क्या है CAS का गड़बड़झाला, केवल 6 मिनट में 2000 अंक गिर गया सेंसेक्स; आखिर क्यों
शेयर मार्केट में गुरुवार को क्लोजिंग ऑक्शन सेशन यानी CAS को लेकर सवाल खडे़ हो गए. सेंसेक्स करीब 6 मिनट में 2000 से ज्यादा अंक फिसलकर 74983 तक पहुंच गया, हालांकि बाद में रिकवरी हुई. यह उतार चढाव मासिक डेरिवेटिव्स एक्सपायरी के दिन देखने को मिला. CAS में कम लिक्विडिटी के कारण बडे़ ऑर्डर क्लोजिंग प्राइस को तेजी से प्रभावित कर सकते हैं.
Highlights
- सेंसेक्स में 6 मिनट में 2,000 से ज्यादा अंकों का तेज उतार चढ़ाव.
- सीएएस के तहत पहली मासिक डेरिवेटिव्स एक्सपायरी ने बढ़ाई बाजार की चिंता.
- कम लिक्विडिटी के कारण बडे़ ऑर्डर क्लोजिंग प्राइस को तेजी से प्रभावित कर सकते हैं.
शेयर मार्केट में गुरुवार को कारोबार के आखिरी मिनटों में ऐसी हलचल हुई, जिसने निवेशकों को चौंका दिया. सेंसेक्स करीब 3 बजकर 17 मिनट पर 77200 के आसपास था, लेकिन अगले कुछ मिनट में यह करीब 74983 तक पहुंच गया. यानी लगभग 6 मिनट में 2000 से ज्यादा अंकों की तेज गिरावट दिखी. इसके बाद इंडेक्स ने रिकवरी की और 76933 पर बंद हुआ. यह घटनाक्रम उस दिन हुआ, जब नए क्लोजिंग ऑक्शन सेशन यानी CAS के तहत पहली मासिक डेरिवेटिव्स एक्सपायरी थी. इसी वजह से CAS की व्यवस्था और इसमें कम लिक्विडिटी को लेकर सवाल उठ रहे हैं.
CAS क्या है और इसे क्यों लाया गया
CAS यानी क्लोजिंग ऑक्शन सेशन शेयर का अंतिम क्लोजिंग प्राइस तय करने की नई व्यवस्था है. इसे 3 अगस्त 2026 से लागू किया गया है. पहले शेयर का क्लोजिंग प्राइस लगातार कारोबार के आखिरी 30 मिनट के VAP यानी वॉल्यूम वेटेड एवरेज प्राइस के आधार पर तय होता था.
CAS में अंतिम कीमत ऑक्शन के जरिए तय होती है, जिसमें खरीद और बिक्री के ऑर्डर के आधार पर एक कीमत खोजी जाती है. सेबी का मकसद क्लोजिंग प्राइस को ज्यादा ट्रांसपेरेंसी तरीके से तय करना और कैश तथा डेरिवेटिव्स बाजार के बीच बेहतर तालमेल बनाना था.
फिर CAS में गड़बड़झाला कहां से शुरू हुआ
समस्या CAS के ऑक्शन विंडो में दिखाई दे रही है. इस दौरान अगर खरीद और बिक्री के ऑर्डर कम हों तो ऑर्डर बुक में लिक्विडिटी घट सकती है. ऐसे में अपेक्षाकृत बड़ा ऑर्डर भी इंडिकेटिव क्लोजिंग प्राइस को तेजी से ऊपर या नीचे ले जा सकता है.
बाजार के कुछ पार्टिसिपेंट ने CAS में कम भागीदारी और कम लिक्विडिटी को लेकर चिंता जताई है. इससे कीमत तय होने की प्रक्रिया के दौरान सामान्य से ज्यादा उतार- चढ़ाव हो सकता है.
इसे ऐसे समझिए. अगर किसी शेयर में खरीदने वाले और बेचने वाले दोनों पर्याप्त संख्या में हैं तो बडे़ ऑर्डर का असर सीमित रह सकता है. लेकिन अगर ऑक्शन में ऑर्डर कम हैं तो अचानक आया बड़ा खरीद या बिक्री ऑर्डर कीमत को ज्यादा तेजी से प्रभावित कर सकता है.
छोटी हलचल भी बन जाती है बड़ी समस्या
CAS की सबसे बड़ी परीक्षा एक्सपायरी वाले दिन होती है. सामान्य दिन में क्लोजिंग प्राइस में कुछ बदलाव का असर सीमित हो सकता है. लेकिन डेरिवेटिव्स एक्सपायरी पर यही अंतिम कीमत फ्यूचर्स और ऑप्शंस के निपटान को प्रभावित कर सकती है.
खासकर स्टॉक ऑप्शंस में क्लोजिंग प्राइस यह तय कर सकता है कि कोई ऑप्शन इन द मनी रहेगा या आउट ऑफ द मनी. स्टॉक ऑप्शंस में फिजिकल सेटलमेंट होने के कारण कुछ मामलों में ट्रेडर्स को वास्तविक शेयरों की डिलीवरी लेनी या देनी पड़ सकती है.
यानी एक्सपायरी वाले दिन क्लोजिंग प्राइस में अचानक बदलाव केवल स्क्रीन पर दिखने वाली हलचल नहीं है. इससे ट्रेडर्स के मुनाफे नुकसान और निपटान से जुड़ी जिम्मेदारियां तक बदल सकती हैं.
6 मिनट में 2000 अंक की गिरावट क्यों दिखी
गुरुवार को यही चिंता सबसे ज्यादा सामने आई. करीब 3 बजकर 17 मिनट पर सेंसेक्स 77,200 के आसपास था. करीब 3 बजकर 23 मिनट पर यह 74,983 तक पहुंच गया. यानी लगभग 6 मिनट में 2000 से ज्यादा अंकों का उतार-चढ़ाव देखने को मिला. इसके बाद सेंसेक्स ने काफी हद तक रिकवरी की और 76933 पर बंद हुआ.
यहां यह समझना जरूरी है कि पूरे 2000 अंकों के उतार- चढाव को केवल CAS की वजह से हुई वास्तविक बाजार गिरावट कहना सही नहीं होगा. यह क्लोजिंग सेशन के दौरान दिखा तेज उतार-चढ़ाव था. उस दिन बाजार पहले से दबाव में था और मासिक एक्सपायरी ने भी अस्थिरता बढ़ाई थी.
क्या कम लिक्विडिटी है सबसे बड़ी वजह
बाजार में CAS को लेकर सबसे बड़ी चिंता लिक्विडिटी की है. अगर ऑक्शन विंडो में बडे़ ट्रेडिंग संस्थानों और अन्य सक्रिय पार्टिसिपेंट की भागीदारी कम रहती है तो उपलब्ध खरीद और बिक्री के ऑर्डर कम हो सकते हैं.
ऐसी स्थिति में किसी बडे़ ऑर्डर को सामने से पर्याप्त ऑर्डर नहीं मिलते. जिसका रिजल्ट यह होता है कि इंडिकेटिव क्लोजिंग प्राइस तेजी से बदल सकता है.
यही कारण है कि CAS का उद्देश्य भले ही बेहतर कीमत तय करना हो, लेकिन कम भागीदारी की स्थिति में यही व्यवस्था ज्यादा अस्थिरता पैदा कर सकती है.
CAS पर पहले ही उठ चुके हैं गंभीर सवाल
यह पहली बार नहीं है जब CAS को लेकर सवाल उठे हैं. 13 अगस्त को सेंसेक्स साप्ताहिक ऑप्शंस एक्सपायरी के दौरान CAS में कथित कीमत में हेरफेर के मामले में सेबी ने दो संस्थाओं के खिलाफ अंतरिम कार्रवाई की थी.
इनमें जेपी मॉर्गन की इकाई कॉप्थॉल मॉरीशस इन्वेस्टमेंट और मानसी शेयर एंड स्टॉक ब्रोकिंग शामिल थीं. सेबी ने कथित तौर पर ऐसे ट्रेडिंग पैटर्न की पहचान की थी.
इस मामले ने यह सवाल खड़ा किया कि क्या कम लिक्विडिटी वाले ऑक्शन विंडो में बडे़ ऑर्डर डालकर क्लोजिंग प्राइस को प्रभावित करने की कोशिश की जा सकती है.
सेबी ने रिस्क कम करने के लिए क्या किया
सेबी ने डेरिवेटिव्स ट्रेडिंग को ऑक्शन विंडो के बाद भी जारी रखने की व्यवस्था की है. इसका उद्देश्य ट्रेडर्स को क्लोजिंग प्राइस सामने आने के बाद अपनी डेरिवेटिव्स पोजीशन को संभालने के लिए अतिरिक्त समय देना है.
इससे अगर क्लोजिंग ऑक्शन के दौरान किसी शेयर में तेज बदलाव होता है तो ट्रेडर्स को अपनी फ्यूचर्स और ऑप्शंस पोजीशन को समायोजित करने का मौका मिल सकता है.
हालांकि इससे CAS की मूल समस्या यानी ऑक्शन में लिक्विडिटी और कीमत तय करने की प्रक्रिया को लेकर उठे सवाल पूरी तरह खत्म नहीं होते.
क्या CAS को बंद किया जाएगा
फिलहाल ऐसा कोई संकेत नहीं है. सेबी के चेयरमैन तुहिन कांत पांडे ने कहा है कि CAS जारी रहेगा, लेकिन इसके लागू होने से जुड़ी समस्याओं का रिसर्च किया जा रहा है.
सेबी के अनुसार कुछ समस्याएं पुराने सिस्टम के नए ऑक्शन फ्रेमवर्क के साथ पूरी तरह अपडेट नहीं होने से भी जुड़ी हो सकती हैं. इसलिए आने वाले समय में सिस्टम में बदलाव, बेहतर रिस्क कंट्रोल या लिक्विडिटी बढाने के उपाय देखने को मिल सकते हैं.
CAS के अलावा भी कारण
गुरुवार को बाजार पर सिर्फ CAS का असर नहीं था. घरेलू बाजार पहले से कमजोर था और प्रमुख शेयरों में बिकवाली देखने को मिली. सेंसेक्स आखिरकार 0.7 फीसदी गिरकर 76933 पर बंद हुआ, जबकि निफ्टी 0.48 फीसदी नीचे रहा.
दूसरी तरफ कच्चे तेल की कीमतों में नरमी और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से जुड़ी चिंताओं में कुछ कमी जैसे पॉजिटिव संकेत भी मौजूद थे. इसलिए पूरे दिन की बाजार गिरावट को CAS के खाते में डालना सही नहीं होगा.
असल चिंता यह है कि CAS के कारण बाजार बंद होने के समय कीमतों में उतार-चढ़ाव का असर अब केवल क्लोजिंग प्राइस तक सीमित नहीं रह सकता. मासिक एक्सपायरी के दिन यही कीमत ट्रेडर्स के ऑप्शंस पेमेंट, फ्यूचर्स निपटान और संभावित शेयर डिलीवरी को प्रभावित कर सकती है.
आखिर CAS का पूरा गड़बड़झाला क्या है
CAS का मकसद क्लोजिंग प्राइस को ट्रांसफर्स तरीके से तय करना है, लेकिन अगर ऑक्शन विंडो में लिक्विडिटी कम रहती है तो बडे़ ऑर्डर कीमत को तेजी से प्रभावित कर सकते हैं. एक्सपायरी वाले दिन यह समस्या और गंभीर हो जाती है, क्योंकि क्लोजिंग प्राइस डेरिवेटिव्स के मुनाफे नुकसान और निपटान को प्रभावित करता है. गुरुवार को सेंसेक्स में 6 मिनट के भीतर 2,000 से ज्यादा अंकों का उतार- चढ़ाव इस नई व्यवस्था की क्षमता और रिस्क दोनों पर बड़ा सवाल खड़ा करता है.
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