महिलाएं अब होममेकर नहीं राष्ट्र निर्माता, कम से कम ₹30000 मिलेगा मुआवजा, SC के फैसले से जानें कैसे बढ़ेगी हैसियत
सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन.के. सिंह की पीठ ने कहा कि गृहिणी का योगदान केवल घर के काम तक सीमित नहीं है. वह बच्चों को संस्कार देती है, परिवार को संभालती है और समाज के निर्माण में बड़ी भूमिका निभाती है. यह मामला साल 2001 के एक सड़क हादसे से जुड़ा था, जिसमें एक महिला की मौत हो गई थी.
SC on Housewife: घर संभालने वाली महिलाओं के काम को अक्सर पैसों में नहीं आंका जाता. खाना बनाना, बच्चों की देखभाल करना, बुजुर्गों का ध्यान रखना और पूरे परिवार को व्यवस्थित रखना जैसे काम रोज होते हैं, लेकिन इन्हें आमतौर पर ‘बिना वेतन का काम’ मान लिया जाता है. अब देश की सबसे बड़ी अदालत ने इस सोच को बदलने की दिशा में बड़ा कदम उठाया है. सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि गृहिणियां केवल घर नहीं संभालतीं, बल्कि देश निर्माण में भी अहम भूमिका निभाती हैं.
अदालत ने उन्हें ‘नेशन बिल्डर’ यानी राष्ट्र निर्माता तक कहा है. इतना ही नहीं, सड़क हादसों में गृहिणी की मौत होने पर परिवार को मिलने वाले मुआवजे की गणना में घरेलू देखभाल की हानि को एक अलग आधार माना जाएगा. अदालत ने इसके लिए 30 हजार रुपये प्रति माह का मूल्य तय किया है. यह फैसला लाखों परिवारों और महिलाओं के योगदान को नई पहचान देने वाला माना जा रहा है.
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन.के. सिंह की पीठ ने कहा कि गृहिणी का योगदान केवल घर के काम तक सीमित नहीं है. वह बच्चों को संस्कार देती है, परिवार को संभालती है और समाज के निर्माण में बड़ी भूमिका निभाती है. अदालत ने कहा कि महिलाओं का योगदान केवल बच्चों को जन्म देने तक सीमित नहीं है. वे मानव संसाधन तैयार करती हैं, जिस पर देश की प्रगति और अर्थव्यवस्था टिकी होती है.
सड़क हादसे के मामले में आया फैसला
- यह मामला साल 2001 के एक सड़क हादसे से जुड़ा था, जिसमें एक महिला की मौत हो गई थी.
- पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने पीड़ित परिवार को 8 लाख रुपये से ज्यादा का मुआवजा दिया था. बाद में मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा.
- अदालत ने गृहिणी के घरेलू योगदान को अलग आधार मानते हुए मुआवजे की दोबारा गणना की और कुल मुआवजा बढ़ाकर 62.77 लाख रुपये कर दिया.

घरेलू देखभाल की कीमत तय
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि गृहिणी द्वारा परिवार के लिए किए जाने वाले काम की आर्थिक कीमत भी है. इसलिए घरेलू देखभाल की हानि को मुआवजे का अलग आधार बनाया गया है. अदालत ने इसकी कीमत 30 हजार रुपये प्रति माह तय की है. साथ ही यह भी कहा कि हर तीन साल में इस राशि में 10 प्रतिशत की बढ़ोतरी की जाएगी.
GDP में भी बड़ा योगदान
अदालत ने विभिन्न अध्ययनों का हवाला देते हुए कहा कि महिलाओं द्वारा किए जाने वाले बिना वेतन वाले देखभाल और घरेलू काम का योगदान भारत की GDP में करीब 15 से 17 प्रतिशत तक माना जाता है. इसके बावजूद इस काम को न तो उचित पहचान मिलती है और न ही आर्थिक मूल्य.
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