2060 तक चीन को पछाड़ देगा भारत, ग्लोबल इकोनॉमी में बढ़ेगा दबदबा; रिपोर्ट में दावा
वर्ल्ड इनइक्वालिटी लैब की रिपोर्ट के अनुसार, भारत वर्ष 2060 तकपर्चेजिंग पावर पैरिटी यानी PPP के आधार पर वैश्विक GDP हिस्सेदारी में चीन को पीछे छोड़ सकता है. रिपोर्ट में कहा गया है कि चीन की आर्थिक हिस्सेदारी आने वाले वर्षों में स्थिर होकर धीरे- धीरे घट सकती है, जबकि भारत की हिस्सेदारी बढ़ने की संभावना है.

India GDP: आने वाले दशकों में भारत ग्लोबल इकोनॉमी का एक और बड़ा सेंटर बन सकता है. पर्चेजिंग पावर पैरिटी यानी PPP के आधार पर भारत 2060 तक वैश्विक GDP में हिस्सेदारी के मामले में चीन को पीछे छोड़ सकता है. रिपोर्ट में कहा गया है कि चीन की आर्थिक हिस्सेदारी अगले कुछ वर्षों तक बढ़ेगी, लेकिन बाद में उसकी रफ्तार धीमी हो सकती है. दूसरी ओर भारत की अर्थव्यवस्था लगातार विस्तार करती रहेगी.
2060 तक चीन से आगे निकल सकता है भारत
वर्ल्ड इनइक्वालिटी लैब की ग्लोबल जस्टिस रिपोर्ट के मुताबिक, वर्तमान में वैश्विक GDP में चीन की हिस्सेदारी करीब 20 फीसदी है, जो अमेरिका से लगभग एक तिहाई अधिक है. अनुमान है कि 2035 तक चीन की अर्थव्यवस्था अमेरिका की तुलना में लगभग दोगुनी हो सकती है. हालांकि इसके बाद चीन की आर्थिक हिस्सेदारी स्थिर होने लगेगी. इसी दौरान भारत की हिस्सेदारी लगातार बढ़ने की संभावना है और वर्ष 2060 के आसपास भारत चीन को पीछे छोड़ सकता है.
चीन की आबादी में गिरावट का पड़ेगा असर
रिपोर्ट में कहा गया है कि चीन की आबादी का वैश्विक हिस्सेदारी में योगदान लगातार घट रहा है. वर्ष 1945 में दुनिया की कुल आबादी में चीन की हिस्सेदारी 23 फीसदी थी. यह 2025 में घटकर 17 फीसदी के आसपास पहुंच चुकी है. अनुमान है कि 2100 तक यह 8 फीसदी से भी कम रह जाएगी. आबादी में इस गिरावट का असर भविष्य में चीन की ग्रेथ रेट और वैश्विकGDP हिस्सेदारी पर पड़ सकता है.
दुनिया में नहीं होगा किसी एक देश का दबदबा
रिपोर्ट के अनुसार 21वीं सदी में दुनिया मल्टीपोलर बनी रहेगी. इसका मतलब है कि किसी एक देश का वैसा दबदबा नहीं होगा जैसा कभी अमेरिका या यूरोप का रहा था. एक समय अमेरिका वैश्विक GDP का 35 से 40 फीसदी हिस्सा रखता था, जबकि 1900 से 1910 के बीच यूरोप की हिस्सेदारी 40 से 45 फीसदी तक थी. रिपोर्ट का मानना है कि भविष्य में कई देश मिलकर वैश्विक अर्थव्यवस्था को दिशा देंगे.
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भारत के सामने चुनौती
रिपोर्ट ने यह भी बताया कि भारत में आर्थिक असमानता का स्तर चीन की तुलना में अधिक है. साथ ही प्रोडक्टिव ग्रोथ की रफ्तार भी चीन से कम रही है. जानकारों का मानना है कि एजुकेशन, हेल्थ और ह्यूमन रिसोर्स डेवलपमेंट में निवेश बढाकर भारत इस अंतर को कम कर सकता है. चीन ने इन क्षेत्रों में लंबे समय तक बड़ा निवेश किया है, जिसका फायदा उसकी अर्थव्यवस्था को मिला.