भारत के परमाणु पावर को रूस देगा नई ताकत! VVER-1200 से SMR तक, आया बड़ा ऑफर
जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नई दिल्ली में 18वें BRICS Summit से इतर रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से मुलाकात की. दोनों नेताओं ने ऊर्जा समेत द्विपक्षीय सहयोग में हुई प्रगति की समीक्षा की. रूस की सरकारी परमाणु ऊर्जा कंपनी रोसाटॉम ने भारत को बड़े क्षमता वाले परमाणु रिएक्टरों के साथ-साथ छोटे मॉड्यूलर रिएक्टर यानी SMR की तकनीक देने की पेशकश की है.
Highlights
- रूस ने भारत को बड़े रिएक्टरों के साथ SMR तकनीक देने की पेशकश की है.
- भारत ने 2047 तक 100 GW परमाणु ऊर्जा क्षमता का लक्ष्य रखा है.
- टाइटेनियम, जिरकोनियम, हैफ्नियम, कैल्शियम और रेयर-अर्थ उत्पादों में सहयोग बढ़ाने की तैयारी है
भारत और रूस के बीच रणनीतिक साझेदारी को अब परमाणु ऊर्जा और महत्वपूर्ण खनिजों के क्षेत्र में और आगे बढ़ाने की तैयारी है. रूस की सरकारी परमाणु ऊर्जा कंपनी रोसाटॉम ने भारत को बड़े क्षमता वाले परमाणु रिएक्टरों के साथ-साथ छोटे मॉड्यूलर रिएक्टर यानी SMR की तकनीक देने की पेशकश की है. इसके अलावा दोनों देशों के बीच टाइटेनियम, जिरकोनियम और रेयर-अर्थ जैसे महत्वपूर्ण खनिजों और सामग्रियों के क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने की कोशिश भी हो रही है.
यह ऐसे समय में सामने आया है जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नई दिल्ली में 18वें BRICS Summit से इतर रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से मुलाकात की. दोनों नेताओं ने ऊर्जा समेत द्विपक्षीय सहयोग में हुई प्रगति की समीक्षा की. साथ ही 2030 तक दोनों देशों के बीच 100 अरब डॉलर का व्यापार हासिल करने और औद्योगिक सहयोग को और बढ़ाने के लक्ष्य पर भी चर्चा हुई.
भारत के 2047 के परमाणु ऊर्जा लक्ष्य पर रूस की नजर
रोसाटॉम के कॉरपोरेट डेवलपमेंट और इंटरनेशनल बिजनेस के फर्स्ट डिप्टी डायरेक्टर जनरल किरिल कोमारोव ने कहा कि भारत लगातार अपने परमाणु ऊर्जा क्षेत्र का विस्तार कर रहा है और उसने 2047 तक परमाणु ऊर्जा क्षमता को 100 GW तक बढ़ाने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य रखा है.
उन्होंने कहा कि रोसाटॉम इस लक्ष्य में पहले से व्यावहारिक योगदान दे रही है और भारत में परमाणु ऊर्जा संयंत्र का निर्माण करने वाली वह एकमात्र विदेशी कंपनी है. भारत के इस बड़े लक्ष्य को देखते हुए रूस बड़े क्षमता वाले पावर यूनिट से लेकर छोटे मॉड्यूलर रिएक्टर (SMR) तक आधुनिक परमाणु तकनीक उपलब्ध कराने के लिए तैयार है. फिलहाल रोसाटॉम भारत में कुडनकुलम न्यूक्लियर पावर प्लांट का निर्माण कर रही है. इसकी दो यूनिट चालू हैं, जबकि चार अन्य यूनिट अलग-अलग चरणों में हैं.
कुडनकुलम के बाद VVER-1200 पर नजर
रूस अब भारत के साथ परमाणु सहयोग को मौजूदा कुडनकुलम परियोजना से आगे बढ़ाना चाहता है. इसके लिए रोसाटॉम भारत को अपनी VVER-1200 रिएक्टर तकनीक देने की पेशकश कर रही है. कुडनकुलम की यूनिट 1 और 2 में VVER-1000 रिएक्टर लगाए गए हैं. दोनों यूनिट क्रमशः 2013 और 2016 में भारत के राष्ट्रीय पावर ग्रिड से जुड़ी थीं.
अप्रैल 2026 तक इन दोनों यूनिट ने संचालन शुरू होने के बाद से कुल 132 अरब kWh से ज्यादा बिजली पैदा की थी. कुडनकुलम परियोजना के दूसरे और तीसरे चरण में यूनिट 3, 4, 5 और 6 शामिल हैं. ये चारों यूनिट भी VVER-1000 रिएक्टर पर आधारित हैं.
परमाणु ऊर्जा के साथ महत्वपूर्ण खनिजों पर भी बड़ा फोकस
भारत-रूस सहयोग का दायरा सिर्फ परमाणु ऊर्जा तक सीमित नहीं रहने वाला है. रोसाटॉम महत्वपूर्ण खनिजों और सामग्रियों के क्षेत्र में भी भारत के साथ नए अवसर तलाश रही है. कंपनी के मेटलर्जी कारोबार ने टाइटेनियम, जिरकोनियम, हैफ्नियम और कैल्शियम को सहयोग के संभावित क्षेत्रों के रूप में पहचाना है. वहीं, रोसाटॉम मेटलटेक रेयर-अर्थ मैग्नेट, रेयर-अर्थ उत्पादों की संयुक्त मांग और नई उत्पादन क्षमता में निवेश की संभावनाओं पर काम कर रही है.
इस दिशा में एक ठोस कदम भी उठाया गया है. रोसाटॉम के गिरडमेट इंस्टीट्यूट और भारतीय कंपनी Alt Metals ने पायलट टाइटेनियम स्पंज उत्पादन सुविधा विकसित करने के लिए एक कॉन्ट्रैक्ट पर हस्ताक्षर किए हैं.
भारत में रूसी तकनीक के स्थानीय उत्पादन पर भी जोर
रूस भारत में एडवांस मैन्युफैक्चरिंग तकनीक के स्थानीयकरण को भी आगे बढ़ाना चाहता है. रोसाटॉम का एडिटिव टेक्नोलॉजी कारोबार भारतीय कंपनियों के साथ मिलकर ऐसा इकोसिस्टम विकसित कर रहा है जिसमें तकनीक ट्रांसफर, टर्नकी एडिटिव टेक्नोलॉजी सेंटर और उपकरणों का स्थानीयकरण शामिल है.
रूस में विकसित 3D स्कैनर का भारत में स्थानीय उत्पादन इस साल शुरू हो गया है. इससे भारतीय ग्राहकों के लिए उपकरणों की लागत में 40% की कमी आई है. कंपनी के अनुसार, इन उत्पादों को मेक इन इंडिया पहल के तहत स्थानीय उत्पाद का दर्जा भी मिल सकता है.
भारत-रूस संबंधों में औद्योगिक सहयोग का नया दौर
भारत और रूस लंबे समय से रणनीतिक साझेदार रहे हैं. अब दोनों देश इस साझेदारी को ज्यादा गहरे औद्योगिक सहयोग में बदलने की कोशिश कर रहे हैं. परमाणु ऊर्जा और महत्वपूर्ण खनिज ऐसे दो क्षेत्र बनकर उभर रहे हैं, जहां रूसी तकनीक और भारत की मैन्युफैक्चरिंग क्षमताओं को साथ लाया जा सकता है.
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