले बड़े कमर्शियल ग्राहकों के लिए कीमतें काफी ज्यादा हैं, जबकि रिटेल पंपों पर यह सस्ता मिल रहा है.

  • ₹40-42 का बड़ा अंतर: कमर्शियल ट्रकों के थोक कीमतों में ₹40 से ₹42 प्रति लीटर का बड़ा अंतर आ चुका है.
  • रिटेल पंपों पर बढ़ी भीड़: इस भारी अंतर के चलते जो बड़े ट्रांसपोर्टर्स पहले सीधे कंपनियों से थोक में तेल खरीदते थे, वे अब अपने ट्रकों को लेकर सरकारी खुदरा पेट्रोल पंपों पर पहुंच रहे हैं.
  • सप्लाई चेन पर दबाव: खुदरा पंपों पर अचानक बढ़ी इस भारी भीड़ के कारण कई राज्यों में स्थानीय स्तर पर डीजल की भारी किल्लत हो गई है और नेशनल हाईवे पर ट्रकों की लंबी-लंबी कतारें दिखाई दे रही हैं.

11 दिनों में 4 बार बढ़े दाम, ट्रांसपोर्टर्स बेहाल

सरकारी तेल कंपनियों (OMCs) ने पिछले 11 दिनों में चार बार पेट्रोल और डीजल की कीमतें बढ़ाई हैं. हालिया बढ़ोतरी में तेल कंपनियों ने करीब ₹2.7 प्रति लीटर की वृद्धि की है, जिससे पिछले दो हफ्तों में कुल बढ़ोतरी ₹7.5 से ₹8 प्रति लीटर तक पहुंच गई है.

ट्रांसपोर्ट सेक्टर के लिए यह झटका इसलिए बड़ा है क्योंकि किसी भी गाड़ी को चलाने की कुल परिचालन लागत में 40 से 45 फीसदी हिस्सा अकेले डीजल का होता है. ऑल इंडिया मोटर ट्रांसपोर्ट कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष हरीश सभरवाल ने ईटी से बातचीत में कहा, “डीजल हमारी परिचालन लागत का 40-45% हिस्सा है. सरकार ने किश्तों में कीमतें ₹5-6 बढ़ा दी हैं, और हम इस स्थिति में नहीं हैं कि इस अतिरिक्त बोझ को खुद झेल सकें.”

छोटे ऑपरेटरों पर अस्तित्व का संकट

इस संकट का सबसे बुरा असर देश के छोटे ट्रक ऑपरेटरों पर पड़ा है. भारतीय ट्रांसपोर्ट सेक्टर बेहद बिखरा हुआ है, जहां 70 फीसदी से ज्यादा हिस्सेदारी छोटे ऑपरेटरों की है. ये छोटे कारोबारी बढ़ती परिचालन लागत और घटती कमाई के कारण अपने पैर पीछे खींचने पर मजबूर हैं.

वहीं, बड़े फ्लीट ऑपरेटर भी इस दबाव से अछूते नहीं हैं. 6,000 ट्रकों के बेड़े वाली बड़ी कंपनी वीआरएल लॉजिस्टिक्स (VRL Logistics) के चेयरमैन विजय संकेश्वर ने ईटी को बताया कि सरकारी कंपनियों के अपने खुद के पंप होने के बावजूद उनके कुछ वाहनों को 6 से 8 घंटे तक खड़े रहना पड़ रहा है.

मुख्य आंकड़े जो समझना जरूरी है:

  • 10-15%: प्रमुख रूटों पर मालभाड़े (Freight Rates) में हुई बढ़ोतरी.
  • 20% ट्रक: डीजल की कमी और बढ़ती लागत के कारण सड़कों से दूर, गैराजों में खड़े.
  • 14% और 18%: मई महीने के दौरान क्रमशः पेट्रोल और डीजल की खुदरा बिक्री में दर्ज की गई बढ़त.

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तेल कंपनियों का दावा और आगे की उम्मीद

इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन (IOC) जैसी सरकारी तेल कंपनियों ने देश में डीजल की किसी भी तरह की कमी की बात से साफ इनकार किया है. कंपनियों का कहना है कि देश में ईंधन की कोई किल्लत नहीं है. यह समस्या पूरी तरह से स्थानीय है, जो मांग के अचानक खुदरा पंपों की तरफ शिफ्ट होने के कारण पैदा हुई है.

इंडस्ट्री के जानकारों का मानना है कि इस समय खेती के सीजन (थ्रेशिंग/कटाई), छुट्टियों और पर्यटन के कारण भी ईंधन की मांग चरम पर है. उम्मीद जताई जा रही है कि जैसे ही मानसून की शुरुआत होगी, ईंधन की मांग में थोड़ी कमी आएगी और स्थिति सामान्य हो सकेगी.