IIP Data: मार्च में 4.1% पर सिमटी औद्योगिक रफ्तार, मैन्युफैक्चरिंग और पावर सेक्टर सुस्त, वेस्ट एशिया संकट का असर
भारत की औद्योगिक उत्पादन वृद्धि मार्च 2026 में घटकर 4.1% पर आ गई, जो पांच महीने का निचला स्तर है. मैन्युफैक्चरिंग और पावर सेक्टर की कमजोर प्रदर्शन के चलते यह गिरावट आई है. वेस्ट एशिया संकट और वैश्विक दबावों का असर भी अर्थव्यवस्था पर साफ दिख रहा है.

IIP Data March: भारतीय अर्थव्यवस्था के मोर्चे से एक चिंताजनक खबर सामने आई है. देश के औद्योगिक उत्पादन (IIP) की रफ्तार पर ब्रेक लग गया है. मार्च 2026 में औद्योगिक उत्पादन की वृद्धि दर गिरकर 5 महीने के सबसे निचले स्तर 4.1 प्रतिशत पर आ गई है. इसके पहले फरवरी में यह 5.1 फीसदी थी. इस तरह महीने के आधार पर गिर गई है.
हालांकि पिछले साल के मार्च यानी 2025 से तुलना की जाय तो इसमें मामूली बढ़त है. मार्च 2025 में यह 3.9 फीसदी थी. इस बार मुख्य रूप से मैन्युफैक्चरिंग और पावर सेक्टर के सुस्त प्रदर्शन ने इस आंकड़े को नीचे धकेला है, जिसका बड़ा कारण पश्चिम एशिया में जारी तनाव (West Asia crisis) को माना जा रहा है.
मैन्युफैक्चरिंग और पावर सेक्टर ने बढ़ाई चिंता
नेशनल स्टैटिस्टिक्स ऑफिस (NSO) द्वारा जारी आंकड़ों के मुताबिक, औद्योगिक उत्पादन की इस सुस्ती के पीछे दो प्रमुख स्तंभों की कमजोरी रही है:
- मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर: इस सेक्टर की ग्रोथ मार्च 2026 में महज 4.3 प्रतिशत रही. हालांकि पिछले साल इसी महीने में यह 4 प्रतिशत थी, लेकिन वर्तमान आर्थिक स्थितियों के लिहाज से इसे काफी कम माना जा रहा है.
- बिजली उत्पादन: सबसे ज्यादा गिरावट बिजली क्षेत्र में देखी गई. पिछले साल मार्च में जहां इसमें 7.5 प्रतिशत की मजबूत बढ़त थी, वहीं इस साल मार्च में यह घटकर मात्र 0.8 प्रतिशत रह गई.
माइनिंग में दिखा सुधार, फरवरी के आंकड़े भी संशोधित
राहत की बात सिर्फ माइनिंग सेक्टर से रही, जिसने इस दौरान रफ्तार पकड़ी. खनन क्षेत्र की विकास दर पिछले साल के 1.2 प्रतिशत के मुकाबले सुधरकर 5.5 प्रतिशत पर पहुंच गई.
वहीं, NSO ने फरवरी 2026 के आंकड़ों में भी मामूली बदलाव किया है. पिछले महीने जारी 5.2 प्रतिशत के अनुमान को अब संशोधित कर 5.1 प्रतिशत कर दिया गया है. इससे पहले IIP का सबसे निचला स्तर अक्टूबर 2025 में देखा गया था, जब ग्रोथ महज 0.5 प्रतिशत रह गई थी.
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पूरे वित्त वर्ष का लेखा-जोखा
अगर पूरे वित्त वर्ष 2025-26 की बात करें, तो देश की औद्योगिक वृद्धि की तस्वीर लगभग जस की तस बनी हुई है. पूरे साल के दौरान औद्योगिक उत्पादन की औसत वृद्धि 4.1 प्रतिशत रही, जो पिछले वित्त वर्ष (2024-25) के 4 प्रतिशत के मुकाबले लगभग फ्लैट है.
साफ है कि वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव और आपूर्ति श्रृंखला में बाधाओं ने भारत के ‘फैक्ट्री आउटपुट’ को प्रभावित किया है, जो आने वाले समय में नीति निर्माताओं के लिए एक बड़ी चुनौती बन सकता है.