NSE के IPO से प्रेशर में BSE के शेयर, रेवेन्यू, प्रॉफिट ग्रोथ और मार्केट शेयर पर दिखेगा असर?
BSE Share: भारतीय बाजार एक मेगा लिस्टिंग की तैयारी कर रहा है. निवेशक इस बात पर विचार कर रहे हैं कि देश के सबसे बड़े एक्सचेंज के पब्लिक होने का असर BSE लिमिटेड पर क्या होगा, जो अभी देश का एकमात्र लिस्टेड एक्सचेंज है.
BSE Share Today: भारत के नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) ने अपने इनिशियल पब्लिक ऑफरिंग (IPO) के लिए अपने ड्राफ्ट पेपर फाइल कर दिए हैं. NSE की कैपिटल मार्केट में लिस्टिंग एक बड़ी घटना है. भारतीय बाजार एक मेगा लिस्टिंग की तैयारी कर रहा है. निवेशक इस बात पर विचार कर रहे हैं कि देश के सबसे बड़े एक्सचेंज के पब्लिक होने का असर BSE लिमिटेड पर क्या होगा, जो अभी देश का एकमात्र लिस्टेड एक्सचेंज है. हालांकि, NSE के IPO से BSE के रोजमर्रा के कामकाज पर कोई असर नहीं पड़ेगा, लेकिन इससे निवेशकों की सोच, वैल्यूएशन मल्टीपल और कॉम्पिटिशन के माहौल पर असर पड़ सकता है.
BSE के शेयरों पर दबाव क्यों आ सकता है?
अब तक, भारत के एक्सचेंज बिजनेस में निवेश करने के इच्छुक निवेशकों के लिए BSE ही एकमात्र लिस्टेड विकल्प था. NSE की लिस्टिंग से सीधे तुलना का मौका मिलेगा, जिससे निवेशक रेवेन्यू, प्रॉफिट ग्रोथ, रिटर्न रेश्यो, मार्केट शेयर और वैल्यूएशन मल्टीपल जैसे पैमानों पर दोनों एक्सचेंजों की तुलना कर सकेंगे.
इक्विटीमास्टर के अनुसार, कैश इक्विटी और डेरिवेटिव्स में NSE के दबदबे को देखते हुए, कुछ निवेशकों को लग सकता है कि NSE बेहतर रिस्क-रिवॉर्ड वाला विकल्प है. अगर NSE की कीमत उसके आकार और मुनाफे के हिसाब से आकर्षक स्तर पर तय होती है, तो इससे BSE के वैल्यूएशन में बदलाव आ सकता है.
BSE के डेरिवेटिव्स कारोबार में बढ़ोतरी से जुड़े सवाल
हाल के वर्षों में BSE के शेयरों में जो जबरदस्त बढ़त दिखी है, उसकी मुख्य वजह डेरिवेटिव्स सेगमेंट में इसका तेजी से विस्तार है. डेरिवेटिव्स में ट्रेडिंग, ट्रांजैक्शन से होने वाली कमाई का एक बड़ा जरिया और मुनाफे में अहम योगदान देने वाला हिस्सा बन गया है.
हालांकि, भारत के डेरिवेटिव्स मार्केट में NSE अभी भी मुकाबले में काफी आगे है. यहां लिक्विडिटी बहुत अच्छी है, ट्रेडर्स की बड़ी संख्या में भागीदारी है और एक मजबूत इकोसिस्टम है. ये सभी बातें इसे मुक़ाबले में बहुत आगे रखती हैं. IPO से निवेशकों का ध्यान इस बात पर जा सकता है कि क्या BSE मार्केट-शेयर में हालिया बढ़त को बनाए रख पाएगा या फिर इसकी ग्रोथ धीरे-धीरे सामान्य हो जाएगी.
फंड का कुछ समय के लिए शिफ्ट होना
बड़े IPOs में संस्थाओं और आम लोगों की काफी दिलचस्पी हो सकती है. NSE के बड़े साइज और मार्केट में उसकी अहमियत का मतलब है कि यह IPO कम समय में निवेशकों का काफी पैसा अपनी ओर खींच सकता है. इसलिए, जिन निवेशकों ने BSE के शेयर खरीदे हैं या खरीदने वाले हैं, उनमें से कुछ NSE के शेयर खरीदना पसंद कर सकते हैं. इससे IPO के दौरान BSE के शेयरों पर कुछ समय के लिए बिकवाली का दबाव बन सकता है या उनकी मांग कम हो सकती है.
प्रीमियम वैल्यूएशन की जांच-पड़ताल
BSE के शेयर की कीमत में तेजी से हुई बढ़ोतरी के कारण इसके वैल्यूएशन मल्टीपल हाई हो गए हैं. NSE की लिस्टिंग से निवेशकों को यह मापने का एक बेहतर पैमाना मिलेगा कि क्या BSE का प्रीमियम वैल्यूएशन सही है या नहीं. अगर NSE कम या ज्यादा वाजिब वैल्यूएशन मल्टीपल पर उपलब्ध होता है, तो कुछ मार्केट पार्टिसिपेंट्स के लिए BSE अपेक्षाकृत महंगा हो सकता है, और वैल्यूएशन कम होने (वैल्यूएशन कम्प्रेशन) का जोखिम बढ़ जाएगा.
लंबे समय में असर सीमित क्यों हो सकता है?
NSE के IPO का BSE के कामकाज, कमाई, कैश फ्लो या कॉम्पिटिटिव स्थिति पर तुरंत कोई असर नहीं पड़ेगा. उम्मीद है कि BSE को भारतीय इक्विटी मार्केट में बढ़ती भागीदारी, घरेलू बचत के फाइनेंशियल होने और कैपिटल मार्केट प्रोडक्ट्स की बढ़ती मांग से फायदा होगा. भारतीय एक्सचेंजों की ग्रोथ को आगे बढ़ाने वाले स्ट्रक्चरल कारण वैसे ही बने रहेंगे, चाहे NSE पब्लिकली लिस्टेड हो या न हो.
कैपिटल मार्केट की ग्रोथ से दोनों एक्सचेंजों को फायदा
भारत में रिटेल निवेशकों की भागीदारी बढ़ रही है, SIP में पैसा आ रहा है, ट्रेडिंग एक्टिविटी बढ़ रही है और IPO मार्केट मजबूत बना हुआ है. ये लंबे समय के ट्रेंड पूरे मार्केट के मौकों को बढ़ाते हैं, न कि सिर्फ एक एक्सचेंज को फायदा पहुंचाते हैं. जैसे-जैसे कैपिटल मार्केट का दायरा बढ़ेगा, NSE और BSE दोनों ही इस इंडस्ट्री की ग्रोथ में हिस्सा ले सकेंगे.
निवेशकों को इन मुख्य बातों पर ध्यान देना चाहिए?
- BSE के डेरिवेटिव्स मार्केट-शेयर में हुई बढ़त कितनी टिकाऊ है.
- हालिया शानदार परफॉर्मेंस के बाद रेवेन्यू में बढ़ोतरी.
- NSE की तरफ से मिलने वाली कड़ी टक्कर.
- NSE की लिस्टिंग के बाद दोनों एक्सचेंजों के बीच वैल्यूएशन का अंतर.
- डेरिवेटिव्स ट्रेडिंग वॉल्यूम पर असर डालने वाले रेगुलेटरी बदलाव.
- ट्रेडिंग से होने वाली कमाई के अलावा दूसरे तरीकों से कमाई करने की BSE की क्षमता.
फाइनेंशियल डेटा से पता चलता है कि दोनों एक्सचेंज बहुत ऊंचे OPM लेवल पर काम करते हैं. हालांकि, NSE को थोड़ी बढ़त हासिल है. NSE में होने वाले भारी वॉल्यूम की वजह से रेवेन्यू और नेट प्रॉफिट के मामले में यह कहीं ज्यादा बड़ा है.
बेंचमार्क इवेंट
NSE का IPO, BSE के लिए सीधे तौर पर कोई बिजनेस खतरा नहीं है, बल्कि यह मुख्य रूप से वैल्यूएशन और कॉम्पिटिशन के लिहाज से एक बेंचमार्क इवेंट है. लिस्टिंग से BSE के शेयरों पर कुछ समय के लिए दबाव बन सकता है, क्योंकि निवेशक दोनों एक्सचेंजों की तुलना करेंगे और वैल्यूएशन का दोबारा आकलन करेंगे.
हालांकि, BSE का लंबे समय का परफॉर्मेंस NSE के IPO पर कम और इस बात पर ज्यादा निर्भर करेगा कि वह डेरिवेटिव्स में ग्रोथ बनाए रखने, रेवेन्यू के नए जरिए बनाने और भारत के कैपिटल मार्केट के लगातार विस्तार का फायदा उठाने में कितनी कामयाब रहती है.
अगर BSE मजबूत अर्निंग्स ग्रोथ दिखाती रहती है, तो NSE के लिस्ट होने से आखिरकार एक्सचेंज बिजनेस की अहमियत ही साबित होगी, न कि उसके शेयरहोल्डर्स के लिए कोई लंबे समय तक चलने वाली नकारात्मक बात होगी.
शेयर का हाल
शुक्रवार को बीएसई के शेयर 12:47 बजे हल्की बढ़त के साथ 4024 रुपये पर कारोबार कर रहे थे. शेयर में पिछले एक महीने में 3 फीसदी की गिरावट आई है.
डिस्क्लेमर: Money9live किसी स्टॉक, म्यूचुअल फंड, आईपीओ में निवेश की सलाह नहीं देता है. यहां पर केवल स्टॉक्स की जानकारी दी गई है. निवेश से पहले अपने वित्तीय सलाहकार की राय जरूर लें.
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