FD या लिक्विड फंड: गारंटीड रिटर्न चाहिए या पैसे निकालने की आजादी? ऐसे चुनें सही विकल्प
FD और लिक्विड फंड दोनों ही अतिरिक्त पैसे को रखने के विकल्प हैं, लेकिन दोनों की खासियत अलग है. FD में तय ब्याज मिलता है, जबकि लिक्विड फंड ज्यादा फ्लेक्सिबिलिटी देते हैं. निवेश से पहले रिटर्न, जोखिम, टैक्स और जरूरत समझें.

अगर आपके पास कुछ पैसा अतिरिक्त है और आप उसे सुरक्षित जगह रखना चाहते हैं, तो फिक्स्ड डिपॉजिट (FD) और लिक्विड म्यूचुअल फंड दोनों विकल्प हो सकते हैं. लेकिन दोनों में निवेश का तरीका, रिटर्न, जोखिम और पैसे निकालने की सुविधा अलग-अलग है. इसलिए निवेश से पहले यह समझना जरूरी है कि आपकी जरूरत क्या है.
FD में मिलता है तय ब्याज
FD उन निवेशकों के लिए बेहतर विकल्प हो सकता है, जो अपने निवेश पर पहले से तय ब्याज चाहते हैं. बैंक में पैसा एक निश्चित अवधि के लिए जमा किया जाता है और उस पर तय दर से ब्याज मिलता है. इससे निवेशक को मैच्योरिटी पर मिलने वाली रकम का अंदाजा पहले से रहता है. FD का एक बड़ा फायदा यह है कि इसमें बाजार के उतार-चढ़ाव का सीधा असर निवेश की मूल रकम पर नहीं पड़ता. हालांकि, ब्याज दरें बैंक और जमा की अवधि के हिसाब से अलग-अलग हो सकती हैं.
लिक्विड फंड में ज्यादा फ्लेक्सिबिलिटी
लिक्विड फंड म्यूचुअल फंड की एक कैटेगरी है, जो आमतौर पर बहुत कम अवधि वाले डेट और मनी मार्केट इंस्ट्रूमेंट्स में निवेश करती है. इनका इस्तेमाल अक्सर ऐसी रकम रखने के लिए किया जाता है, जिसकी निकट भविष्य में जरूरत पड़ सकती है.
इसका सबसे बड़ा फायदा पैसे निकालने की सुविधा है. जरूरत पड़ने पर निवेशक अपनी यूनिट्स को रिडीम कर सकता है. हालांकि, यह ध्यान रखना चाहिए कि लिक्विड फंड का रिटर्न गारंटीड नहीं होता और बाजार की परिस्थितियों के कारण इसमें थोड़ा उतार-चढ़ाव हो सकता है.
पैसे की जरूरत कब पड़ेगी, यह तय करें
FD और लिक्विड फंड में चुनाव करते समय सबसे पहले यह देखें कि पैसे की जरूरत कब पड़ सकती है. अगर आपको पता है कि रकम एक निश्चित अवधि तक इस्तेमाल नहीं करनी है और आप निश्चित रिटर्न चाहते हैं, तो FD पर विचार किया जा सकता है. वहीं, अगर पैसा कुछ समय के लिए रखना है और जरूरत पड़ने पर उसे आसानी से निकालना चाहते हैं, तो लिक्विड फंड ज्यादा लचीला विकल्प हो सकता है.
टैक्स का असर भी समझें
दोनों निवेश विकल्पों से मिलने वाली कमाई पर टैक्स का असर पड़ता है. FD का ब्याज आम तौर पर निवेशक की लागू आयकर दर के हिसाब से टैक्स के दायरे में आता है. बैंक कुछ मामलों में ब्याज पर TDS भी काट सकता है.
लिक्विड फंड से मिलने वाले रिटर्न पर भी लागू टैक्स नियमों के अनुसार टैक्स लगता है. हालांकि, रिपोर्ट के मुताबिक दोनों विकल्पों पर टैक्स की दरें समान हो सकती हैं, लेकिन लिक्विड फंड कैश फ्लो के लिहाज से कुछ मामलों में ज्यादा टैक्स-एफिशिएंट हो सकते हैं.
जोखिम के मामले में कौन बेहतर?
FD में ब्याज पहले से तय होने के कारण रिटर्न की अनिश्चितता कम होती है. वहीं लिक्विड फंड बाजार से जुड़े होते हैं, इसलिए इनमें रिटर्न की गारंटी नहीं होती. हालांकि, लिक्विड फंड आम तौर पर कम अवधि के अपेक्षाकृत कम जोखिम वाले डेट इंस्ट्रूमेंट्स में निवेश करते हैं. फिर भी इन्हें FD की तरह पूरी तरह निश्चित रिटर्न वाला विकल्प नहीं माना जाना चाहिए.
किसके लिए कौन-सा विकल्प?
अगर आपकी प्राथमिकता गारंटीड और तय रिटर्न है और आप पैसा निश्चित अवधि तक रखना चाहते हैं, तो FD पर विचार कर सकते हैं. दूसरी ओर, अगर आपको फ्लेक्सिबिलिटी, अपेक्षाकृत आसान निकासी और छोटी अवधि के लिए पैसे रखने का विकल्प चाहिए, तो लिक्विड फंड उपयोगी हो सकता है. यानी सही विकल्प आपकी जरूरत, निवेश अवधि, जोखिम उठाने की क्षमता और टैक्स स्थिति पर निर्भर करता है. निवेश करने से पहले सिर्फ रिटर्न नहीं, बल्कि पैसे की जरूरत और जोखिम को भी ध्यान में रखना जरूरी है.
यह भी पढ़ें- EPF Calculator: 50 हजार बेसिक सैलरी पर 2.23 करोड़ रुपये का रिटायरमेंट फंड कैसे बनेगा?