महंगी हो गईं कैंसर की दवाएं, 50 फीसदी तक बढ़ गई कीमत; सप्लाई चेन में रुकावट का असर
11 जून की अधिसूचना के अनुसार नेशनल फार्मास्युटिकल प्राइसिंग अथॉरिटी (NPPA) ने जनहित का हवाला देते हुए और केंद्र सरकार की मंजूरी मिलने के बाद, दवाओं की कीमतें बढ़ाने के लिए विशेष प्रावधानों का इस्तेमाल किया.

भारत के ड्रग प्राइस रेगुलेटर ने प्लैटिनम-बेस्ड कैंसर की दो मुख्य दवाओं की मैक्सिमम प्राइस (सीलिंग रेट) में 50 फीसदी की बढ़ोतरी की है. यह कदम कच्चे माल की लागत में भारी बढ़ोतरी के कारण हुई व्यापक कमी के बाद उठाया गया है. न्यूज एजेंसी रायटर्स ने सरकारी नोटिफिकेशन के हवाले से बताया कि, 11 जून की अधिसूचना के अनुसार नेशनल फार्मास्युटिकल प्राइसिंग अथॉरिटी (NPPA) ने जनहित का हवाला देते हुए और केंद्र सरकार की मंजूरी मिलने के बाद, दवाओं की कीमतें बढ़ाने के लिए विशेष प्रावधानों का इस्तेमाल किया.
प्लैटिनम-बेस्ड कैंसर की दवाएं
दुनिया के सबसे अधिक आबादी वाले देश में मरीज प्लैटिनम-बेस्ड कैंसर की दवाओं – सिसप्लेटिन और कार्बोप्लेटिन – की कमी से जूझ रहे हैं, क्योंकि अस्पतालों, खासकर सरकारी अस्पतालों में इनकी कमी हो गई है. ओवेरियन, फेफड़ों और ब्लैडर के कैंसर के इलाज में इस्तेमाल होने वाली दवाओं की कीमतें सरकार तय और कंट्रोल करती है.
कितनी बढ़ गईं कीमतें?
नोटिफिकेशन के मुताबिक, सिस्प्लैटिन की अधिकतम कीमत 7.26 रुपये से बढ़ाकर 10.89 रुपये ($0.1144) प्रति ml कर दी गई, जबकि कार्बोप्लैटिन की कीमत 60.49 रुपये से बढ़ाकर 90.74 रुपये ($0.9530) प्रति ml (टैक्स को छोड़कर) कर दी गई.
सप्लाई में रुकावट
NPPA ने कहा, ‘अथॉरिटी ने कार्बोप्लैटिन और सिस्प्लैटिन दवाओं की कमी और सप्लाई में रुकावट को लेकर चिंता जताई है. ये दवाएं कैंसर के इलाज में बहुत जरूरी हैं.’ साथ ही, NPPA ने यह भी कहा कि लोगों की सेहत के लिए इन दवाओं का बिना रुकावट मिलना बहुत जरूरी है.
कई कंपनियां बनाती हैं ये दवाएं
ये दवाएं कई कंपनियां बनाती हैं, जिनमें सिप्ला, इंटास फार्मास्यूटिकल्स और कैंसर के इलाज पर फोकस करने वाली कंपनियां जैसे नैप्रोड लाइफ साइंसेज और वीनस रेमेडीज शामिल हैं. NPPA ने कहा कि कीमतों में यह बढ़ोतरी एक बार किया गया बदलाव है और छह महीने बाद इसकी समीक्षा की जाएगी. भारत प्लैटिनम के आयात पर बहुत अधिक निर्भर है. इसका इस्तेमाल ऑटोमोबाइल और ज्वैलरी से लेकर केमिकल और फार्मास्यूटिकल्स जैसे उद्योगों में होता है.
पश्चिम एशिया संघर्ष की वजह से बढ़ीं मुश्किलें
डॉक्टरों और इंडस्ट्री के अधिकारियों ने रॉयटर्स को बताया कि दक्षिण अफ्रीका जैसे मुख्य उत्पादकों से इस सफेद धातु की सप्लाई लागत बढ़ने के कारण कम हो गई है. वहीं, पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष ने सप्लाई चेन को और बाधित किया है और मैन्युफैक्चरिंग का खर्च बढ़ा दिया है.
दवाओं की कीमतों की सीमा में बढ़ोतरी से दवा बनाने वाली कंपनियों को राहत मिली है. सप्लाई में कमी, भारी मांग और घटते स्टॉक के कारण प्लैटिनम की कीमतें दोगुनी से अधिक हो गई थीं, जिससे इन कंपनियों ने कुछ समय के लिए उत्पादन रोक दिया था.