E20 पेट्रोल: कार मालिक परेशान, इंपोर्ट बिल में सिर्फ 3% की कमी; फिर इथेनॉल के बढ़ते कारोबार से किसे मिल रहा फायदा?
सरकार बार-बार यह दावा करती रही है कि E20 पेट्रोल से इसके लिए बने वाहनों को कोई नुकसान नहीं होता. लेकिन बड़ा सवाल यही है कि अगर ग्राहकों को कोई फायदा नहीं हुआ और सरकारी खजाने की बचत भी बहुत कम है, तो असल में फायदा किसे हुआ?

इथेनॉल मिक्स पेट्रोल (E20) को लेकर इन दिनों में देश में काफी शोर है. सरकार का दावा है कि यह गाड़ियों के लिए मुफीद है, सिर्फ माइलेज पर थोड़ा असर दिखेगा. लेकिन दूसरी तरफ वाहन मालिक हैं, जिनका कहना है कि इथेनॉल मिक्स पेट्रोल उनकी गाड़ियों में कई तरह की समस्याएं देखने को मिली हैं. रायपुर के नेफ्रोलॉजिस्ट प्रेमराज देब्ता की नई मारुति सुज़ुकी ग्रैंड विटारा हाइब्रिड कार के इंजन में आई खराबी ने वाहन मालिकों को चौंकाने के साथ-साथ उनकी टेंशन भी बढ़ा दी.
फ्यूल सैंपल में क्या मिला?
प्रेमराज देब्ता जब अपनी गाड़ी को लेकर सर्विस सेंटर गए, तो हैरान करने वाली बातें सामने आईं. गाड़ी से निकाले गए फ्यूल के सैंपल में जेली जैसा पदार्थ मिला. इसके बाद महीनों तक यह विवाद चलता रहा कि इसके लिए भारत का क्या नया इथेनॉल-मिला पेट्रोल जिम्मेदार है या गाड़ी में कोई खराबी है या कोई और वजह है. महीनों वे परेशान रहे. फिर कंज्यूमर कोर्ट का दरवाजा खटखटाया, जिसने हाल ही में कंपनी को गाड़ी बदलने और उन्हें 1 लाख रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया. मारुति सुज़ुकी ने कहा है कि वह इस फैसले को ऊपरी अदालतों में चुनौती देगी.
इस मामले ने भारत के इथेनॉल-ब्लेंडिंग प्रोग्राम पर चल रही बहस को और हवा दे दी है. जबकि सरकार बार-बार यह दावा करती रही है कि E20 पेट्रोल से इसके लिए बने वाहनों को कोई नुकसान नहीं होता. देब्ता की कार के साथ जो हुआ, उसने एक सवाल उठा दिया है कि अगर ब्लेंडिंग वाले पेट्रोल से गाड़ी में गड़बड़ी आई, तो फिर जिम्मेदारी किसकी होगी? साथ ही, उन वादों पर भी सवाल उठ रहे हैं, जिनमें कहा गया था कि इथेनॉल-ब्लेंडिंग प्रोग्राम से ईंधन की कीमतें कम होंगी.
विदेशी मुद्रा बचाने का तर्क
अप्रैल 2026 में पूरे देश में E20 पेट्रोल लागू होने के बाद (इसे शुरू में फरवरी 2023 से चरणों में लॉन्च किया गया था) पंप पर कीमतें कम नहीं हुई हैं, लेकिन सरकार का तर्क है कि ब्लेंडिंग प्रोग्राम से कच्चे तेल के आयात पर विदेशी मुद्रा की बचत हुई है. सरकार का कहना है कि इथेनॉल ब्लेंडिंग से पिछले दशक में विदेशी मुद्रा के रूप में 1.55 लाख करोड़ रुपये की बचत हुई है. हैरानी की बात यह है कि सरकार के अपने आंकड़ों के अनुसार, कच्चे तेल के आयात पर भारत की निर्भरता बढ़कर 90 फीसदी से ज्यादा हो गई है, जबकि इथेनॉल-ब्लेंडिंग प्रोग्राम के देश भर में शुरू होने के समय यह 83 फीसदी थी.
कैसा है हिसाब-किताब?
सरकार के पेट्रोलियम प्लानिंग एंड एनालिसिस सेल के अनुसार, भारत हर साल कच्चा तेल आयात करने पर लगभग 150 से 200 अरब अमेरिकी डॉलर खर्च करता है. इथेनॉल की अधिकतम 20% ब्लेंडिंग से भी देश को सालाना 3 अरब अमेरिकी डॉलर की बचत होती है, जो कुल सालाना तेल आयात बिल का केवल 2-3 फीसदी है.
दूसरी तरफ, सोशल मीडिया पर प्रेमराज देब्ता जैसे मामले छाए हुए हैं, जिनमें दावा किया जा रहा है कि E20 पेट्रोल से कार और दोपहिया वाहनों के इंजन खराब हो रहे हैं. लोग उन वाहनों में फ्यूल लाइनों के खराब होने और इंजन के घिसने को लेकर चिंता जता रहे हैं जो ज्यादा इथेनॉल वाले पेट्रोल के लिए नहीं बने हैं. माइलेज कम होने की खबरें भी आ रही हैं.
इसलिए अब बड़ा सवाल यही है कि अगर ग्राहकों को कोई फायदा नहीं हुआ और सरकारी खजाने की बचत भी बहुत कम है, तो असल में फायदा किसे हुआ?
हालांकि, सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी इथेनॉल-ब्लेंडिंग प्रोग्राम से किसी भी तरह के निजी फायदे से इनकार करते हैं, लेकिन इथेनॉल वैल्यू चेन से जुड़ी कंपनियों की बैलेंस शीट में रेवेन्यू में भारी बढ़ोतरी, मुनाफे में उछाल और शेयर की कीमतों में जबरदस्त तेजी देखी गई है.
चीनी मिलों के लिए फायदेमंद
ईटी ने एक एक्सपर्ट्स के हवाले से अपनी रिपोर्ट में लिखा कि देश भर में इथेनॉल बनाने वाली 75 कंपनियों में से 41, यानी 57.7%, सीधे तौर पर राजनेताओं के मालिकाना हक में हैं.
उनका कहना है कि इन 41 कंपनियों में से 12 का संबंध BJP से, 9 का कांग्रेस से और पांच का NCP के अलग-अलग गुटों से है, जबकि कई अन्य DMK, BRS और दूसरी क्षेत्रीय पार्टियों से जुड़ी हैं. दरअसल, भारत में चीनी सहकारी समितियां लंबे समय से ग्रामीण राजनीतिक शक्ति का जरिया रही हैं. इथेनॉल के आने से दशकों पहले से ही वे गन्ने की कीमतों, किसानों की आय और वोटों को नियंत्रित करती रही हैं. इथेनॉल ने उसी राजनीतिक तंत्र को बेचने के लिए एक अधिक मुनाफे वाला उत्पाद दे दिया है.
यह समझने के लिए कि इथेनॉल को बढ़ावा देने से कंपनियों को कैसे फायदा हुआ, आइए 2014 के बाद ब्लेंडिंग में तेजी आने से पहले चीनी उद्योग की स्थिति पर नजर डालें.
चीनी मिलों की बदल गई किस्मत
एक दशक से कुछ अधिक समय पहले, भारत की चीनी मिलें भारी वित्तीय संकट में थीं. सरकार द्वारा तय गन्ने की कीमतों, समय-समय पर चीनी की अधिक आपूर्ति और बढ़ते कर्ज के बोझ तले दबा यह सेक्टर लगातार नुकसान के चक्र में फंसा हुआ था. 2009 और 2013 के बीच, कई मिलों को किसानों का बकाया न चुका पाने, कमजोर बैलेंस शीट और गिरते शेयर भाव जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ा. बलरामपुर चीनी मिल्स, त्रिवेणी इंजीनियरिंग, द्वारिकेश शुगर और बजाज हिंदुस्तान जैसी कंपनियां नुकसान, भारी कर्ज और अनिश्चित भविष्य से जूझ रही थीं.
2014 में इथेनॉल ब्लेंडेड पेट्रोल (EBP) प्रोग्राम के विस्तार के साथ उनकी किस्मत बदल गई. यह प्रोग्राम शुरू में 2001 में एक पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर और आधिकारिक तौर पर जनवरी 2003 में शुरू हुआ था. सरकार ने सरकारी तेल मार्केटिंग कंपनियों (OMCs) को तय कीमतों पर इथेनॉल खरीदने का निर्देश देकर एक सुनिश्चित मार्केट तैयार किया, डिस्टिलेशन क्षमता बढ़ाने के लिए सब्सिडी वाले लोन दिए और ब्लेंडिंग के लक्ष्यों को लगातार बढ़ाया.
आर्थिक कायापलट
असल में इसने चीनी मिलों को उतार-चढ़ाव वाले कमोडिटी कारोबार से बदलकर सुनिश्चित मांग वाले सप्लायर में बदल दिया. इसके नतीजे बहुत जबरदस्त रहे. कंपनी के फाइनेंशियल डेटा से पता चलता है कि अगले दशक में बलरामपुर चीनी का रेवेन्यू 6,000 करोड़ रुपये से अधिक हो गया, सालाना मुनाफा 500 करोड़ रुपये से 700 करोड़ रुपये तक पहुंच गया और इसके शेयर की कीमत 2013 में लगभग 25 रुपये प्रति शेयर से बढ़कर 2024 में 600 रुपये प्रति शेयर से अधिक हो गई.
त्रिवेणी इंजीनियरिंग का रेवेन्यू भी 6,000 करोड़ रुपये से ज्यादा हो गया और इसके शेयर 2013 में लगभग 12 रुपये से बढ़कर 2024 में 400 रुपये से अधिक हो गए.
द्वारिकेश शुगर आर्थिक संकट से बाहर निकली, कर्ज चुकाया और 2013 से 2024 के बीच इसके शेयर की कीमत लगभग 3 रुपये से बढ़कर 120 रुपये प्रति शेयर से ज्यादा हो गई.
इथेनॉल से चीनी मिलों को क्या मिला?
इथेनॉल प्रोग्राम ने चीनी मिलों को वह दिया जो उन्हें पहले कभी नहीं मिला था. सुनिश्चित रेवेन्यू, सब्सिडी वाला विस्तार और सरकार का समर्थन पाने वाला खरीदार. जो अतिरिक्त चीनी पहले कीमतों को कम कर देती थी, उसे इथेनॉल बनाने में इस्तेमाल किया जाने लगा, जबकि ब्लेंडिंग के हर नए लक्ष्य से नई मांग पैदा होती चली गई.
चीनी उद्योग इस बात को नहीं मानता कि इथेनॉल मिलों के लिए सिर्फ अचानक मिला फायदा (विंडफॉल) बन गया है. ईटी ने अपनी रिपोर्ट में इंडियन शुगर एंड बायो-एनर्जी मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन (ISMA) के डायरेक्टर जनरल दीपक बल्लानी के हवाले से लिखा, ‘इथेनॉल चीनी मिलों के लिए कोई सब्सिडी नहीं है. यह एनर्जी-सिक्योरिटी प्रोग्राम है जिसने किसानों की आय को स्थिर किया है, चीनी की अतिरिक्त मात्रा को कम किया है और आयातित कच्चे तेल का घरेलू विकल्प तैयार किया है.’
अधिक उत्पादन की समस्या
आलोचकों का कहना है कि इस पॉलिसी ने कमियों को खत्म नहीं किया है, बल्कि उन्हें दूसरी जगह शिफ्ट कर दिया है. अब इसके सामने एक और चुनौती है, और यह है कि भारत अपनी जरूरत से ज्यादा इथेनॉल का उत्पादन कर रहा है.
मई 2026 की CareEdge Ratings की रिपोर्ट के अनुसार, भारत की इथेनॉल उत्पादन क्षमता सालाना 20 अरब लीटर से ज्यादा हो गई है और FY27 तक इसके 24 अरब लीटर तक पहुंचने की उम्मीद है. लेकिन घरेलू मांग अभी भी बहुत कम है. E20 ब्लेंडिंग के लिए सालाना लगभग 11 अरब लीटर की जरूरत होती है, जबकि शराब, फार्मास्यूटिकल्स और केमिकल्स जैसे नॉन-फ्यूल इस्तेमाल में 3 अरब से 3.5 अरब लीटर और खपत होती है. इसके बाद भी लगभग 7 अरब लीटर बिना बाजार के बच जाता है, और डिस्टिलरीज अपनी क्षमता के केवल 60 फीसदी पर ही काम कर रही हैं.
क्या अतिरिक्त इथेनॉल का निर्यात मदद करेगा?
भारत गन्ने, मक्के और अनाज से बने फर्स्ट-जेनरेशन (1G) इथेनॉल के निर्यात पर रोक लगाता है, और केवल फसल के अवशेषों से बने सेकेंड-जेनरेशन (2G) इथेनॉल के निर्यात की अनुमति देता है. अभी के लिए, नॉन-फ्यूल इथेनॉल का निर्यात कम है और यह तंजानिया, केन्या, नेपाल और इराक जैसे कुछ ही देशों तक सीमित है.
ऐसे में एक भरोसेमंद खरीदार OMCs ही बचती हैं. इस बीच, ब्लेंडिंग टारगेट में हर बढ़ोतरी से अतिरिक्त इथेनॉल की नई मांग पैदा होती है, जिससे उत्पादकों को अधिक मैंडेट (अनिवार्य लक्ष्य) के लिए जोर देने का मजबूत प्रोत्साहन मिलता है.
मामला फीडस्टॉक (कच्चे माल) के साथ और पेचीदा हो जाता है. ब्लेंडिंग टारगेट बढ़ने के लालच में, डिस्टिलरीज गन्ने के साथ-साथ मक्के का भी इस्तेमाल करने लगी हैं. रिपोर्ट्स के अनुसार, इस बदलाव ने भारत को – जो ऐतिहासिक रूप से एशिया का सबसे बड़ा मक्का निर्यातक था – मक्के का नेट आयातक बना दिया है.
2024 में देश ने 0.9 मिलियन टन मक्के का आयात किया, जो 2023 के आयात की तुलना में लगभग 80 गुना अधिक है. इंडस्ट्री के जानकारों का मानना है कि इस ट्रेंड की सीधी वजह मक्के का इथेनॉल डिस्टिलरीज की ओर डायवर्जन है. जिस पॉलिसी को भारत के कच्चे तेल के आयात के समाधान के तौर पर पेश किया गया था, उसने चुपचाप आयात पर एक नई निर्भरता पैदा कर दी है – इस बार देश की अनाज अर्थव्यवस्था में भी यह ट्रेंड देखने को मिल रहा है.
क्या ग्राहकों को मिलेगा फायदा?
ब्राजील और अमेरिका के विपरीत, जहां वाहन चलाने वाले अपनी गाड़ी की क्षमता के आधार पर अलग-अलग इथेनॉल ब्लेंड चुन सकते हैं, भारत ने E20 को उन सभी गाड़ियों के लिए डिफॉल्ट फ्यूल बना दिया है जिनमें बिल्कुल नई कारों से लेकर दशकों पुराने मॉडल तक शामिल हैं. नीति आयोग ने अपनी रिपोर्ट ‘भारत में इथेनॉल ब्लेंडिंग के लिए रोडमैप 2020-25’ में 2021 में चेतावनी दी थी कि पुरानी गाड़ियों की माइलेज 6%-7% तक कम हो सकती है और E20 को छूट पर बेचने की सलाह दी थी, लेकिन इस सुझाव पर कभी अमल नहीं हुआ.
फिलहाल, सरकार ने E25 या E30 की ओर बढ़ने का कोई भी कदम रोक दिया है. रोडमैप 31 अक्टूबर, 2026 तक E20 तक ही सीमित रहेगा और केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट को बताया है कि इस प्रोग्राम का लंबे समय का असर 2027 तक ही साफ हो पाएगा. प्रेमराज देब्ता का मामला अब ऊपरी अदालत में जाएगा. लेकिन बड़ी बहस तो पहले से ही चल रही है. इथेनॉल की कहानी ने निस्संदेह चीनी उद्योग को फायदा पहुंचाया है, लेकिन क्या इससे कभी कंज्यूमर को भी फायदा होगा?