वॉल्यूम नहीं अब वैल्यू के लिए UPI ऐप्स के बीच छिड़ सकती है जंग, MDR की वापसी से पेमेंट सिस्टम में क्या बदलेगा?
RBI गवर्नर संजय मल्होत्रा ने बुधवार को कहा कि लागत का भुगतान तो किसी न किसी को करना ही होगा. आखिरकार, किसी न किसी तरह से उपभोक्ता ही इसकी कीमत चुका रहा है. हो सकता है कि यह वही उपभोक्ता न हो, बल्कि पूरी अर्थव्यवस्था पर इसका असर पड़ रहा हो.

भारत में शॉपिंग के लिए पेमेंट करना पहले से कहीं अधिक आसान और सस्ता हो गया है, लेकिन पेमेंट का तरीका कभी भी मुफ्त नहीं रहा है. उदाहरण के लिए, रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया हर साल करेंसी नोट छापने पर लगभग 5,000 करोड़ रुपये खर्च करता है. कार्ड जारी करने वाली संस्था कार्ड का खर्च उठाती है और इसकी लागत यूजर से वसूल की जाती है. पब्लिक सेक्टर के बैंकों ने 2021-22 में डेबिट कार्ड के सालाना रखरखाव के लिए 3,905 करोड़ रुपये लिए थे, जो 2025-26 में बढ़कर 7,564 करोड़ रुपये हो गए.
कौन उठाता है खर्च?
UPI पेमेंट का खर्च भी बैंक और दूसरे फाइनेंशियल सिस्टम प्लेयर्स उठाते हैं. और इस खर्च को उठाने के बदले कंपनसेशन पाने की कई वर्षों की कोशिश के बाद, जो हर साल 20,000 करोड़ रुपये तक हो सकता है, आखिरकार उनकी यह इच्छा पूरी हो सकती है.
संसद में पेश हुआ बिल
मंगलवार को वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने संसद में ‘टैक्सेशन एंड अदर लॉज (अमेंडमेंट) बिल, 2026’ पेश किया. ‘पेमेंट एंड सेटलमेंट सिस्टम्स एक्ट, 2007’ में प्रस्तावित बदलावों से बैंकों और पेमेंट सिस्टम प्रोवाइडर्स को UPI और RuPay डेबिट कार्ड पेमेंट पर फीस लेने की इजाजत मिल सकती है. संसद में पेश बिल में बैंकों और पेमेंट सर्विस प्रोवाइडर्स पर नोटिफाइड डिजिटल पेमेंट तरीकों पर MDR लगाने की पाबंदियों को हटाने का प्रस्ताव है.
बदल सकता है कॉम्पिटिशन का गोल पोस्ट
ईटी के अनुसार, एनालिस्ट और इंडस्ट्री के अधिकारियों का कहना है कि यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (UPI) ट्रांजैक्शन पर मर्चेंट फीस लगाने की संभावना से पेमेंट सेक्टर में कॉम्पिटिशन का अगला दौर वॉल्यूम बढ़ाने के बजाय अधिक वैल्यू वाले ट्रांजैक्शन हासिल करने पर केंद्रित हो सकता है.
अब तक UPI की दौड़ ग्राहकों को जोड़ने और लोन, इंश्योरेंस और इन्वेस्टमेंट जैसे प्रोडक्ट बेचकर उनसे कमाई करने पर केंद्रित रही है, क्योंकि 2020 से UPI पेमेंट पर कोई सीधी फीस इनकम नहीं हुई है. एक टारगेटेड मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) चुनिंदा मर्चेंट पेमेंट से कमाई का एक नया जरिया बनाएगा, जिससे फोकस उन मर्चेंट्स के साथ संबंध बनाने और उन्हें मजबूत करने पर शिफ्ट होगा जो ज्यादा वैल्यू वाली खरीदारी को बढ़ावा देते हैं.
वैल्यू (लेनदेन के मूल्य) के आधार पर मार्केट शेयर (%)
| रैंक | ऐप/प्लेटफॉर्म | मार्केट शेयर (%) |
|---|---|---|
| 1 | PhonePe | 49.0 |
| 2 | Google Pay | 33.4 |
| 3 | Paytm | 6.7 |
| 4 | CRED | 1.9 |
| 5 | Navi | 1.5 |
| 6 | ICICI Bank Apps | 0.8 |
| 7 | Super.money | 0.7 |
| 8 | HDFC Bank Apps | 0.6 |
| 9 | Axis Bank Apps | 0.5 |
| 10 | Kotak Mahindra Bank Apps | 0.5 |
MDR का मतलब उस फीस से है जो बैंक मर्चेंट से UPI, क्रेडिट कार्ड और डेबिट कार्ड जैसे डिजिटल तरीकों से ग्राहकों से पेमेंट स्वीकार करने के लिए लेते हैं. बैंक MDR को चेन में शामिल अन्य लोगों, जैसे पेमेंट प्लेटफॉर्म, के साथ शेयर करते हैं.
PhonePe और Google Pay का दबदबा
नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया के डेटा के अनुसार, जुलाई तक UPI वॉल्यूम में PhonePe और Google Pay का लंबे समय से दबदबा रहा है और दोनों मिलकर लगभग 80 फीसदी हिस्सेदारी को कंट्रोल करते हैं. डेटा यह नहीं दिखाता है कि कौन सा ऐप अधिक वैल्यू वाले पेमेंट में आगे है. ब्रोकरेज फर्म Jefferies के अनुमान के अनुसार, 2,000 रुपये से ज्यादा के पेमेंट कुल मर्चेंट ट्रांजैक्शन का केवल 4% हैं, लेकिन वैल्यू के हिसाब से 67% हिस्सेदारी रखते हैं.
अगर MDR आखिरकार केवल बड़े पेमेंट या मर्चेंट्स पर लगाया जाता है, तो हर ऐप द्वारा प्रोसेस किए गए योग्य ट्रांजैक्शन की वैल्यू उसके ट्रांजैक्शन की संख्या के साथ-साथ और भी महत्वपूर्ण हो सकती है.
वॉल्यूम (लेनदेन की संख्या) के आधार पर मार्केट शेयर (%)
| रैंक | ऐप/प्लेटफॉर्म | मार्केट शेयर (%) |
|---|---|---|
| 1 | PhonePe | 46.2 |
| 2 | Google Pay | 32.6 |
| 3 | Paytm | 7.9 |
| 4 | Navi | 3.7 |
| 5 | Supermoney | 1.9 |
| 6 | BHIM | 1.0 |
| 7 | FamApp | 0.9 |
| 8 | WhatsApp Pay | 0.7 |
| 9 | Cred | 0.6 |
| 10 | Axis Bank Apps | 0.6 |
सभी ट्रांजैक्शन पर नहीं लगेगा शुल्क
हालांकि, सभी UPI और RuPay डेबिट कार्ड पेमेंट पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) नहीं लगेगा. सबसे अहम बात यह है कि UPI और RuPay डेबिट कार्ड पेमेंट पर कोई भी MDR सिर्फ 2,000 रुपये से ज्यादा के ट्रांजैक्शन के लिए ही हो सकता है. यह बात इसलिए जरूरी है क्योंकि 2025-26 में पर्सन-टू-मर्चेंट (P2M) UPI पेमेंट में से सिर्फ 4% ही 2,000 रुपये से ज्यादा के थे. वैल्यू के हिसाब से UPI पेमेंट का लगभग दो-तिहाई हिस्सा इन्हीं 4 फीसदी ट्रांजैक्शन से आया था.
साल 2025-26 में 314 लाख करोड़ रुपये के 24,000 करोड़ से अधिक UPI ट्रांजैक्शन हुए. इसलिए, ज्यादातर UPI पेमेंट आगे भी मुफ्त रह सकते हैं.
इंसेंटिव स्कीम
अभी, सरकार ‘RuPay डेबिट कार्ड और कम-वैल्यू वाले BHIM-UPI ट्रांजैक्शन (P2M) को बढ़ावा देने के लिए इंसेंटिव स्कीम’ के तहत सिर्फ छोटे व्यापारियों को किए जाने वाले 2,000 रुपये तक के पेमेंट पर सब्सिडी दे रही है. दिया जाने वाला इंसेंटिव ट्रांजैक्शन वैल्यू का ज्यादा से ज्यादा 0.15% होता है और इसे बैंकों, पेमेंट सर्विस प्रोवाइडर्स और थर्ड-पार्टी ऐप प्रोवाइडर्स के बीच बांटा जाता है.
फीस से किस तरह के इंफ्रास्ट्रक्चर का खर्च उठाया जाना है?
इसमें मोबाइल ऐप, उसे बनाने का खर्च और कस्टमर सपोर्ट शामिल है. इसके अलावा बैंकों का खर्च भी है, जिसमें ट्रांजैक्शन को मंजूरी देना, मिलान करना और सेटलमेंट करना शामिल है.
दूसरे खर्चों को समझना आसान है. जैसे साइबर सिक्योरिटी, ‘नो-योर-कस्टमर’ (KYC) प्रोसेस, क्लाउड स्टोरेज, डिज़ास्टर रिकवरी, धोखाधड़ी का पता लगाना, विवादों को सुलझाना, लगातार नेटवर्क की निगरानी और रेगुलेटरी रिपोर्टिंग.
किसी को तो लागत का भुगतना करना होगा?
RBI गवर्नर संजय मल्होत्रा ने बुधवार को कहा कि लागत का भुगतान तो किसी न किसी को करना ही होगा. आखिरकार, किसी न किसी तरह से उपभोक्ता ही इसकी कीमत चुका रहा है. हो सकता है कि यह वही उपभोक्ता न हो, बल्कि पूरी अर्थव्यवस्था पर इसका असर पड़ रहा हो और यह सीधे तौर पर दिखाई न दे. किसी न किसी तरह से, यह बोझ आगे बढ़ाया जा रहा है. हो सकता है कि यह सीधे ‘उपयोगकर्ता-भुगतान’ (user-pays) के सिद्धांत पर न हो.